
नई दिल्ली:
नक्सल प्रभावित जमुई विधानसभा क्षेत्र में इस बार लड़ाई खासी दिलचस्प मानी जा रही है। इस सीट एनडीए ने बीजेपी के टिकट पर जहां पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह के बेटे और निवर्तमान विधायक अजय प्रताप को चुनावी समर में उतारा है, वहीं महागठबंधन ने अपने पुराने चेहरे विजय प्रकाश पर ही विश्वास बनाए रखा।
नरेंद्र सिंह की पुश्तैनी सीट है जमुई
जमुई को नरेंद्र सिंह की पुश्तैनी सीट माना जाता है। पिछले 25 सालों के जमुई के राजनीति पर नजर डालें तो 15 सालों तक नरेंद्र सिंह और उनके परिवार का ही कब्जा रहा है। साल 2000 में नरेंद्र सिंह के चुनाव जीतने के बाद उनके दोनों बेटे अभय सिंह और अजय प्रताप सिंह भी पिता की सीट पर जीत का परचम लहराते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट से नरेंद्र सिंह के दूसरे बेटे अजय ने जीत हासिल की थी। इससे पहले साल 2005 के चुनाव में उनके बड़े भाई अभय सिंह चुनाव जीते थे, लेकिन अभय सिंह की असमय मौत के बाद अजय ने परिवार की राजनीतिक विरासत संभाली।
'हम' के हैं नेता, बीजेपी ने दिया टिकट
पिछले चुनाव में जेडीयू के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे अजय प्रताप ने आरजेडी के विजय प्रकाश को करीब 24 हजार वोटों से हराया था। इस चुनाव में एक बार फिर ये दोनों नेता आमने-सामने हैं। अब वह जीतन राम मांझी की पार्टी 'हम' का हिस्सा हैं, लेकिन बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। उनका कहना है जमुई में मुद्दा विकास है - 'जमुई की लड़ाई हमेशा दिलचस्प रही है। यहां सबका इक्वेशन फ़ेल हो जाता है। लोग मोदी को जानते हैं, इसीलिए वोट हमें ही देंगे'।
चिराग की भी है धमक
हालांकि जमुई की राजनीति को पिछले डेढ़ साल से वहां के सांसद एवं एलजेपी नेता चिराग भी प्रकाशमय कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि यह सीट चिराग पासवान के प्रभाव और नरेंद्र सिंह की पहचान का प्रश्न बन गया है। कहा जाता है कि चिराग नहीं चाहते थे कि नरेंद्र सिंह के बेटे अजय को इस सीट से टिकट मिले, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट दे दिया। ऐसे में सांसद चिराग के नजदीकी रहे और एलजेपी के प्रदेश महासचिव अनिल सिंह भी यहां निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। कहा जा रहा है कि एलजेपी ने ही जमुई से निर्दलीय उम्मीदवार को खड़ा किया है। (पढ़ें : जमुई पर एलजेपी मानती नहीं तो और करती भी क्या!)
एनडीए के भीतर बीजेपी और एलजेपी में ही लड़ाई
हालांकि जब उनसे इस बारे में जब पूछा गया कि तो उन्होंने कहा ऐसा नहीं है। लेकिन वे इस बात पर भी कुछ सफाई नहीं दे पाए कि एलजेपी ने आखिर क्यों उनके खिलाफ अपना उमीदवार खड़ा किया, जबकि एलजेपी-बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। हालांकि अजय प्रताप ने एक बात साफ कर दी कि जमुई की चार सीटों पर लड़ाई महागठबंधन और एनडीए में ही नहीं, बीजेपी और एलजेपी में भी है। (पढ़ें- जमुई में बीजेपी और एलजेपी के बीच ही टक्कर)
चिराग पासवान और नरेंद्र सिंह में असल लड़ाई
अजय प्रताप सिंह को इलाक़े के 20 फीसदी राजपूत वोटों से उम्मीद है। इनके अलावा 10 फीसदी मुस्लिम हैं, करीब 15 फीसदी बनिया और 10 फीसदी भूमिहार। हालांकि बात लोग सत्ता और विकास की कर रहे हैं। बहरहाल, जमुई के चुनावी चेहरे भले ही नरेंद्र सिंह के बेटे अजय और एलजेपी के अनिल सिंह को माना जा रहा है, लेकिन असल लड़ाई मौजूदा सांसद चिराग पासवान और नरेंद्र सिंह के बीच मानी जा रही है। इस लड़ाई को महागठबंधन के प्रत्याशी विजय प्रकाश त्रिकोणात्मक बना रहे हैं। जमुई विधानसभा क्षेत्र में 12 अक्टूबर को मतदान होना है।
