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नक्‍सल गढ़ रहे गांवों में चला 'अम्मा' का जादू, MLA-एसपी भी हुए मुरीद, तोहफे में दी पीली साड़ी

मध्य प्रदेश के बालाघाट ज‍िले में 55 साल की पुसली बाई बैगा (अम्मा) ने नक्सल प्रभावित शक्तिझोड़ी गांव में पुलिस और जनता के बीच का डर खत्म कर अनूठी मिसाल पेश की है. जानिए कैसे 10 लोगों का कार्यक्रम 1500 ग्रामीणों के मेले में बदला? पढ़ें नक्‍सल मुक्‍त भारत की र‍ियल लाइफ हीरो की कहानी. 

नक्‍सल गढ़ रहे गांवों में चला 'अम्मा' का जादू, MLA-एसपी भी हुए मुरीद, तोहफे में दी पीली साड़ी
अम्मा के इस जज्बे को सलाम करते हुए बालाघाट के पुलिस अधीक्षक ने उन्हें उनकी पसंदीदा पीली साड़ी भेंट की.
DSP Santosh kumar
  • 55 साल की अम्मा के भरोसे ने 10 लोगों के छोटे कार्यक्रम को 1500 ग्रामीणों के बड़े मेले में बदल दिया
  • अम्मा ने खुद सुबह 4 बजे उठकर 1000 पत्तलें बनाईं और गांव के 18 युवाओं से पहली बार रक्तदान कराया
  • विधायक-एसपी ने आदिवासियों संग पंगत में खाना खाया और अम्मा को पीली साड़ी भेंट की

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे जिन गांवों में महज सालभर पहले तक पुलिस बिना बंदूक कदम रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी, जहां नक्सलियों के खौफ में युवा सरकारी नौकरी का 'ऑफर लेटर' तक छूने से डरते थे, आज वहां एक अद्भुत इतिहास लिखा गया है. यहां जो काम भारी-भरकम पुलिस-प्रशासन बंदूक के दम पर नहीं कर पाया, वो लांजी तहसील के शक्तिझोड़ी गांव की 55 साल की एक आदिवासी महिला पुसली बाई बैगा यानी 'अम्मा' ने अपने अटूट भरोसे से कर दिखाया. अम्मा के इसी जज्बे के आगे आज मध्य प्रदेश पुलिस के बड़े-बड़े अफसर और विधायक भी नतमस्तक हैं, जिन्होंने इस रीयल लाइफ हीरो को मंच पर बुलाकर उनकी पसंदीदा 'पीली साड़ी' देकर सम्मानित किया. 

Amma Pusli Bai Baiga Balaghat

10 जून को क्रिकेट प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह में सिर्फ 10 लोग ही जुटे. Photo Credit: DSP Santosh Kumar

एमपी पुलिस के कार्यक्रम में जुटे थे सिर्फ 10 लोग

मध्य प्रदेश में नक्सल मुक्त बालाघाट जिले की लांजी तहसील के शक्तिझोड़ी गांव में जब पुलिस-प्रशासन खेल प्रतियोगिता और रक्तदान शिविर का आयोजन करने पहुंचा, तो डर के मारे 10 जून को क्रिकेट प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह में सिर्फ 10 लोग ही जुटे. इसका सीधा मतलब यह था कि 31 मार्च 2026 को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित हो चुके इन गांवों में प्रशासन अभी तक स्थानीय लोगों का भरोसा पूरी तरह जीतने में सफल नहीं हो पा रहा था. 

Amma Pusli Bai Baiga Balaghat

अम्मा के इस भरोसे का जादुई असर हुआ और देखते ही देखते महज 10 लोगों का यह कार्यक्रम 1500 ग्रामीणों के विशाल मेले में बदल गया. Photo Credit: DSP Santosh Kumar

अम्मा पुसली बाई बैगा ने ऐसे जीता ग्रामीणों का भरोसा

जब प्रशासन के सामने यह चुनौती आई, तब गांव की आदिवासी महिला पुसली बाई बैगा यानी 'अम्मा' आगे आईं. उन्होंने मध्‍य प्रदेश पुलिस और पब्लिक के बीच गजब की ट्यूनिंग बैठाई. अम्मा ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि पुलिस और प्रशासन उनके भले के लिए ही यहां आया है. अम्मा के इस भरोसे का जादुई असर हुआ और देखते ही देखते महज 10 लोगों का यह कार्यक्रम 1500 ग्रामीणों के विशाल मेले में बदल गया. अम्मा के इस जज्बे को सलाम करते हुए बालाघाट के पुलिस अधीक्षक ने उन्हें उनकी पसंदीदा पीली साड़ी भेंट की. 

