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‘गुल्लू मियाँ’ से ‘पॉकेट विटनेस’ तक: जब MP के मऊगंज पुलिस ने अदालत को बना दिया ‘कास्टिंग स्टूडियो’

Mauganj Police Witness fraud: मऊगंज जिले में पुलिस द्वारा 500 से अधिक मामलों में रसोइया और ड्राइवर जैसे चुनिंदा लोगों को 'प्रोफेशनल गवाह' बनाने का बड़ा खुलासा हुआ है. जानिए कैसे डिजिटल रिकॉर्ड ने खोली सिस्टम की पोल.

‘गुल्लू मियाँ’ से ‘पॉकेट विटनेस’ तक: जब MP के मऊगंज पुलिस ने अदालत को बना दिया ‘कास्टिंग स्टूडियो’

Mauganj Pocket Witness Case: 1977 की फिल्म ‘ईमान-धरम' में अमिताभ बच्चन का वह दृश्य आज भी याद किया जाता है, जहां वे एक काल्पनिक ‘गुल्लू मियाँ' के नाम पर अदालत में बेखौफ झूठी गवाही देते हैं. जब उनसे पूछा जाता है कि “गुल्लू मियाँ” कितने लंबे हैं, तो वह एक हाथ उठाते हैं. जब वकील बताता है कि गुल्लू मियाँ तो मुर्गे का नाम है, तो अमिताभ दूसरा हाथ उठाकर अपने झूठ को ही दूसरे झूठ से सुधार देते हैं. लेकिन इसके 5 दशक बाद मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में कुछ ऐसा हुआ जो इस फिल्म से भी ज्यादा फिल्मी है. यहां पुलिस ने गवाहों को तलाशा नहीं, बल्कि उन्हें 'कास्ट' किया है. पुलिस के डिजिटल रिकॉर्ड (CCTNS) से हुए एक चौंकाने वाले खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि कैसे कुछ चुनिंदा लोगों—ड्राइवर, रसोइया और सफाईकर्मियों—को 500 से ज्यादा आपराधिक मामलों में 'प्रोफेशनल गवाह' की तरह इस्तेमाल किया गया. आरोप है कि तत्कालीन थाना प्रभारी की पसंद के ये गवाह उनके ट्रांसफर के साथ-साथ एक थाने से दूसरे थाने तक का सफर तय करते रहे, जिससे न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

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चलता-फिरता गवाह और जादुई उम्र का खेल

इस पूरे प्रकरण का केंद्र बिंदु अमित कुशवाहा नामक व्यक्ति है, जो तत्कालीन थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर का निजी ड्राइवर है. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, जहां-जहां ठाकुर की पोस्टिंग हुई, वहां-वहां अमित गवाह के तौर पर जुड़ता चला गया. अमित और थाने में खाना बनाने वाले दिनेश कुशवाहा संयुक्त रूप से 106 मामलों में गवाह या मुखबिर दर्ज हैं. विडंबना देखिए कि सरकारी दस्तावेजों में अमित की उम्र भी किसी चमत्कार से कम नहीं है. साल 2020 में पुलिस रिकॉर्ड में उसकी उम्र 20 साल दर्ज थी, जो पांच साल बीत जाने के बाद 2025 में सिर्फ 21 साल दिखाई गई है. स्थानीय लोग अब अमित को 'चलता-फिरता गवाह' कहने लगे हैं, क्योंकि शहर के किसी भी कोने में कोई भी अपराध हो, कागजों पर गवाह वही पाया जाता है.

