लोकसभा में रखे गए एक लिखित जवाब ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ड्रोन अपनाने की रफ्तार पर नया सवाल खड़ा कर दिया है. एक तरफ केंद्र सरकार देश में ड्रोन इकोसिस्टम को उदार और आसान बनाने का दावा कर रही है, दूसरी तरफ आंकड़े बताते हैं कि मध्यभारत की उड़ान अभी भी बेहद धीमी है. सांसद साजदा अहमद द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में नागर विमानन मंत्रालय में राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने सदन को बताया कि सरकार ने ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में विकासात्मक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ड्रोन नियम, 2021 लागू किए हैं. मंत्री ने कहा कि इन नियमों का उद्देश्य सुरक्षित, संरक्षित और विनियमित संचालन सुनिश्चित करना है.
देश के 90 प्रतिशत हवाई क्षेत्र ‘ग्रीन जोन'
सरकार ने 2023 और 2024 में संशोधन कर नियमों को और सरल बनाया. रिमोट पायलट सर्टिफिकेट के लिए पासपोर्ट की अनिवार्यता हटा दी गई, ड्रोन पंजीकरण और ट्रांसफर की प्रक्रिया आसान की गई. इतना ही नहीं, देश के लगभग 90 प्रतिशत हवाई क्षेत्र को ‘ग्रीन जोन' घोषित कर दिया गया है, जहां बिना पूर्व अनुमति ड्रोन उड़ाए जा सकते हैं. 2022 में मानवरहित विमान प्रणाली के लिए प्रमाणन योजना भी अधिसूचित की गई, ताकि वैश्विक मानकों के अनुरूप संचालन हो सके. दुरुपयोग रोकने के लिए यूआईएन (विशिष्ट पहचान संख्या), वैध रिमोट पायलट प्रमाणपत्र, डीजीसीए-अधिकृत प्रशिक्षण संस्थान और हथियार या खतरनाक सामग्री की ढुलाई पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं. लेकिन संसद में रखे गए राज्यवार आंकड़े एक अलग कहानी बयान करते हैं.
MP में केवल 480 ड्रोन पंजीकृत
31 जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में केवल 480 ड्रोन पंजीकृत हैं, जबकि पड़ोसी छत्तीसगढ़ में यह संख्या मात्र 161 है. इसके विपरीत महाराष्ट्र 8,210 ड्रोन के साथ देश में शीर्ष पर है. तमिलनाडु (5,878), तेलंगाना (3,657), कर्नाटक (3,258), हरियाणा (2,179) और आंध्र प्रदेश (1,876) जैसे राज्य भी काफी आगे हैं. पूरे देश में कुल 38,475 ड्रोन पंजीकृत हैं.
2 करोड़ रुपये तक दिया जाएगा अनुदान
ये आंकड़े मध्य प्रदेश के लिए असहज सवाल खड़े कर रहे हैं, खासकर तब जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार राज्य को “ड्रोन हब” बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है. हाल ही में लागू की गई “एमपी ड्रोन संवर्धन व उपयोग नीति-2025” के तहत सरकार ने भारी वित्तीय प्रोत्साहन की घोषणा की है. नीति के अनुसार ड्रोन निर्माण इकाइयों को 40 प्रतिशत तक की कैपिटल सब्सिडी (अधिकतम 30 करोड़ रुपये) और अनुसंधान एवं विकास के लिए 2 करोड़ रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा.
इसके बावजूद, ड्रोन पंजीकरण के मामले में मध्य प्रदेश देशभर में 13वें स्थान पर है. हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे अपेक्षाकृत छोटे औद्योगिक राज्य भी इससे आगे निकल चुके हैं. विशाल कृषि क्षेत्र, व्यापक वन क्षेत्र, खनन बेल्ट और तेजी से विकसित होते इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर वाले राज्य में ड्रोन तकनीक खेती, सर्वेक्षण, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है लेकिन 480 का आंकड़ा धीमी स्वीकार्यता का संकेत देता है.
छत्तीसगढ़ की स्थिति और भी चिंताजनक है. वन निगरानी, आपदा प्रबंधन और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य आपूर्ति जैसी जरूरतों के बावजूद 161 पंजीकृत ड्रोन राज्य की सीमित भागीदारी को दर्शाते हैं. संसद में रखे गए इन आंकड़ों से साफ है कि आसमान तो खुल गया है.अब देखना यह है कि मध्यभारत कब सच में उड़ान भरता है.
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