मध्य प्रदेश पुलिस की हॉक फोर्स में बालाघाट में तैनात DSP संतोष कुमार पटेल ने NDVT से बातचीत में अम्मा के नक्‍सल मुक्‍त भारत में अभूतपूर्व योगदान की पूरी कहानी बयां की है. उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा पर टांडा नदी के किनारे बैगा जनजाति बहुल लांजी तहसील के शक्तिझोड़ी  गांव में 10 जून से 'अमर शहीद आशीष शर्मा जी स्मृति नक्सल मुक्त भारत क्रिकेट टूर्नामेंट' का आयोजन किया गया था.

अमर शहीद आशीष शर्मा की स्मृति में आयोजन

इस टूर्नामेंट में दोनों राज्यों के नक्सल प्रभावित रहे गांवों से कुल 30 टीमों को आमंत्रित किया गया था. शुभारंभ समारोह के फीके रहने के बाद अम्मा खुद अपने गांव में घर-घर गईं. उन्होंने लोगों को समझाया कि प्रशासन उनके अपने गांव में आया है और हमें उनके इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए. 

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अम्मा हर सुबह चार बजे जंगल जातीं और माहुल के पत्ते तोड़कर लाती थीं. Photo Credit: DSP Santosh Kumar

सुबह 4 बजे जंगल जाकर अम्मा ने खुद बनाईं 1000 पत्तलें

जब अम्मा को पता चला कि खेल आयोजन के दौरान गांव में ही भंडारे की व्यवस्था की जानी है, तो उन्होंने जंगल से पत्ते लाकर पत्तल बनाने की पूरी जिम्मेदारी खुद उठा ली. अम्मा हर सुबह चार बजे जंगल जातीं और माहुल के पत्ते तोड़कर लाती थीं. उन्होंने माहुल के पत्तों से अपने हाथों से एक हजार पत्तलें बनाकर भंडारे के लिए उपलब्‍ध करवाईं. यही नहीं, उन्होंने खेल प्रेमियों और ग्रामीणों को आयोजन स्थल के आसपास जामुन भी ख‍िलाए. अम्मा के ये जमीनी प्रयास रंग लाए और ग्रामीणों तथा प्रशासन के बीच बरसों से बनी दूरियां दिनों-दिन प‍िघलती चली गई. 

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अम्मा ने क्रिकेट टूर्नामेंट स्थल के पास ही चाय-नाश्ते की एक छोटी दुकान भी खोल ली थी. Photo Credit: DSP Santosh Kumar

अम्मा ने क्रिकेट टूर्नामेंट स्थल के पास ही चाय-नाश्ते की एक छोटी दुकान भी खोल ली थी. ताक‍ि ज्‍यादातर समय वहां रहकर लोगों को प्रेर‍ित कर सके. उन्होंने भंडारे के लिए न केवल अपने घर में भोजन तैयार करने के लिए जगह मुहैया कराई, बल्कि गांव में रक्तदान शिविर भी लगवाया, जिसमें 18 स्थानीय लोगों ने रक्तदान किया. ग्रामीणों के लिए रक्तदान करने का यह जीवन में पहला मौका था.

बकरकट्टा की टीम बनी विजेता, जहां हुआ था ऐतिहासिक सरेंडर

अमर शहीद आशीष शर्मा की स्मृति में आयोजित यह क्रिकेट प्रतियोगिता 10 जून से 15 जून तक चली. 8 ओवर के इस मुकाबले में छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले की बकरकट्टा टीम ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 122 रन बनाए. इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की लांजी तहसील की नल्लेझरी टीम को बहुत बड़े अंतर से हराते हुए इस 'नक्सल मुक्त भारत क्रिकेट टूर्नामेंट' का खिताब अपने नाम कर लिया. 

दिलचस्प बात यह है कि बकरकट्टा वही ऐतिहासिक जगह है, जहां 11 नक्सलियों ने एक साथ आत्मसमर्पण किया था. यह मध्य प्रदेश के इतिहास में नक्सलियों का आखिरी सरेंडर था. दरअसल, 11 दिसंबर 2025 को यहां दो हार्डकोर माओवादियों दीपक और रोहित के आत्मसमर्पण के बाद, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य को आधिकारिक रूप से नक्सलवाद-मुक्त घोषित कर दिया था.

विधायक-एसपी ने आदिवासियों के साथ बैठकर खाया खाना

डीएसपी संतोष कुमार पटेल के अनुसार, 10 जून को जब क्रिकेट प्रतियोगिता का शुभारंभ समारोह हुआ था, तो उसमें गांव के लोग आए ही नहीं थे और महज दस लोग पहुंचे थे. उन्हीं गिने-चुने लोगों में से एक अम्मा पुसली बाई बैगा थीं. बाद में 15 जून को फाइनल मैच 1500 ग्रामीणों की भारी मौजूदगी में संपन्न हुआ. ग्रामीणों का प्रशासन के प्रति इतना जबरदस्त जुड़ाव पूरी तरह से अम्मा के प्रयासों का ही नतीजा था.  

