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100 साल से इस गांव में नहीं मनती होली, देवी के आदेश से रंग-गुलाल पर रोक, जानें अनोखी परंपरा

Chhattisgarh News Holi 2026: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के खजुरपदर गांव में पिछले करीब 100 सालों से होली नहीं मनाई जाती. ग्रामीणों का मानना है कि देवी के आदेश के कारण यहां होलिका दहन और रंग-गुलाल परंपरागत रूप से बंद है. नई पीढ़ी भी इस मान्यता को पूरी श्रद्धा से निभा रही है.

100 साल से इस गांव में नहीं मनती होली, देवी के आदेश से रंग-गुलाल पर रोक, जानें अनोखी परंपरा

Chhattisgarh News Holi 2026: देशभर में 2 मार्च 2026 को होल‍िका का दहन क‍िया गया और अब रंगोंत्‍सव मनाया जा रहा है. इस बीच छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में एक ऐसा गांव चर्चा में आया है, जहां पिछले 100 सालों से ग्रामीण न तो होलिका दहन करते हैं और न ही रंग गुलाल खेलते हैं. त्योहार में यहां की दिनचर्या सामान्य दिनों की तरह होती है. ग्रामीण होली के दिन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर परिवार व गांव की सुख-शांति, समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि देवियों का आदेश है, इसलिए होली नहीं मनाते हैं. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, ज‍िसे नई पीढ़ी भी शिद्दत से न‍िभा रही है. 

देवी के आदेश से नहीं मनती होली

गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लाक मुख्यालय से लगभग 80 किमी दूर ग्राम पंचायत खजुरपदर की जनसंख्या लगभग 2 हजार के आसपास है. ग्रामीणों के अनुसार पिछले 100 सालों से गांव में होली का त्योहार नहीं मनाया गया होगा. होली का त्योहार न मनाने का कारण ग्रामीण देवीय प्रकोप बताते हैं. ग्रामीणों का दावा है कि होली का त्योहार मनाए जाने से गांव की देवी नाराज हो जाती है और देवी का प्रकोप बढ़ जाता है. गांव में प्रमुख देवी के रूप में ग्राम श्रीमाटी देवता और शानपाठ देवी की पूजा होती है. दोनों देवियों के आदेशानुसार ही गांव में होली नहीं मनाते हैं. होली के दिन खजुरपदर गांव के लोग अपने घरों में ही रहते हैं और देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करते हैं.  

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होली खेलने पर बढ़ा था प्रकोप, बुजुर्गों की मान्यता

खजुरपदर के पूर्व जनपद सदस्य जयसिंह नागेश, सरपंच मिलेंद्र नागेश ने बताया कि बुजुर्गों ने वर्षों पहले बताया है कि गांव में होली खेलने से देवी नाराज हो गई थी. देवी को रंग गुलाल पसंद नहीं है. होली खेलने के बाद गांव में प्रकोप बढ़ गया था. होली के बाद बड़ी माता के रूप में चेचक और उल्टी दस्त से ग्रामीण ग्रसित हो गए थे. ऐसी स्थिति में पूर्वजों ने देवीमाता को माफी मांगी, मान मनौव्वल किया, पूजा अर्चना की, तब कहीं जाकर गांव की स्थिति सुधरी थी. तब से लेकर आज तक कभी होली नही खेली गई.

नई पीढ़ी भी निभा रही परंपरा

गांव के पटेल व पूर्व सरपंच येपेश्वर नागेश ने बताया कि खजुरपदर गांव में होली न खेले जाने की परंपरा को आसपास के पूरे गांव के लोग भी जानते हैं. होली के दिन यदि कोई दूसरे गांव का व्यक्ति भी खजुरपदर गांव पहुंच जाता है, तो वह ग्रामीणों को रंग लगाने की कोशिश नहीं करता. वह इस दिन सीधे रास्ते से निकल जाता है. गांव के युवा भी इस परंपरा को बराबर से मानते आ रहे हैं. ग्रामीण धरम सिंह, पूरन प्रताप ने बताया कि हमें हर हाल में गांव की खुशहाली चाहिए. यदि हमारे गांव की देवी चाहती है कि गांव में होली न खेला जाए तो वहीं हमारे लिए अच्छा है.

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