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क्लाइमेट चेंज से अगली पीढ़ी पर मंडराया संकट, मां के गर्भ में बच्चों की ग्रोथ रोक रही है जानलेवा गर्मी

क्लाइमेट चेंज की वजह से सिर्फ मौसम नहीं बदल रहा, बल्कि मां के गर्भ में पल रहे मासूमों का भविष्य भी सिकुड़ रहा है. यूनिसेफ (UNICEF) की रिपोर्ट के बाद भोपाल एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों ने भी चौंकाने वाला खुलासा किया है कि लगातार बढ़ती गर्मी के कारण बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर पैदा हो रहे हैं.

क्लाइमेट चेंज से अगली पीढ़ी पर मंडराया संकट, मां के गर्भ में बच्चों की ग्रोथ रोक रही है जानलेवा गर्मी
UNICEF report on heat wave: जानलेवा गर्मी मां के गर्भ में बच्चों की ग्रोथ रोक रही है
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ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण से खिलवाड़ का जो खामियाजा हम आज भुगत रहे हैं, वह तो सिर्फ एक ट्रेलर है. असली और डरावनी तस्वीर अब हमारे डॉक्टरों के सामने आ रही है. गर्मी का कहर अब सिर्फ घर से बाहर निकलने वाले लोगों को ही बीमार नहीं कर रहा, बल्कि मां के गर्भ के भीतर पल रहे मासूम बच्चों के विकास को भी अवरुद्ध कर रहा है.

दरअसल, हाल ही में आई यूनिसेफ (UNICEF) की एक वैश्विक रिपोर्ट और भोपाल एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों के शोध में एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जो हर माता-पिता और नीति निर्माताओं की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है. गौरतलब है कि लंबे समय तक पड़ने वाली भीषण गर्मी सीधे हमारी अगली पीढ़ी की बुनियाद को कमजोर कर रही है.

बच्चे हो रहे बौने और मानसिक रूप से कमजोर

भोपाल एम्स के ट्रामा इमरजेंसी पीडिया विभाग के हेड  डॉ. भुपेश्वरी पटेल का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की मार अब इंसानी विकास के चक्र को ही बदल रही है. लगातार बढ़ते तापमान की वजह से बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं, उनका कद बौनापन का शिकार हो रहा है और वे मानसिक व शारीरिक रूप से बेहद कमजोर पैदा हो रहे हैं. यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ सालों में यह ट्रेंड तेजी से बढ़ा है. प्रेग्नेंसी के दौरान जब कोई गर्भवती महिला लगातार हाई टेम्परेचर के संपर्क में रहती है, तो इसका सीधा असर गर्भस्थ शिशु के वजन पर पड़ता है. गर्मी के कारण पैदा होने वाले शारीरिक स्ट्रेस की वजह से बच्चे समय से पहले यानी प्रीमैच्योर डिलीवरी पैदा हो रहे हैं और उनका मानसिक विकास भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा है. यानी प्रकृति से हमारी छेड़छाड़ अब सीधे हमारी अगली पीढ़ी को लील रही है.

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पहले भी गर्मियां आती थीं, लेकिन तब और अब के मौसम में एक बहुत बड़ा और खतरनाक बदलाव आ चुका है. डॉक्टरों के मुताबिक, पहले भीषण गर्मी में तेज लू सिर्फ 2 से 3 हफ्ते का होता था, जिससे शरीर को संभलने का मौका मिल जाता था, लेकिन अब मार्च-अप्रैल से शुरू होकर जून-जुलाई तक, यानी पूरे 2 से 3 महीने तक तापमान लगातार 40 से 45 डिग्री के पार बना रहता है. लिहाजा, यह लगातार पड़ने वाली असहनीय हीट गर्भवती महिला के शरीर के भीतर एक खतरनाक प्रक्रिया को ट्रिगर करती है, जिससे लगातार अत्यधिक गर्मी के कारण गर्भ में मौजूद प्लेसेंटा का ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है. जब ब्लड फ्लो कम होता है, तो गर्भस्थ शिशु तक जरूरी ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पाता, जिससे सही मात्रा में पोषण न मिलने का सीधा नतीजा यह होता है कि बच्चे की ग्रोथ पेट के अंदर ही थम जाती है.

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जिस तपती धूप और उमस को हम अब तक सिर्फ 'खराब मौसम' कहकर टाल रहे थे, वह अब इंसानी वजूद के भविष्य की सेहत तय करने लगी है. अगर धरती का तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में हमारी आने वाली नस्लें कैसी होंगी, इसकी कल्पना ही रूह कंपा देती है.

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