रसोइया से लेकर दिव्यांग तक, सब बने ‘पॉकेट विटनेस'

पुलिस की इस ‘स्टॉक गवाहों' की सूची में केवल ड्राइवर ही नहीं, बल्कि समाज के सबसे निचले तबके के लोग भी शामिल हैं. थाने में सब्जी बेचने और खाना बनाने वाले दिनेश कुशवाहा का नाम 100 से अधिक मामलों में दर्ज है, जबकि उनका कहना है कि उन्होंने सिर्फ एक ही मामले में दस्तखत किए थे. इसी तरह थाने के पास रहने वाले दिव्यांग अरुण तिवारी को पहले छह मामलों में गवाह बनाया गया और बाद में उन्हीं पर लूट का केस दर्ज कर दिया गया. थाने में सफाई करने वाले रमाकांत यादव और गाड़ी चलाने वाले राहुल विश्वकर्मा भी दर्जनों मामलों में गवाह हैं, लेकिन उन्हें खुद नहीं पता कि कब और कहां उन्होंने गवाही दी. इन लोगों का सीधा आरोप है कि पुलिस अपनी सुविधा के अनुसार कागजों पर इनके नाम लिख देती थी.

Mauganj Police Witness Controversy: राहुल विश्वकर्मा और दिनेश कुशवाहा नाम के ये दो शख्स कई केस में गवाही दे चुके हैं.

Mauganj Police Witness Controversy: राहुल विश्वकर्मा और दिनेश कुशवाहा नाम के ये दो शख्स कई केस में गवाही दे चुके हैं.

डिजिटल रिकॉर्ड ने खोली सिस्टम की पोल

यह पूरी साजिश तब उजागर हुई जब पुलिस के अपने ही क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग एंड नेटवर्क सिस्टम (CCTNS) पोर्टल के डेटा का विश्लेषण किया गया. सामाजिक कार्यकर्ता कुंजबिहारी तिवारी की शिकायत के बाद सामने आया कि 2022 से 2025 के बीच दर्ज की गई लगभग 150 एफआईआर फर्जी या मनगढ़ंत हो सकती हैं. एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर हुई पांच घटनाओं में भी वही एक व्यक्ति गवाह के रूप में मौजूद दिखाया गया है. पोर्टल के आंकड़ों ने साबित कर दिया कि सबूत जुटाने के बजाय पुलिस ने गवाहों का एक ऐसा ‘सेट-अप' तैयार कर रखा था, जो गांजा, अवैध शराब और हथियारों के मामलों में पुलिस की कहानी को कानूनी जामा पहना सके.

रसूखदार अफ़सर पर गाज और न्याय की उम्मीद

मामले की गंभीरता को देखते हुए मऊगंज एसपी दिलीप कुमार सोनी ने तत्कालीन थाना प्रभारी जगदीश सिंह ठाकुर को लाइन हाजिर कर दिया है और मामले की जांच एसडीओपी को सौंपी गई है. इस मामले पर राजनीतिक गलियारों में भी हलचल है, जहां पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने इसे ‘सेट-अप गवाह' का गंभीर मामला बताते हुए सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ़ एक अफ़सर की कहानी नहीं है, बल्कि पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली पर सवाल है.

जब गवाह गढ़े जाने लगें, तो जांच जांच नहीं रहती, वह पटकथा बन जाती है, जिसमें सच बाद में और काग़ज़ पहले आते हैं. मऊगंज में पुलिस की अपनी डिजिटल व्यवस्था ने यह दिखा दिया कि कैसे सबूत की जगह काग़ज़ भर दिए गए, कैसे गरीब और असहाय लोगों को बार-बार इस्तेमाल किया गया, और कैसे न्याय की आंख पर बंधी पट्टी को सुविधा का औज़ार बना लिया गया.एक अफ़सर का तबादला शायद शुरुआत है, लेकिन यह उन सैकड़ों लोगों का जवाब नहीं है जिनकी ज़िंदगी ऐसे मामलों से प्रभावित हुई होगी. मऊगंज में सच किसी नाटकीय स्वीकारोक्ति से नहीं, बल्कि एक कंप्यूटर स्क्रीन से सामने आया जिसने चुपचाप बता दिया कि अपराध बदलते रहे, थाने बदलते रहे, लेकिन गवाह वही रहे.

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