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अच्छी पहल: पिता के निधन के बाद बदली मृत्यु भोज की परंपरा, अनाथ बेटी का किया कन्यादान 

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के नौगांव में स्वर्गीय गोपाल कठेल के परिवार ने मृत्यु भोज की जगह एक अनाथ बेटी का कन्यादान कर मानवीयता की अनोखी मिसाल पेश की. कामाख्या कठेल और समाजसेविका तृप्ति कठेल ने लक्ष्मी अनुरागी के विवाह में 75 प्रकार की सामग्री भेंट की और सामाजिक जिम्मेदारी निभाई.

अच्छी पहल: पिता के निधन के बाद बदली मृत्यु भोज की परंपरा, अनाथ बेटी का किया कन्यादान 

Viral Social Reform Story: अच्छी पहल हमेशा समाज में नई रोशनी लेकर आती है. मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के नौगांव में एक परिवार ने पिता के निधन के बाद मृत्यु भोज की परंपरा तोड़कर मानवता की अनोखी मिसाल पेश की है. जहां आमतौर पर परिवारजन शोक सभा और भोज करते हैं, वहीं स्वर्गीय गोपाल कठेल के परिवार ने एक अनाथ बेटी का कन्यादान कर समाज को नई दिशा देने का काम किया है. यह कदम न सिर्फ संवेदनशीलता का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का प्रेरक उदाहरण भी बन गया है.

मृत्यु भोज की जगह मानवता का निर्णय

स्वर्गीय गोपाल कठेल के पुत्र कामाख्या उर्फ कान्हा कठेल और उनकी पत्नी और समाजसेविका तृप्ति कठेल ने मृत्यु भोज न करने का फैसला लिया. इसकी जगह उन्होंने एक अनाथ बेटी के विवाह में सहयोग करने का संकल्प लिया. उनका यह निर्णय समाज में सकारात्मक बदलाव की सोच को मजबूत करता है.

अनाथ बेटी लक्ष्मी के विवाह में निभाई जिम्मेदारी

करीब दस साल पहले अपने माता‑पिता को खो चुकी लक्ष्मी अनुरागी की शादी में कठेल परिवार ने पूरे मन से साथ दिया. यह मदद सिर्फ आर्थिक नहीं थी, बल्कि बेटी के प्रति सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी निभाने जैसा था. इस सहयोग ने एक परिवार के दुख को किसी और की खुशी में बदल दिया.

75 प्रकार का विवाह सामग्री उपहार में दी

कठेल परिवार ने लक्ष्मी को 75 तरह की विवाह सामग्री भेंट की. इसमें 32 इंच की एलसीडी, कूलर, अलमारी, सोने की कील, चांदी की चुटकी, 21,000 रुपये की एफडी और 5,100 रुपये नकद शामिल थे. ये उपहार न केवल बेटी के नए जीवन की शुरुआत के लिए सहारा बने बल्कि परिवार की उदारता का प्रमाण भी हैं.

समाज के लिए सकारात्मक संदेश

यह पहल केवल एक परिवार की व्यक्तिगत संवेदना नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश है. मृत्यु भोज जैसी परंपराओं पर पुनर्विचार करते हुए जरूरतमंदों की मदद करना मानवता की असली पहचान है. कठेल परिवार की यह सोच बताती है कि यदि नीयत सही हो तो दुख के माहौल में भी अच्छे कामों की मिसाल कायम की जा सकती है.

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