- NCERT की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में सिख इतिहास को प्रमुखता
- मुगल शासन और सिख गुरुओं के संघर्ष का विस्तृत उल्लेख
- नई किताब में गुरु अर्जन देव से गुरु गोबिंद सिंह तक की चर्चा
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक (Textbook) में सिख इतिहास और मुगल शासन से जुड़े घटनाक्रमों को प्रमुखता से शामिल किया गया है. नई पुस्तक में मुगल शासकों द्वारा सिख गुरुओं के साथ किए गए व्यवहार का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह इतिहास की सबसे कठोर घटनाओं में से एक था. पुस्तक के अनुसार मुगल शासन की धार्मिक और भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण सिख गुरुओं और उनके अनुयायियों को लगातार दबाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसने सिख समुदाय को संगठित प्रतिरोध की दिशा में आगे बढ़ाया.
छह महीने बाद दूसरा भाग जारी
एनसीईआरटी द्वारा तैयार की गई कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड - पार्ट 2' मंगलवार को जारी की गई. शैक्षणिक सत्र शुरू होने के करीब छह महीने बाद पुस्तक का दूसरा भाग जारी किया गया है. पहला भाग जून में प्रकाशित किया गया था. पुस्तक के 'रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस' शीर्षक अध्याय में सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए आक्रमणों और उनके प्रभावों का उल्लेख किया गया है.

NCERT किताब का कवर
सिख गुरुओं पर अत्याचार का जिक्र
पुस्तक में कहा गया है कि सिख गुरुओं के खिलाफ मुगल शासन की कठोर कार्रवाई इतिहास की उन घटनाओं में शामिल है, जिनके बहुत कम तुलनात्मक उदाहरण मिलते हैं. अध्याय के अनुसार गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और दसवें सिख गुरु गुरु गोबिंद सिंह के संघर्ष, साहस और बलिदान ने सिख धर्म की पहचान को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पुस्तक में यह भी कहा गया है कि इन घटनाओं के पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं थे, बल्कि मुगल शासन की कठोर धार्मिक और भेदभावपूर्ण नीतियां भी महत्वपूर्ण कारक थीं.
बढ़ते प्रभाव से चिंतित था मुगल शासन
पाठ्यपुस्तक के अनुसार सिख गुरुओं का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा था, जिसके चलते 17वीं शताब्दी की शुरुआत से ही मुगल सत्ता उनके मामलों में हस्तक्षेप करने लगी थी. अध्याय में कहा गया है कि सिख समाज के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता ने सत्ता को चिंतित किया, जिसके कारण टकराव की स्थिति पैदा हुई.
गुरु अर्जन देव की शहादत का उल्लेख
पुस्तक में बताया गया है कि मुगल सम्राट जहांगीर ने अपने विद्रोही पुत्र खुसरो मिर्जा को कथित समर्थन देने के आरोप में गुरु अर्जन देव को मृत्युदंड देने का आदेश दिया था. पाठ्यपुस्तक इसे सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताती है. इसके बाद सिख समुदाय की संगठनात्मक और राजनीतिक दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया.
गुरु हरगोबिंद और ग्वालियर किला
अध्याय में गुरु हरगोबिंद का भी उल्लेख किया गया है. किताब के अनुसार जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद को ग्वालियर किले में बंदी बनाया था. इस दौरान बड़ी संख्या में सिख अनुयायी किले के बाहर पहुंचकर श्रद्धा व्यक्त करते रहे. पुस्तक में आगे बताया गया है कि गुरु हरगोबिंद ने अकाल तख्त की स्थापना की, जो लौकिक अधिकार के केंद्र के रूप में विकसित हुआ.
गुरु तेग बहादुर की शहादत
पाठ्यपुस्तक में लिखा गया है कि वर्ष 1675 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने नौवें सिख गुरु गुरु तेग बहादुर को मृत्युदंड देने का आदेश दिया था. किताब के अनुसार गुरु तेग बहादुर का बलिदान भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. इस घटना ने सिख समुदाय को और अधिक संगठित होने की प्रेरणा दी.
‘प्रतिरोध और दृढ़ता' की भावना हुई मजबूत
एनसीईआरटी की पुस्तक में कहा गया है कि सिख गुरुओं की शहादत ने समुदाय में यह विश्वास मजबूत किया कि उत्पीड़न का सामना दृढ़ प्रतिरोध और सामूहिक संगठन के जरिए किया जाना चाहिए. अध्याय के अनुसार लगातार बढ़ते दबाव और उत्पीड़न ने सिख समाज को आत्मरक्षा और संगठन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
‘मीरी-पीरी' अवधारणा का भी उल्लेख
पुस्तक में गुरु हरगोबिंद द्वारा विकसित ‘मीरी-पीरी' की अवधारणा का भी जिक्र किया गया है. इस अवधारणा को आध्यात्मिक और सांसारिक सत्ता के संतुलन के प्रतीक के रूप में बताया गया है. साथ ही अकाल तख्त की स्थापना को सिख इतिहास में एक महत्वपूर्ण संस्थागत विकास माना गया है. नई पाठ्यपुस्तक में इन घटनाओं को सिख समुदाय की पहचान, प्रतिरोध की भावना और ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है.
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