कोई किताब क्यों पढ़ी जाए? इस सवाल का जवाब आसान नहीं होता. लेकिन, अगर ये सवाल वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पीयूष पांडे की नए उपन्यास उसने बुलाया था के संदर्भ में किया जाए तो एक पंक्ति में इसका जवाब होगा - जो कहानी आपको रोमांचित करे, कई मोड़ पर चौंकाए और रहस्यों के खुलने के बीच सामाजिक सरोकार भी ले ले तो वो कहानी ज़रुर पढ़ी जानी चाहिए.
आजकल जब ज़्यादातर क्राइम थ्रिलर किताबें सिर्फ़ तेज़ रफ्तार सस्पेंस और चौंकाने वाले ट्विस्ट पर टिक जाती हैं, ‘उसने बुलाया था' वहां सवाल खड़ा करती है. कहानी की केन्द्रीय पात्र एक शिक्षित, आत्मनिर्भर महिला है, जो मनोविज्ञान की छात्रा है. वो एक अनूठे मनोवैज्ञानिक प्रयोग के लिए अपनी एक प्रयोगशाला तैयार करती है, जहां अंजान लोग आकर उससे मुलाकात करते हैं, जिनके व्यवहार को वो रिकॉर्ड करती है.
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एक दिन नोएडा में एक लाश बरामद होती है और किसी तरह उस हत्या की कड़ियां उसके अध्ययन, उसकी प्रयोगशाला और उसके अतीत से जुड़ने लगती हैं और अचानक एक सीधी कहानी दिलचस्प सस्पेंस थ्रिलर में तब्दील हो जाती है.

उसने बुलाया था की खास बात ये कि यह उपन्यास सिर्फ़ ‘कातिल कौन है' का सवाल नहीं पूछता, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या हर अपराध केवल कानून की नज़र से देखा जाना चाहिए, या उसके पीछे छिपे मानसिक और सामाजिक कारणों को भी समझना ज़रूरी है?
‘उसने बुलाया था' की सबसे बड़ी ताकत इसकी मनोवैज्ञानिक गहराई है. यह उपन्यास बताता है कि कैसे स्मृतियां, दबा हुआ अपराधबोध और समाज की अपेक्षाएं किसी इंसान को धीरे-धीरे उस मोड़ तक ले जाती हैं, जहाँ सही और ग़लत के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
यह किताब उन पाठकों के लिए खास है, जो थ्रिलर में सिर्फ़ रोमांच नहीं, बल्कि सोचने का अवसर भी ढूंढते हैं. और महत्वपूर्ण बात ये कि केंद्रीय पात्र की कहानी धीरे धीरे लाखों भारतीय महिलाओं के दर्द, त्रासदी और उनके अनुभव की कहानी भी बन जाती है.
इस उपन्यास की भाषा सहज है, संवाद स्वाभाविक हैं और कथा की गति पाठक को बांधे रखती है. उपन्यास इस मामले में सफल है कि कहानी का राज आखिरी पन्नों तक कायम रहता है और अगर पाठक आखिर के तीन पन्ने ना पढ़े तो वो समझ नहीं सकता कि मर्डर मिस्ट्री थी क्या. लेकिन,बड़ी बात ये भी कि उपन्यास का असली असर आख़िरी पन्ने पर नहीं, बल्कि किताब बंद करने के बाद शुरू होता है- जब पाठक खुद से सवाल करने लगता है.
अगर आप ऐसा क्राइम थ्रिलर पढ़ना चाहते हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ आपको असहज भी करे, सोचने पर मजबूर करे और देर तक आपके साथ रहे- तो ‘उसने बुलाया था' ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए. पीयूष पांडे ने इस उपन्यास से पहले अभिनेता मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी लिखी थी, जो हिन्दी-अंग्रेजी-गुजराती और मराठी में प्रकाशित हो चुकी है.
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