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This Article is From Apr 23, 2026

धार भोजशाला केस: हाईकोर्ट में मुस्लिम पक्ष का दावा- मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने का कोई सबूत नहीं

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में धार भोजशाला केस की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है. वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने हिंदू पक्ष के दावों को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक दस्तावेजों की गहन जांच की मांग की.

धार भोजशाला केस: हाईकोर्ट में मुस्लिम पक्ष का दावा- मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने का कोई सबूत नहीं

Bhojshala Case High Court Update: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में धार भोजशाला से जुड़ा विवाद एक बार फिर चर्चा में है. इस मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से बड़ा दावा किया गया है. याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि धार शहर में किसी खास मंदिर को किसी खास दौर में गिराकर उसी जगह मस्जिद बनाए जाने का कोई ठोस या प्रमाणिक सबूत मौजूद नहीं है. मुस्लिम पक्ष ने हिंदू पक्ष के दावों को सिरे से खारिज करते हुए पूरे मामले में ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों की गहन जांच की मांग की है.

हिंदू पक्ष के दावे पर मुस्लिम पक्ष का जवाब

भोजशाला मंदिर‑कमाल मौला मस्जिद विवाद में हिंदू पक्ष का कहना है कि परमार वंश के राजा भोज ने 1034 में भोजशाला परिसर में देवी सरस्वती का मंदिर बनवाया था, जिसे अलाउद्दीन खिलजी के आदेश पर 1305 में तोड़ दिया गया और उसी के अवशेषों से मस्जिद बनाई गई. मुस्लिम पक्ष ने इन दावों को अदालत में चुनौती दी और कहा कि ऐसे किसी मंदिर ध्वंस का कोई भरोसेमंद प्रमाण सामने नहीं लाया गया है.

भोजशाला को लेकर दोनों पक्षों की मान्यता

हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है. यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक है, जिसको लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा है.

इंदौर पीठ में लगातार चल रही सुनवाई

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ भोजशाला के धार्मिक स्वरूप से जुड़े विवाद पर दाखिल चार याचिकाओं और एक रिट अपील की नियमित सुनवाई कर रही है. छह अप्रैल से इस मामले में लगातार बहस हो रही है और दोनों पक्ष अपनी‑अपनी दलीलें रख रहे हैं.

सलमान खुर्शीद ने पेश की विस्तृत दलीलें

मुस्लिम पक्ष की ओर से धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने साफ कहा कि किसी ‘विशिष्ट मंदिर' को किसी ‘विशिष्ट समय' में तोड़े जाने और उसी जगह मस्जिद बनाए जाने का कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है.

मूर्ति और ब्रिटिश म्यूजियम का हवाला

सलमान खुर्शीद ने 2003 में ब्रिटिश उच्चायोग द्वारा मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे गए कथित पत्र का भी जिक्र किया. साथ ही उन्होंने यह दावा किया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू पक्ष वाग्देवी यानी देवी सरस्वती की प्रतिमा बता रहा है, वह असल में जैन समुदाय की देवी अम्बिका की मूर्ति है.

अयोध्या फैसले का संदर्भ

खुर्शीद ने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि‑बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धार के मामले में भी मालिकाना हक का फैसला दीवानी कानून के स्थापित सिद्धांतों और सबूतों के मानकों के आधार पर ही होना चाहिए. उन्होंने जोर दिया कि पेश किए गए सभी दस्तावेजों और ग्रंथों की प्रमाणिकता की गहराई से जांच जरूरी है.

धार के इतिहास का किया उल्लेख

मुस्लिम पक्ष के वकील ने रामसेवक गर्ग की किताब ‘हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह और उनका युग' का हवाला दिया. उन्होंने बताया कि धार शहर अपने इतिहास में कई हमलों, लूट‑पाट, विध्वंस और पुनर्निर्माण का गवाह रहा है, जिनमें हिंदू राजा भी शामिल थे.

1305 की घटना पर सवाल

खुर्शीद ने कहा कि 1305 में ऐन‑उल‑मुल्क मुल्तानी के सामने धार को लूटने या जीतने की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि मांडू पर कब्जे के बाद उसे धार में सिर्फ शासन व्यवस्था स्थापित करनी थी. इतिहासकारों के अनुसार ऐन‑उल‑मुल्क मुल्तानी, अलाउद्दीन खिलजी का अनुभवी सेनापति और प्रशासक था.

मस्जिद निर्माण पर मुस्लिम पक्ष का पक्ष

मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा कि विवादित परिसर में अजमेर के चिश्तिया सिलसिले के सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन से जुड़ी मस्जिद का निर्माण तत्कालीन शासक द्वारा कराया गया था. उन्होंने हिंदू पक्ष के इस आरोप को भी खारिज किया कि मस्जिद का निर्माण तलवार के बल पर किया गया था.

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