इस प्रतियोगिता का समापन समारोह लांजी के विधायक राजकुमार कर्राहे और बालाघाट के पुलिस अधीक्षक IPS आदित्य मिश्रा की मौजूदगी में हुआ. समारोह में जब अमर शहीद आशीष शर्मा की तस्वीर के सामने दीपक जलाया गया, तो हजारों जनजाति परिवारों की भीड़ वहां उमड़ पड़ी. इस दौरान जब जनजाति समाज के बच्चों ने पारंपरिक छत्तीसगढ़ी दिवारी नृत्य प्रस्तुत किया, तो विधायक और एसपी भी खुद को रोक नहीं पाए और बच्चों के साथ थिरकते नजर आए. इसी बीच बैगा गुरु ने एक बेहद भावुक गीत सुनाया- ''पढ़े लिखेंगे खेले कूदेंगे, अब नहीं रहा कोई डर रे… नक्सली ख़त्म हुए और आशीष शर्मा हो गए अमर रे...''

बैगा और गोंड समाज के युवाओं ने  विधायक और एसपी के साथ एक ही पंगत में बैठकर जंगली माहुल के पत्तों से बनी पत्तलों पर भोजन किया और एक-दूसरे को गले लगाया. बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने ग्रामीणों की सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हेलमेट वितरित किए और सामाजिक सहयोग करने वाले प्रबुद्ध जनों को शाल व स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया. स्थानीय लोगों की भारी मांग को देखते हुए लांजी विधायक राजकुमार कर्राहे ने घोषणा की कि यह खेल प्रतियोगिता अब हर वर्ष आयोजित की जाएगी.

पीली साड़ी की चाहत और डर के खात्मे की अनूठी दास्तान

पूरे आयोजन के दौरान अम्मा ने पुलिस अधिकारियों से बातचीत में बताया था कि उन्हें पीली साड़ी बहुत पसंद है. प्रशासन ने न केवल उन्हें एक हजार पत्तल बनाने के पारिश्रमिक के तौर पर ₹500 एडवांस दिए थे, बल्कि समापन समारोह के मुख्य मंच पर अम्मा को उनकी पसंदीदा शानदार पीली साड़ी भी भेंट की. अपनी मनपसंद पीली साड़ी पाकर अम्मा की खुशी और मुस्कान देखने लायक थी.

डीएसपी संतोष कुमार के अनुसार, अम्मा के गांव और उसके आसपास के ये इलाके कभी पूरी तरह नक्सल प्रभावित रहे थे. इनमें प्रशासन और ग्रामीणों के बीच की दूरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज सालभर पहले तक पुलिस-प्रशासन यहां बिना बंदूक लिए आने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता था. कई बार अधिकारियों को भेष बदलकर यहां आना पड़ता था. यहां के लोग किसी भी सूरत में प्रशासन की मदद करने या उनसे मदद लेने को तैयार नहीं होते थे. 

Amma Pusli Bai Baiga Balaghat

पुलिस के साथ मिलकर विकास और भाईचारे का यह नया अध्याय लिखा जा रहा है, जिसकी मुख्य सूत्रधार 55 साल की 'अम्मा' बनी हैं. Photo Credit: DSP Santosh Kumar

जब खौफ के कारण युवाओं ने ठुकरा दिए थे सरकारी जॉब ऑफर

एक पुराने वाकये का जिक्र करते हुए भावुक होकर डीएसपी संतोष कुमार कहते हैं, "अम्मा के ही परिवार के एक लड़के की एसपी बालाघाट ने प्राइवेट नौकरी लगवाई थी. उस लड़के को सरकारी स्तर पर मिला जॉब ऑफर लेटर देने के लिए मैं खुद और आईपीएस ओमप्रकाश जी गांव आए थे. तब नक्सलियों के खौफ के कारण उस लड़के ने नौकरी का ऑफर लेटर तक हाथ में लेने से साफ इनकार कर दिया था. 

पुलिस-प्रशासन को हमेशा लगता था कि नक्सल प्रभावित गांवों के जो युवा रोजगार के लिए हैदराबाद तक मजदूरी करने जा सकते हैं, वे अपने ही गृह राज्य में स्थायी और अच्छी नौकरी भी हासिल कर सकते हैं, लेकिन वे नक्सलियों के अत्यधिक भय के कारण प्रशासन से हमेशा दूरी बनाकर रखते थे. यहां तक कि पूर्व में जब इस गांव में सरकार ने पक्की सड़क बनाने का प्रयास किया था, तो ग्रामीणों ने नक्सलियों के उकसावे में आकर डंपर ही फूंक डाले थे और सड़कों के निर्माण का भारी विरोध किया था." आज उसी गांव में पुलिस के साथ मिलकर विकास और भाईचारे का यह नया अध्याय लिखा जा रहा है, जिसकी मुख्य सूत्रधार 55 साल की 'अम्मा' बनी हैं. 

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लेखक के बारे में
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विश्वनाथ सैनी
उप समाचार संपादक
विश्वनाथ सैनी डिजिटल और प्रिंट मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव रखने वाले पत्रकार हैं. साल 2025 से NDTV में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर 'मध्य प्रदेश-छत्तीस... और पढ़ें
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