पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की 15 साल की सत्ता खत्म हो चुकी है और बीजेपी की सरकार बनी है. सरकार जाने के बाद से ही ममता बनर्जी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं, उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई विधायक बगावत कर सकते हैं. पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने ऐसा दावा किया है, उनका कहना है कि पार्टी के 59 विधायक उनके साथ हैं. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति और ममता के खेमे में खलबली मच गई है. इस पूरे घटनाक्रम से लोगों को महाराष्ट्र वाली कहानी याद आ रही है, जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की पार्टी तोड़ दी थी. इतना ही नहीं, पार्टी का सिंबल और नाम भी छीन लिया था. ऐसे में सवाल है कि आखिर कितने विधायकों की बगावत से पार्टी टूट सकती है और चुनाव आयोग किन चीजों को देखकर फैसला लेता है.
एंटी डिफेक्शन लॉ से बचाव
जब भी किसी पार्टी के विधायक बागी होते हैं तो सबसे पहले एंटी डिफेक्शन लॉ यानी दल बदल कानून की बात सामने आती है. हॉर्स ट्रेडिंग से बचने के लिए 1985 में ये कानून लाया गया था. इसमें पार्टी छोड़ने वाले विधायकों की सदस्यता रद्द करने का प्रावधान है. ये कानून उन सभी चुने हुए विधायकों या सांसदों पर लागू होता है, जो पार्टी के खिलाफ जाकर कोई काम करते हैं. इसमें किसी मुद्दे पर वोटिंग से लेकर पार्टी के खिलाफ बयानबाजी और व्हिप नहीं मानने जैसे मामले आते हैं. हालांकि इससे बचने के तरीका भी हैं.
- जब किसी पार्टी से दो तिहाई या इससे ज्यादा सदस्य टूटते हैं तो ऐसे में एंटी डिफेक्शन लॉ लागू नहीं होता है.
- ये सभी विधायक किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं या फिर खुद की नई पार्टी बना सकते हैं.
- दो तिहाई से कम संख्या होने पर उनकी सदस्यता को रद्द किया जा सकता है.
- पार्टी छोड़ने वाले सदस्यों को किसी दूसरी पार्टी में शामिल होना होगा या फिर नई पार्टी बनानी होगी, तभी उनकी सदस्यता बची रह सकती है.
TMC के मामले में क्या हो सकता है?
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिम बंगाल में 207 सीटें मिलीं, वहीं ममता बनर्जी की टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई. अब अगर विधायक ऋतब्रत बनर्जी का दावा सही निकलता है और 80 में से 59 विधायक पार्टी छोड़ते हैं तो ऐसे में खतरा उन विधायकों को नहीं, बल्कि ममता बनर्जी को होगा. क्योंकि 80 सीटों का दो तिहाई करीब 53 होता है, ऐसे में इससे ज्यादा विधायक बागी होने पर वो आराम से नई पार्टी बना सकते हैं या फिर किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. इतना ही नहीं, ये विधायकों का दल ममता की टीएमसी और उसके चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक सकता है.
पार्टी का नाम और सिंबल कैसे छिनता है?
किसी भी पार्टी से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए दो तिहाई वाला नियम लागू होता है, लेकिन ये पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा करने के लिए काफी नहीं है. इसके लिए चुनाव आयोग के अलग नियम हैं और कई चीजों का मूल्यांकन करने के बाद ही इस पर फैसला लिया जाता है. चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के तहत इस तरह के फैसले लिए जाते हैं.
चुनाव आयोग क्या-क्या देखता है?
- पार्टी में फूट के बाद चुनाव आयोग के पास सिंबल और नाम के लिए अगर अर्जी जाती है तो उसके बाद कई लेयर्स की जांच शुरू होती है. महाराष्ट्र में जब एकनाथ शिंदे को शिवसेना की कमान सौंपी गई थी, तब इन फैक्टर्स को ध्यान में रखा गया था.
- पार्टी के मूल सिद्धांत और लक्ष्यों को ध्यान में रखा जाता है, अगर बागी गुट ये साबित करने में सफल रहता है कि पार्टी मूल सिद्धांत से भटक गई है तो ये एक बड़ा कारण हो सकता है.
- चुनाव आयोग की तरफ से पार्टी के संविधान की भी जांच होती है. अगर पार्टी का संविधान उन शर्तों से मेल नहीं खाता है, जो पार्टी के रजिस्ट्रेशन के समय चुनाव आयोग को दी गई थी, तो ऐसे में पार्टी दूसरे गुट को सौंपी जा सकती है.
- चुनाव आयोग ये भी देखता है कि विधानसभा और लोकसभा में पार्टी के किस गुट के पास कितना बहुमत है. जो गुट पार्टी के नाम और सिंबल पर दावा कर रहा है, उसके विधायकों को मिले वोटों को पार्टी के कुल वोटों के साथ जोड़ा जाता है. इसके बाद प्रतिशत निकलता है और जिस खेमे के पास वोटों का प्रतिशत ज्यादा होता है, उसे बढ़त मिलती है.
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