झारखंड के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है. अदालत ने कहा है कि न्यायिक आदेशों के बावजूद बार-बार होने वाली देरी प्रथम दृष्टया इस बात का संकेत देती है कि आदेशों के पालन को टालने या उनसे बचने की व्यवस्थित कोशिश की जा रही है. हिरासत में मौतों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2018 से 2026 के बीच 427 लोगों की कस्टोडियल डेथ हुई है.
427 हिरासत मौतों के आंकड़े पर कोर्ट ने जताई हैरानी
लाइव लॉ के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की स्थापना से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2022 की एक जनहित याचिका का उल्लेख किया, जो हिरासत में मौतों से संबंधित थी.
कोर्ट ने माना कि इतने गंभीर हालात के बावजूद पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के निर्देशों का पालन न होना बेहद चिंताजनक है.

Jharkhand High court
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DGP की दलील पर कोर्ट ने उठाए सवाल
27 अगस्त 2026 के आदेश के बाद पुलिस महानिदेशक (DGP) की ओर से 11 सितंबर को हलफनामा दायर किया गया. इसमें कहा गया कि पुलिस महानिदेशक के पास स्वतंत्र रूप से सीसीटीवी लगाने के निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है और यह जिम्मेदारी गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की है. इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि इतने विलंबित चरण में DGP अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बचने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि आदेशों के अनुपालन की जिम्मेदारी से इस तरह पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता.
टेंडर, देरी और फिर नए प्रस्ताव का पुराना खेल
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि राज्य सरकार वर्षों से एक ही प्रक्रिया दोहराती रही है. पहले टेंडर जारी किए जाते हैं, फिर तकनीकी या प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला दिया जाता है और अंततः टेंडर रद्द कर दिए जाते हैं. इसके बाद नया प्रस्ताव लाने की बात कही जाती है. हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व में भी विभिन्न पीठें इस पैटर्न पर टिप्पणी कर चुकी हैं और इसे आदेशों की अवहेलना करने या उनके क्रियान्वयन में अधिकतम देरी करने की 'समय-परीक्षित कार्यप्रणाली' बताया जा चुका है. अदालत ने कहा कि नौकरशाही की लालफीताशाही के जरिए राज्य अब तक कोर्ट के आदेशों के क्रियान्वयन को टालने में सफल रहा है.
बिना शर्त माफी पर भी कोर्ट नाराज
कोर्ट ने बार-बार दाखिल किए जा रहे उन हलफनामों पर भी नाराजगी जताई, जिनमें अधिकारियों की ओर से बिना शर्त और बिना किसी स्पष्टीकरण के माफी मांगी जाती रही है. अदालत ने कहा कि जब वर्षों से आदेशों का पालन नहीं हुआ हो, तब ऐसी माफियां वास्तविक नहीं लगतीं और परिस्थितियों को देखते हुए उनका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता.
अतिरिक्त मुख्य सचिव को नोटिस, मुख्य सचिव को संभालनी होगी जिम्मेदारी
DGP के हलफनामे में जिम्मेदारी गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव वंदना डाडेल पर डाले जाने के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है. अदालत ने पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए. उन्हें 14 अक्टूबर 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का अवसर दिया गया है.
कोर्ट ने झारखंड के मुख्य सचिव को भी मामले की जिम्मेदारी लेने का निर्देश दिया है. साथ ही कहा है कि वह स्वयं शपथपत्र दाखिल कर यह बताएं कि सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम कब तक पूरा होगा. अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि किसी एजेंसी, JAP-IT या ठेकेदार के हलफनामे को स्वीकार नहीं किया जाएगा. सरकार को सीधे जवाब देना होगा.
पहले भी जारी हो चुका है अवमानना नोटिस
गौरतलब है कि 24 सितंबर को हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया था. अदालत ने याद दिलाया कि राज्य सरकार को 31 दिसंबर 2025 तक सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश दिया गया था, लेकिन बार-बार समय मांगने के बावजूद आदेश का पालन नहीं हुआ.
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