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पलामू से मजदूरों का क्यों हो रहा पलायान, मजदूरों ने कहा- सुबह होती है उम्मीद... दोपहरी होते-होते दम तोड़ देती

पलामू में सरकारी फाइलों में बालू घाटों की नीलामी अटकी है, लेकिन जमीन पर इसका खामियाजा हजारों परिवार भुगत रहे हैं. मजदूर अब रोजी-रोटी के लिए बेबस हैं. (पलामू से विनोद सिंह की रिपोर्ट)

पलामू से मजदूरों का क्यों हो रहा पलायान, मजदूरों ने कहा- सुबह होती है उम्मीद... दोपहरी होते-होते दम तोड़ देती
पलामू में मजदूर पलायन कर रहे.
Jharkhand:

पूरे विश्व में मजदूर दिवस मनाया जा रहा है. वहीं बड़े-बड़े संगठन मजूदरों के विकास और रोजी-रोटी देने की बात की जा रही है. लेकिन मजदूरों की जमीनी हकीकत कितनी अच्छी है, उसका पता पलामू के मजदूरों से पता चलता है. जहां दूसरे जिले से पलामू कमाने आए मजदूरों को अब पलायन करना पड़ रहा है. अब मजदूर रोजी-रोटी की मजबूरी में अब दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को तैयार है.

दरअसल, पलामू जिले में निर्माण की रफ्तार थम सी गई है, वजह है-बालू. जिले के बालू घाटों की नीलामी न होने से अब इसका सीधा असर गरीब मजदूरों के पेट पर पड़ रहा है. न घर बन रहे हैं, न सड़कें, और न ही मजदूरों को काम मिल रहा है. नतीजा दो वक्त की रोटी के लिए मजदूर अब दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं. ​मेदिनीनगर में दिहाड़ी मजदूरी करने आने वाले मजदूरों को काम भी नहीं मिलता उन्हें वापस भी जाना पड़ रहा है. 

सरकारी फाइल अटकने का खामियाजा भुगत रहे मजदूर

पलामू के कोयल और अमानत नदी के तट आज सूने पड़े हैं. सरकारी फाइलों में बालू घाटों की नीलामी अटकी है, लेकिन जमीन पर इसका खामियाजा हजारों परिवार भुगत रहे हैं. जिले में बालू की भारी किल्लत की वजह से बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स से लेकर आम आदमी के घर बनाने के सपने तक, सब पर 'ब्रेक' लग गया है। जिससे मजदूर भी प्रभावित हैं.

सुबह होती है उम्मीद दोपहर होते-होते दम तोड़ देती

​जहां हर सुबह सैकड़ों मजदूर इस उम्मीद में जुटते हैं कि कोई उन्हें काम पर ले जाएगा. लेकिन दोपहर होते-होते ये उम्मीदें दम तोड़ देती हैं. बालू नहीं है, तो राजमिस्त्री को काम नहीं मिल रहा, और राजमिस्त्री को काम नहीं मिल रहा, तो इन दिहाड़ी मजदूरों के हाथ खाली हैं. मजदूरों का कहना है बालू के करना काम नहीं मिल रहा. पहले रोज काम मिलता था.

पलामू में बालू संकट  अब सिर्फ निर्माण की समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है. अगर जल्द ही बालू घाटों की नीलामी कर उठाव शुरू नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में पलायन का यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है.

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