- बस्तर क्षेत्र के कुख्यात नक्सली नेता पापा राव ने 17 साथियों के साथ हथियार डालने का फैसला किया है
- पापा राव ने NDTV टीम की मदद से जंगल छोड़कर सरेंडर किया और लोकतंत्र की मुख्यधारा में लौटने को तैयार हैं
- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पापा राव के सरेंडर का स्वागत करते हुए पुनर्वास नीति का लाभ लेने को कहा
Papa Rao Surrender: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में 24 मार्च का दिन ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया है. दशकों तक बस्तर और आसपास के इलाकों में खौफ का दूसरा नाम बना रहा खूंखार नक्सली लीडर पापा राव अब मुख्यधारा में लौटने को तैयार है. सरेंडर करने के लिए वो बकायदा जंगल से निकल कर आ गया है. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी बात यह है कि पापा राव को लोकतंत्र की राह पर लाने में NDTV की टीम ने एक पुल के तौर पर निर्णायक भूमिका निभाई है. पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ हथियार डालने का फैसला किया है, जो छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त करने के अभियान में अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी मानी जा रही है.पापा राव के सरेंडर करने के फैसले का खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि अब भी जो नक्सली जंगलों में हैं वो भी समाज की मुख्यधारा में लौटें और सरकार की पुनर्वास नीति का फायदा उठाएं. उन्होंने बताया कि अब भी कई नक्सली सरकार के संपर्क में हैं.
पापा राव ने क्यों बदला अपना मन?
NDTV से खास बातचीत में पापा राव ने अपने दिल की बात साझा की. उसने बताया कि 1994 में संगठन में भर्ती होने के बाद से वह लंबे समय तक सशस्त्र लड़ाई का हिस्सा रहा, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. पापा राव का कहना है, "मैंने सोचा कि सरकार ने 31 मार्च तक सरेंडर की जो तारीख तय की है, वह एक मौका है. आजकल जंगलों में सुरक्षा बलों की इतनी घेराबंदी (कैपिंग) है कि हमारा मूवमेंट करना लगभग नामुमकिन हो गया है. इसीलिए मैंने तय किया कि अब हथियारबंद लड़ाई छोड़ दूंगा."
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संविधान पर भरोसा और पुनर्वास नीति
पापा राव ने स्पष्ट किया कि वह अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटा है, बल्कि उसने लड़ाई का तरीका बदला है. उसने कहा, "हम अब भी जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ेंगे, लेकिन अब यह लड़ाई भारतीय संविधान के दायरे में रहकर लड़ी जाएगी." सरकार की नीतियों पर बात करते हुए उसने माना कि उसे सरकार की 'पुनर्वास नीति' पसंद आई है और वह इससे प्रभावित है. दिलचस्प बात यह है कि बड़े नक्सली नेता देव जी के सरेंडर के बाद भी पापा राव का मन नहीं बदला था, लेकिन अब उसे लगता है कि हथियारबंद आंदोलन जारी रखना संभव नहीं है.

31 मार्च की डेडलाइन और खत्म होता लाल आतंक
सरकार ने छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त करने के लिए 31 मार्च 2026 का लक्ष्य रखा है. पापा राव जैसे कद्दावर नेता के सरेंडर के बाद अब राज्य में केवल तीन बड़े नक्सल लीडर हेमला बिच्चा, सोढ़ी केशा और महिला कमांडर रूपी ही बचे हैं. जानकारों का मानना है कि पापा राव के इस फैसले का असर उन पर भी पड़ेगा और अगले कुछ दिनों में वे भी सरेंडर कर सकते हैं. पिछले दो सालों में करीब 2871 नक्सलियों का मुख्यधारा में लौटना इस बात का सबूत है कि अब बस्तर की वादियों में आतंक के बजाय अमन की बयार बहने वाली है.
बदली रणनीति और जनता का विश्वास
अहम ये भी है कि नक्सली लीडर पापा राव ने सरेंडर से पहले राज्य के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा से भी बात की. उनसे बातचीत के बाद पापा राव ने संतुष्टि जताई और सरेंडर की बात फाइनल की. उप मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकार की प्राथमिकता केवल बंदूक चलाना नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा जीतना है. 'नियत नेल्लानार' जैसी योजनाओं के जरिए अंदरूनी गांवों तक विकास पहुंचाना और स्थानीय आदिवासियों को सुरक्षा का अहसास कराना ही इस सफलता की असली कुंजी है. हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि 31 मार्च के बाद भी सुरक्षा में कोई कमी नहीं आएगी और एजेंसियां पूरी तरह मुस्तैद रहेंगी ताकि शांति का यह दौर स्थायी बना रहे.
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