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15 दिन में हिंदी सीख जाते हैं पहली कक्षा के बच्चे, नवंबर तक सिलेबस पूरा; कोरिया के स्कूल का अनोखा शिक्षा मॉडल

क्या कोई बच्चा सिर्फ 15 दिन में हिंदी पढ़ना सीख सकता है? छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का डकईपारा सरकारी स्कूल यही कर दिखा रहा है. यहां बच्चों को किताबें रटाई नहीं जातीं, खास ढंग से पढ़ाया से जाता है. यह स्कूल नवंबर तक पूरा सिलेबस खत्म कर देता है और कई सम्मान हासिल कर चुका है.

15 दिन में हिंदी सीख जाते हैं पहली कक्षा के बच्चे, नवंबर तक सिलेबस पूरा; कोरिया के स्कूल का अनोखा शिक्षा मॉडल
छत्तीसगढ़ का यह स्कूल बना सीखने का मॉडल
NDTV
  • डकईपारा स्कूल का अनोखा मॉडल, नवंबर तक पूरा हो जाता है सिलेबस
  • 15 दिन में हिंदी पढ़ना सीख जाते हैं इस सरकारी स्कूल के बच्चे
  • खेल, डांस और तस्वीरों से पढ़ाई, बच्चों को नहीं करनी पड़ती रटाई
रायपुर:

सरकारी स्कूलों को लेकर अक्सर बुनियादी शिक्षा और सीखने के स्तर पर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का शासकीय प्राथमिक शाला डकईपारा इन धारणाओं को चुनौती देता नजर आता है. यहां पहली कक्षा में आने वाले बच्चे महज 15 से 20 दिनों के भीतर हिंदी पढ़ना सीख जाते हैं, जबकि पूरे विद्यालय का वार्षिक पाठ्यक्रम नवंबर तक पूरा कर लिया जाता है. इस उपलब्धि के पीछे कोई चमत्कार नहीं, बल्कि वर्षों से अपनाई जा रही एक व्यवस्थित शिक्षण पद्धति है, जिसमें बच्चों को उनके परिवेश, खेल, चित्रों और गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर दिया जाता है.

तस्वीरों और गतिविधियों से शुरू होती है सीखने की यात्रा

विद्यालय में पहली कक्षा के बच्चों को सीधे किताबों के कठिन पाठ नहीं पढ़ाए जाते. शुरुआत तस्वीरों और चित्रों के माध्यम से होती है. बच्चों को पहले उनके आसपास दिखाई देने वाली वस्तुओं, जानवरों, पेड़-पौधों और दैनिक जीवन से जुड़ी चीजों के चित्र दिखाए जाते हैं. इसके बाद इन चित्रों को अक्षरों से और अक्षरों को शब्दों से जोड़ने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. धीरे-धीरे बच्चे शब्द पहचानने लगते हैं और फिर उन्हें पढ़ने का प्रयास करने लगते हैं. यही पद्धति उन्हें बहुत कम समय में पढ़ने योग्य बना देती है.

कोरिया जिले के इस स्कूल के बच्चे कर रहे हैं कमाल

कोरिया जिले के इस स्कूल के बच्चे कर रहे हैं कमाल
Photo Credit: NDTV

15 दिन में पढ़ना सीख जाते हैं बच्चे

कक्षा पहली की छात्रा प्रियांशी बताती है कि उसने लगभग 15 दिनों में हिंदी पढ़ना सीख लिया और अब वह किताब देखकर पढ़ सकती है. वहीं कक्षा दूसरी की छात्रा दीपाली के मुताबिक विद्यालय में आने वाले अधिकांश बच्चे करीब 15 दिनों के भीतर हिंदी पढ़ना शुरू कर देते हैं. बच्चों की यह प्रगति स्कूल की शिक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता को दर्शाती है.

नवंबर तक सिलेबस पूरा, पहली कक्षा के बच्चे 15 दिनों सीख जाते हैं हिंदी

नवंबर तक सिलेबस पूरा, पहली कक्षा के बच्चे 15 दिनों सीख जाते हैं हिंदी
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लोगोग्राफी पठन पद्धति का इस्तेमाल

विद्यालय की शिक्षिका अर्पणा मिश्रा बताती हैं कि पहली कक्षा में उनका सबसे बड़ा लक्ष्य बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी पढ़ना सिखाना होता है. उनके अनुसार यदि बच्चा भाषा पढ़कर समझने लगता है तो अन्य विषयों को सीखना भी उसके लिए आसान हो जाता है. इसी उद्देश्य से विद्यालय में लोगोग्राफी पठन पद्धति का उपयोग किया जाता है. इस पद्धति में चित्रों और स्थानीय परिवेश को आधार बनाकर बच्चों को पढ़ाया जाता है, जिससे वे विषय को जल्दी समझते हैं.

