Oldest Dam in India: भारत का इतिहास केवल किले, मंदिर और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां ऐसी इंजीनियरिंग उपलब्धियां भी मौजूद हैं, जो आज के आधुनिक दौर में भी लोगों को हैरान कर देती हैं. ऐसी ही एक ऐतिहासिक धरोहर है कल्लणई बांध (Kallanai Dam), जिसे ग्रैंड एनीकट (Grand Anicut) के नाम से भी जाना जाता है. यह भारत का सबसे पुराना कार्यरत बांध माना जाता है और दुनिया की सबसे प्राचीन जल-विभाजन (Water Diversion) संरचनाओं में शामिल है, जो आज भी उपयोग में है.
करीब 2,000 साल पहले हुआ था निर्माण
इतिहास के अनुसार, कल्लणई बांध का निर्माण चोल वंश के राजा करिकाल चोल ने लगभग 150 ईस्वी में कराया था. उस समय आधुनिक मशीनें, सीमेंट या कंक्रीट जैसी निर्माण तकनीक उपलब्ध नहीं थी. फिर भी यह बांध आज तक मजबूती से खड़ा है. यही वजह है कि इसे प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है.
कहां स्थित है कल्लणई बांध
यह ऐतिहासिक बांध तमिलनाडु में कावेरी नदी पर स्थित है. यह तिरुचिरापल्ली (त्रिची) से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है और तंजावुर क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. तमिल भाषा में 'कल' का अर्थ पत्थर और 'अनई' का अर्थ बांध होता है, इसलिए इसका नाम कल्लणई पड़ा. वहीं "ग्रैंड एनीकट" नाम पुर्तगाली शब्द Anicut से प्रचलित हुआ.
सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण में आज भी अहम भूमिका
कल्लणई बांध का उद्देश्य पानी को रोकना नहीं, बल्कि कावेरी नदी के जल को विभिन्न नहरों की ओर मोड़ना था, ताकि खेतों तक पर्याप्त पानी पहुंच सके. आज भी यह कावेरी डेल्टा के कई जिलों में सिंचाई और जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. धान की प्रमुख फसलें, जैसे कुरुवई और सांबा, इस जल प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर हैं.
बिना आधुनिक तकनीक के बना इंजीनियरिंग का चमत्कार
करीब दो हजार वर्ष पहले बने इस बांध की लंबाई लगभग 329 मीटर और चौड़ाई लगभग 20 मीटर है. उस दौर में आधुनिक निर्माण उपकरणों के बिना इतनी विशाल संरचना का निर्माण अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी. यही कारण है कि आज भी सिविल इंजीनियरिंग के छात्रों और विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय माना जाता है.
तमिलनाडु की पहचान का हिस्सा
कल्लणई बांध केवल एक ऐतिहासिक संरचना नहीं, बल्कि तमिलनाडु की सांस्कृतिक और कृषि विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. कावेरी डेल्टा के लाखों किसानों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. राज्य में यह ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ पर्यटन का भी प्रमुख आकर्षण बन चुका है.
घूमने का सबसे अच्छा समय
अगर आप कल्लणई बांध देखने की योजना बना रहे हैं, तो अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. मानसून के बाद कावेरी नदी में जल प्रवाह अधिक होने से बांध का दृश्य और भी आकर्षक दिखाई देता है. यहां आने वाले पर्यटक बांध के व्यू-पॉइंट, करिकाल चोल की प्रतिमा और आसपास के ऐतिहासिक स्थलों का भी भ्रमण कर सकते हैं.
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