- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पैथोलॉजी लैब्स में रिपोर्ट की विश्वसनीयता और साइनिंग प्रक्रिया पर सख्त रुख अपनाया है
- कोर्ट ने एक पैथोलॉजिस्ट द्वारा कई लैब्स की रिपोर्टों पर हस्ताक्षर करने को मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन बताया है
- राज्य सरकार ने एक पैथोलॉजिस्ट को अधिकतम दो लैब्स तक सीमित करने का नियम 2024 में लागू किया था
MP High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश की पैथोलॉजी लैब्स में चल रही 'साइन की राजनीति' और रिपोर्ट्स की विश्वसनीयता पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी मरीज को 'सही और सटीक' मेडिकल रिपोर्ट मिलना उसका कोई मामूली हक नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है. चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान उन रिपोर्टों पर सवाल उठाए हैं, जो बिना डॉक्टर की मौजूदगी के केवल कागजों पर तैयार की जा रही हैं. हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सुनवाई के दौरान सिस्टम की खामियों को उजागर करते हुए कई कड़वे सवाल पूछे हैं.
"एक ही डॉक्टर और 26 लैब्स की रिपोर्ट्स पर साइन?"
सुनवाई के दौरान जब यह मामला सामने आया कि एक ही पैथोलॉजिस्ट 26 अलग-अलग लैब्स की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर रहा है, तो कोर्ट का पारा चढ़ गया. बेंच ने कड़े लहजे में पूछा— "आखिर एक इंसान एक दिन में कितनी रिपोर्ट देख सकता है और कितनी जगह मौजूद रह सकता है?" कोर्ट ने इस 'साइन कल्चर' को मेडिकल एथिक्स की हत्या करार दिया. कोर्ट का इशारा साफ था कि लैब में जांच तो अनट्रेंड टेक्नीशियन कर रहे हैं और पैथोलॉजिस्ट केवल शाम को आकर अपनी कलम घिस रहे हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी को खतरे में डालना है.

क्या है पूरा विवाद और सरकारी नियम?
दरअसल, यह पूरा मामला राज्य सरकार के उस आदेश से शुरू हुआ जिसमें एक पैथोलॉजिस्ट को अधिकतम 2 लैब्स तक सीमित करने की बात कही गई है. सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए महाकौशल एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्ट और आईएमए (IMA) समेत कई संगठनों ने याचिकाएं दायर की हैं. जहां कुछ संगठन इस नियम को डॉक्टरों के काम करने की आजादी में दखल मान रहे हैं, वहीं कुछ पक्ष मरीजों की सुरक्षा के लिए इसे जरूरी बता रहे हैं. बता दें कि सरकार ने 2024 में नियम बनाया था कि केवल पोस्ट ग्रेजुएट पैथोलॉजिस्ट ही लैब चला सकते हैं, लेकिन आरोप है कि जमीन पर इसका पालन नहीं हो रहा.
टेक्नीशियन के भरोसे चल रही हैं लैब्स?
याचिकाओं में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि प्रदेश में कई लैब्स बिना ट्रेंड डॉक्टर के केवल टेक्नीशियनों के भरोसे चल रही हैं. जहां गैर रजिस्टर्ड लोग रिपोर्ट्स तैयार कर रहे हैं और मरीजों की जिंदगी को जोखिम में डाल रहे हैं. कोर्ट ने इस 'आम धारणा' पर भी मुहर लगाई कि दिनभर लैब में जांच कोई और करता है और डॉक्टर सिर्फ अपनी कलम चलाने पहुंचते हैं. कोर्ट ने भी साफ किया कि सरकार का मकसद डॉक्टरों को रोकना नहीं, बल्कि मरीजों को फर्जीवाड़े से बचाना है.
अगली सुनवाई 12 मई को, मांगे गए सुझाव
इस गंभीर मामले में कोर्ट ने अब सभी पक्षों, जिनमें आईएमए (IMA) और अन्य मेडिकल संगठन शामिल हैं, से हवा-हवाई बातें करने के बजाय व्यावहारिक सुझाव मांगे हैं. कोर्ट ने पूछा है कि आखिर कैसे इस सिस्टम को पारदर्शी बनाया जाए ताकि मरीजों के साथ धोखाधड़ी बंद हो. मामले की अगली अहम सुनवाई 12 मई 2026 को होगी, जिसमें उम्मीद जताई जा रही है कि कोर्ट प्रदेश की पैथोलॉजी लैब्स के लिए कोई 'वाटर-टाइट' गाइडलाइन जारी कर सकता है.
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