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313 स्कूलों में मौत के साये में पढ़ रहे बच्चे! 8 दिन में ढह गई दो बिल्डिंग, किसी बड़े हादसे का है इंतजार?

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में 8 दिनों के भीतर दो सरकारी स्कूल भवन ढहने से बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. जिले के 313 जर्जर स्कूलों में हजारों छात्र अब भी पढ़ाई करने को मजबूर हैं. बादलहार और चक मोहम्मदपुर स्कूल हादसों के बाद ग्रामीणों में आक्रोश है.

313 स्कूलों में मौत के साये में पढ़ रहे बच्चे! 8 दिन में ढह गई दो बिल्डिंग, किसी बड़े हादसे का है इंतजार?
  • शिवपुरी जिले के दो सरकारी स्कूल भवन आठ दिनों में गिर गए, जिसमें संयोग से कोई बच्चे सुरक्षित बच गए थे.
  • बादलहार स्कूल की जर्जर छत गिरने के बाद भी भवन की खराब स्थिति के संबंध में अधिकारियों को पहले से सूचना दी थी.
  • जिले में 409 स्कूल भवनों में से 313 जर्जर हालत में हैं, जहां बच्चे असुरक्षित वातावरण में पढ़ाई कर रहे हैं.

सुबह-सुबह कंधों पर बस्ता टांगे जब बच्चे स्कूल की ओर निकलते हैं, तो उनके माता-पिता यही सोचते हैं कि उनका लाडला पढ़-लिखकर बेहतर भविष्य बनाएगा. लेकिन एमपी के शिवपुरी जिले के सैकड़ों परिवारों के सामने आज एक डर खड़ा है- कहीं स्कूल की जर्जर दीवारें और कमजोर छतें उनके बच्चों के सपनों पर भारी न पड़ जाएं. बीते आठ दिनों में जिले के दो सरकारी स्कूल भवन ढह चुके हैं. संयोग अच्छा रहा कि दोनों बार बच्चे सुरक्षित बच गए. मगर सवाल यह है कि क्या हर बार किस्मत ही बच्चों की रखवाली करेगी, या फिर जिम्मेदार विभाग किसी बड़े हादसे के बाद जागेगा?

छुट्टी के बाद ढहा स्कूल का बरामदा

शिवपुरी जिले के कोलारस अनुभाग के शासकीय प्राथमिक विद्यालय बादलहार में शनिवार शाम करीब 4:30 बजे अतिरिक्त कक्ष और बरामदा अचानक भरभराकर गिर गया. राहत की बात यह रही कि उस समय स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी और बच्चे घर जा चुके थे. यदि यह हादसा कुछ घंटे पहले हुआ होता, तो कई मासूम इसकी चपेट में आ सकते थे. घटना का वीडियो रविवार को सामने आने के बाद पूरे मामले की जानकारी सार्वजनिक हुई.

आठ दिन में दूसरा स्कूल हादसा

यह कोई पहली घटना नहीं है. इससे पहले 3 जुलाई को बदरवास जनपद शिक्षा केंद्र के चक मोहम्मदपुर स्कूल की छत भी स्कूल समय के दौरान ढह गई थी. उस दिन भी बच्चे संयोगवश दूसरी इमारत में पढ़ाई कर रहे थे, जिससे बड़ा हादसा टल गया. लगातार दो घटनाओं ने सरकारी स्कूल भवनों की हालत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

केवल तार फेंसिंग के भरोसे छोड़ी सुरक्षा

स्कूल प्रबंधन के अनुसार, बादलहार विद्यालय वर्ष 1997 में शुरू हुआ था, जबकि अतिरिक्त कक्ष का निर्माण 2010 में हुआ था. समय के साथ भवन की हालत लगातार खराब होती गई. पिलरों में दरारें आ चुकी थीं और बरामदा भी जर्जर हो चुका था.

स्कूल प्रभारी कन्हैयालाल धाकड़ का कहना है कि भवन की जर्जर स्थिति की जानकारी कई महीने पहले वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों को लिखित रूप से दे दी थी. इसके बावजूद स्थायी समाधान करने की बजाय केवल आसपास तार फेंसिंग कर औपचारिकता पूरी कर दी.

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शासकीय प्राथमिक विद्यालय बादलहार की छत भरभराकर गिरी.  

बड़ा सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?

सवाल यह है कि क्या एक पतली तार फेंसिंग किसी गिरती हुई कंक्रीट की इमारत को रोक सकती है? अगर यह हादसा लंच ब्रेक, प्रार्थना सभा या खेल अवधि के दौरान होता, जब दर्जनों बच्चे परिसर में मौजूद रहते हैं, तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती थी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. आज जब दोनों घटनाओं में कोई जनहानि नहीं हुई, तब भी जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई है. ऐसे में लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहा है कि किसी अनहोनी की स्थिति में जवाबदेह कौन होता?

313 जर्जर स्कूलों में पढ़ रहे हैं बच्चे

जिले की स्थिति और भी चिंता बढ़ाने वाली है. एक सर्वे के अनुसार जिले में 409 स्कूल भवन जर्जर पाए गए थे. इनमें से केवल 96 भवनों की मरम्मत हो सकी है, जबकि 313 भवन अब भी असुरक्षित स्थिति में संचालित हो रहे हैं. इसका अर्थ है कि हजारों बच्चे रोज ऐसे कमरों में बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं, जिनकी दीवारें और छतें कभी भी जवाब दे सकती हैं. यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की चिंता और असुरक्षा की कहानी है.

नियम तो हैं, लेकिन पालन कहां?

सरकारी नियमों के अनुसार मानसून शुरू होने से पहले सभी स्कूल भवनों का सेफ्टी ऑडिट कराया जाना जरूरी है. यदि कोई भवन जर्जर घोषित होता है तो उसे खाली कर वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) भी स्पष्ट रूप से सुरक्षित स्कूल भवन की अनिवार्यता तय करता है. इसके बावजूद यदि जर्जर इमारतों में बच्चों की कक्षाएं संचालित हो रही हैं, तो यह नियमों की अनदेखी और बच्चों की सुरक्षा से समझौता माना जा सकता है.

ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश

लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद ग्रामीण इलाकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले हादसों से भी कोई सबक नहीं लिया गया. उनका आरोप है कि चेतावनियों और शिकायतों के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं. लोगों की चिंता यह है कि यदि समय रहते इन भवनों को खाली नहीं कराया गया और मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं हुआ, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है.

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