प्रतीकात्मक तस्वीर
बरेली:
‘गुलाबी शहर’ जयपुर में मकर सक्रांति पर आयोजित होने वाले पतंग महोत्सव में इस बार बरेली की अद्भुत कारीगरी से सजी पतंगे परवाज भरेंगी. नोटबंदी और राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) में सूती मांझे को लेकर चल रहे मामले के चलते बरेली के सैकड़ो कारीगर जयपुर पलायन कर गये हैं और वे वहीं रहकर पतंग बनाने और बेचने में लगे हैं.
यूं तो हर साल यहां से 10 करोड़ रुपये के लगभग का पतंग-मांझा जयपुर को सप्लाई होता है. कुछ कारीगर भी वहां रोजगार के लिये जाते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या कहीं अधिक है. कारीगरों के जयपुर पहुंचने से जहां पतंग-मांझा वक्त से वहां के व्यापारियों को मिला वहीं उन्होंने अपनी पसंद के मुताबिक सामान भी बनवाया.
पतंग के कारोबारी सुहेल अंसारी के मुताबिक हर साल 10 करोड़ रुपये से अधिक का पतंगबाजी का सामान जयपुर जाता है. वहां के राजस्थान और उससे बाहर के राज्यों के व्यापारियों को भारी मात्रा में पतंगबाजी का माल उपलब्ध कराया जाता है. यहां के करीब 50 व्यापारी बाद में हिसाब-किताब के लिए वहां जाते हैं.
उन्होंने बताया कि पतंग महोत्सव के लिए व्यापारी हर साल नवंबर में जयपुर जाते हैं. इस बार नोटबंदी के चलते काम बंद होने के बाद करीब 250 कारीगर जयपुर पलायन कर गए हैं. इसके अलावा एनजीटी से सूती मांझे पर भी रोक लगाने की मांग सम्बन्धी मामला इस अभिकरण में लम्बित होने की वजह से भी व्यापारी कम मात्रा में मांझा बना रहे हैं.
मांझा उद्योग कल्याण समिति के अध्यक्ष कमाल अली ने बताया कि जिले में पतंग-मांझा के काम में खासी कमी आई है. इसका बड़ा कारण नोटबंदी है. रुपये की किल्लत के कारण कई व्यापारी काम नहीं शुरू कर पाए. इसके साथ ही एनजीटी में चल रहे मामले को लेकर भी व्यापारी आशंकित हैं. इस कारण उत्पादन बहुत अधिक नहीं किया है. इससे यहां के सैकड़ों कारीगर बेकार हो गए हैं. उन्होंने बताया कि मकर सक्रांति पर होने वाले पतंग महोत्सव के चलते जयपुर गए कारीगरों को बरेली के मुकाबले दोगुनी मजदूरी मिल जाती है. इस कारण इस बार बड़ी संख्या में वहां कारीगर गये हैं.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
यूं तो हर साल यहां से 10 करोड़ रुपये के लगभग का पतंग-मांझा जयपुर को सप्लाई होता है. कुछ कारीगर भी वहां रोजगार के लिये जाते हैं, लेकिन इस बार उनकी संख्या कहीं अधिक है. कारीगरों के जयपुर पहुंचने से जहां पतंग-मांझा वक्त से वहां के व्यापारियों को मिला वहीं उन्होंने अपनी पसंद के मुताबिक सामान भी बनवाया.
पतंग के कारोबारी सुहेल अंसारी के मुताबिक हर साल 10 करोड़ रुपये से अधिक का पतंगबाजी का सामान जयपुर जाता है. वहां के राजस्थान और उससे बाहर के राज्यों के व्यापारियों को भारी मात्रा में पतंगबाजी का माल उपलब्ध कराया जाता है. यहां के करीब 50 व्यापारी बाद में हिसाब-किताब के लिए वहां जाते हैं.
उन्होंने बताया कि पतंग महोत्सव के लिए व्यापारी हर साल नवंबर में जयपुर जाते हैं. इस बार नोटबंदी के चलते काम बंद होने के बाद करीब 250 कारीगर जयपुर पलायन कर गए हैं. इसके अलावा एनजीटी से सूती मांझे पर भी रोक लगाने की मांग सम्बन्धी मामला इस अभिकरण में लम्बित होने की वजह से भी व्यापारी कम मात्रा में मांझा बना रहे हैं.
मांझा उद्योग कल्याण समिति के अध्यक्ष कमाल अली ने बताया कि जिले में पतंग-मांझा के काम में खासी कमी आई है. इसका बड़ा कारण नोटबंदी है. रुपये की किल्लत के कारण कई व्यापारी काम नहीं शुरू कर पाए. इसके साथ ही एनजीटी में चल रहे मामले को लेकर भी व्यापारी आशंकित हैं. इस कारण उत्पादन बहुत अधिक नहीं किया है. इससे यहां के सैकड़ों कारीगर बेकार हो गए हैं. उन्होंने बताया कि मकर सक्रांति पर होने वाले पतंग महोत्सव के चलते जयपुर गए कारीगरों को बरेली के मुकाबले दोगुनी मजदूरी मिल जाती है. इस कारण इस बार बड़ी संख्या में वहां कारीगर गये हैं.
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