- शिवपुरी जिले के ग्राम हाजीनगर में कल्याण सिंह पाल ने अपनी तेरहवीं का कार्ड खुद छपवा कर बांटना शुरू कर दिया है
- बुजुर्ग ने अपनी मौत का मातम अपनी आंखों के सामने देखकर अपनों की बेरुखी और अकेलेपन का दर्द व्यक्त किया है
- कल्याण सिंह के कार्ड में लिखा है-अपनों ने उन्हें लूटा और गहरे जख्म दिए, जिससे वे तेरहवीं का आयोजन कर रहे हैं
Shivpuri Living Man Funeral Rituals: शिवपुरी जिले से अपनों की बेरुखी का आलम ये हुआ कि एक बुजुर्ग अपनी मौत का मातम अपनी ही आंखों के सामने देखने को मजबूर हो गया है. मामला करैरा तहसील के ग्राम हाजीनगर का है, जहां रहने वाले कल्याण सिंह पाल ने जीते-जी अपनी ही त्रयोदशी (तेहरवीं) का कार्ड छपवा दिया है. यह सिर्फ एक कार्ड नहीं, बल्कि एक पिता के उस दर्द की दास्तान है जिसने अपनों के लिए सब कुछ न्योछावर किया, लेकिन बदले में उसे सिर्फ अकेलापन मिला. कल्याण सिंह की तेरहवीं का आयोजन 16 मई को हो रहा है लेकिन इससे पहले ही उनका निमंत्रण पत्र वायरल हो गया है.
मोहल्ले-मोहल्ले खुद बांट रहे अपनी मौत का बुलावा
आमतौर पर मौत के बाद परिवार वाले शोक संदेश बांटते हैं, लेकिन कल्याण सिंह पाल खुद घर-घर जाकर अपनी त्रयोदशी के कार्ड बांट रहे हैं. शनिवार 16 मई 2026 को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम के लिए बुजुर्ग ने जोर-शोर से तैयारियां शुरू कर दी हैं. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस कार्ड ने पूरे जिले में सनसनी फैला दी है. जो भी इस कार्ड को देख रहा है, उसकी आंखें नम हैं और समाज में ढहते पारिवारिक रिश्तों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.
कार्ड पर लिखी पंक्तियों ने बयां किया गहरा दर्द
कल्याण सिंह ने अपने कार्ड पर जो पंक्तियां लिखवाई हैं, वो उनके भीतर छिपे समंदर जैसे दुख को बयां करने के लिए काफी हैं.
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'अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है'
जब इस मामले की गहराई जानने के लिए कल्याण सिंह से उनके मोबाइल पर संपर्क किया गया, तो उनकी आवाज में भारीपन और गहरी नाराजगी साफ झलक रही थी. उन्होंने बस इतना ही कहा कि अब इस दुनिया में उनका कोई नहीं बचा है. उन्हें डर है कि मरने के बाद पता नहीं कोई उनकी तेरहवीं करेगा भी या नहीं, इसलिए वह अपनी मौजूदगी में ही यह रस्म पूरी कर लेना चाहते हैं. गांव के लोगों ने भी दबी जुबान में बताया कि बुजुर्ग अपने परिवार के व्यवहार से बेहद दुखी और परेशान हैं.
टूटते रिश्तों की एक कड़वी हकीकत
यह खबर महज एक आयोजन की सूचना नहीं है, बल्कि आज के दौर में सिमटते संवेदनाओं के दायरे की हकीकत है. जिस पिता ने बच्चों की खुशी के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, उसे बुढ़ापे में इस कदर बेगाना कर दिया गया कि उसे अपनी ही आंखों के सामने अपना मातम मनाना पड़ रहा है. शिवपुरी के इस गांव में होने वाला यह आयोजन समाज के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ गया है कि क्या आधुनिकता की दौड़ में हम अपनों को ही पीछे छोड़ते जा रहे हैं.
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