हर बच्चे के लिए अलग तरीका

विद्यालय की खासियत यह है कि यहां सभी बच्चों को एक ही तरीके से पढ़ाने की बजाय उनकी सीखने की क्षमता के अनुसार शिक्षण पद्धति अपनाई जाती है. शिक्षा सारथी के रूप में सहयोग कर रहीं आंचल कुर्रे बताती हैं कि बच्चों को खेल, डांस और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाया जाता है. यदि कोई बच्चा सामान्य शिक्षण पद्धति से नहीं सीख पाता तो उसके लिए खेल आधारित तरीकों का उपयोग किया जाता है. इससे बच्चे बिना दबाव के सीखते हैं.

बच्चों की रचनात्मकता पर जोर

बच्चों की रचनात्मकता पर जोर
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नवंबर तक पूरा हो जाता है सिलेबस

प्रधान पाठक रामेश्वर प्रसाद सिंह बताते हैं कि स्कूल में पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया एक नियमित शैक्षणिक योजना का हिस्सा है. शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में ही यह तय कर लिया जाता है कि किस अवधि में कौन-कौन से पाठ पूरे कराने हैं. उसी अनुसार गतिविधियां, अभ्यास और मूल्यांकन की योजना बनाई जाती है. बच्चों से किताब, स्लेट और कॉपी पर अभ्यास कराने के बाद अभ्यास पुस्तिका में भी कार्य कराया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्होंने विषय को वास्तव में समझा है. इसी सुनियोजित प्रयास का परिणाम है कि विद्यालय में हर साल नवंबर तक पूरा पाठ्यक्रम समाप्त हो जाता है.

सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान तैयार हुए बच्चे

सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान तैयार हुए बच्चे
Photo Credit: NDTV

पीछे रह जाने वाले बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं

विद्यालय की सोच है कि कोई भी बच्चा सीखने की प्रक्रिया में पीछे न छूटे. इसके लिए जिन बच्चों को किसी विषय में अतिरिक्त मदद की जरूरत होती है, उनके लिए स्कूल समय से पहले प्रतिदिन लगभग एक घंटे की अतिरिक्त कक्षा संचालित की जाती है. इन कक्षाओं में बच्चों की कमजोरियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और उन्हें व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया जाता है.

भोजन के दौरान की तस्वीर

भोजन के दौरान की तस्वीर
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पढ़ाई के साथ सर्वांगीण विकास पर जोर

डकईपारा स्कूल में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है. विद्यालय में बच्चों के लिए पेंटिंग, योग, खेलकूद, बागवानी और अन्य रचनात्मक गतिविधियां भी नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं. शिक्षकों का मानना है कि बच्चा केवल किताबों से नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवेश से सीखता है. इसलिए विद्यालय में बच्चों को पेड़-पौधों और प्रकृति से जोड़ने का भी प्रयास किया जाता है.

पुराने विद्यार्थी भी बन रहे शिक्षा सारथी

विद्यालय की एक अनूठी पहल यह भी है कि यहां पढ़ चुके पुराने विद्यार्थी अब शिक्षा सारथी के रूप में स्कूल से जुड़े हुए हैं. कॉलेज और हायर सेकेंडरी में अध्ययन कर रहे छात्र अपने खाली समय में स्कूल पहुंचकर छोटे बच्चों की पढ़ाई में सहयोग करते हैं. इससे बच्चों को अतिरिक्त मार्गदर्शन मिलता है और विद्यालय तथा समाज के बीच संबंध भी मजबूत होते हैं.

शाला में प्रवेश उत्सव के दौरान भोजन करते हुए बच्चे

शाला में प्रवेश उत्सव के दौरान भोजन करते हुए बच्चे
Photo Credit: NDTV

स्कूल को मिल चुके हैं कई सम्मान

विद्यालय के लगातार बेहतर प्रदर्शन और नवाचारपूर्ण शिक्षण पद्धति को जिला और राज्य स्तर पर कई सम्मान मिल चुके हैं. इसके अलावा विद्यालय को राज्यपाल सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है. शिक्षकों का कहना है कि यह सफलता किसी एक वर्ष का परिणाम नहीं, बल्कि कई वर्षों से लगातार किए जा रहे प्रयासों का प्रतिफल है.

शिक्षा का बना मॉडल स्कूल

शासकीय प्राथमिक शाला डकईपारा आज इस बात का उदाहरण बन गया है कि यदि सही रणनीति, नियमित अभ्यास और बच्चों की जरूरतों के अनुसार शिक्षण पद्धति अपनाई जाए तो सरकारी स्कूल भी उत्कृष्ट परिणाम दे सकते हैं.

15 दिनों में बच्चों को पढ़ना सिखाने से लेकर नवंबर तक पूरा सिलेबस खत्म करने और सर्वांगीण विकास पर जोर देने तक, डकईपारा स्कूल ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो अन्य विद्यालयों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है.

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