नरेंद्र सिंह की पुश्तैनी सीट है जमुई
जमुई को नरेंद्र सिंह की पुश्तैनी सीट माना जाता है। पिछले 25 सालों के जमुई के राजनीति पर नजर डालें तो 15 सालों तक नरेंद्र सिंह और उनके परिवार का ही कब्जा रहा है। साल 2000 में नरेंद्र सिंह के चुनाव जीतने के बाद उनके दोनों बेटे अभय सिंह और अजय प्रताप सिंह भी पिता की सीट पर जीत का परचम लहराते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट से नरेंद्र सिंह के दूसरे बेटे अजय ने जीत हासिल की थी। इससे पहले साल 2005 के चुनाव में उनके बड़े भाई अभय सिंह चुनाव जीते थे, लेकिन अभय सिंह की असमय मौत के बाद अजय ने परिवार की राजनीतिक विरासत संभाली।
'हम' के हैं नेता, बीजेपी ने दिया टिकट
पिछले चुनाव में जेडीयू के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे अजय प्रताप ने आरजेडी के विजय प्रकाश को करीब 24 हजार वोटों से हराया था। इस चुनाव में एक बार फिर ये दोनों नेता आमने-सामने हैं। अब वह जीतन राम मांझी की पार्टी 'हम' का हिस्सा हैं, लेकिन बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। उनका कहना है जमुई में मुद्दा विकास है - 'जमुई की लड़ाई हमेशा दिलचस्प रही है। यहां सबका इक्वेशन फ़ेल हो जाता है। लोग मोदी को जानते हैं, इसीलिए वोट हमें ही देंगे'।
चिराग की भी है धमक
हालांकि जमुई की राजनीति को पिछले डेढ़ साल से वहां के सांसद एवं एलजेपी नेता चिराग भी प्रकाशमय कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि यह सीट चिराग पासवान के प्रभाव और नरेंद्र सिंह की पहचान का प्रश्न बन गया है। कहा जाता है कि चिराग नहीं चाहते थे कि नरेंद्र सिंह के बेटे अजय को इस सीट से टिकट मिले, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट दे दिया। ऐसे में सांसद चिराग के नजदीकी रहे और एलजेपी के प्रदेश महासचिव अनिल सिंह भी यहां निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। कहा जा रहा है कि एलजेपी ने ही जमुई से निर्दलीय उम्मीदवार को खड़ा किया है। (पढ़ें : जमुई पर एलजेपी मानती नहीं तो और करती भी क्या!)
एनडीए के भीतर बीजेपी और एलजेपी में ही लड़ाई
हालांकि जब उनसे इस बारे में जब पूछा गया कि तो उन्होंने कहा ऐसा नहीं है। लेकिन वे इस बात पर भी कुछ सफाई नहीं दे पाए कि एलजेपी ने आखिर क्यों उनके खिलाफ अपना उमीदवार खड़ा किया, जबकि एलजेपी-बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। हालांकि अजय प्रताप ने एक बात साफ कर दी कि जमुई की चार सीटों पर लड़ाई महागठबंधन और एनडीए में ही नहीं, बीजेपी और एलजेपी में भी है। (पढ़ें- जमुई में बीजेपी और एलजेपी के बीच ही टक्कर)
चिराग पासवान और नरेंद्र सिंह में असल लड़ाई
अजय प्रताप सिंह को इलाक़े के 20 फीसदी राजपूत वोटों से उम्मीद है। इनके अलावा 10 फीसदी मुस्लिम हैं, करीब 15 फीसदी बनिया और 10 फीसदी भूमिहार। हालांकि बात लोग सत्ता और विकास की कर रहे हैं। बहरहाल, जमुई के चुनावी चेहरे भले ही नरेंद्र सिंह के बेटे अजय और एलजेपी के अनिल सिंह को माना जा रहा है, लेकिन असल लड़ाई मौजूदा सांसद चिराग पासवान और नरेंद्र सिंह के बीच मानी जा रही है। इस लड़ाई को महागठबंधन के प्रत्याशी विजय प्रकाश त्रिकोणात्मक बना रहे हैं। जमुई विधानसभा क्षेत्र में 12 अक्टूबर को मतदान होना है।
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