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यशवंत वर्मा की याचिका तथ्यहीन...लोकसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट में क्यों कहा ऐसा?

लोकसभा सचिव जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज करने की मांग की है. जवाब में कहा गया कि जांच समिति का गठन संसद की कार्यवाही का हिस्सा है और इसमें कोई पूर्वाग्रह नहीं हुआ.

यशवंत वर्मा की याचिका तथ्यहीन...लोकसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट में क्यों कहा ऐसा?
  • लोकसभा सचिव जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका को गलत तथ्यों पर आधारित बताते हुए खारिज करने की मांग की
  • राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त 2025 को महाभियोग प्रस्ताव को लिखित रूप में खारिज कर दिया था
  • जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट की धारा तीन तभी लागू होती है जब महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार हो जाएं
नई दिल्ली:

लोकसभा सचिव जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करते हुए जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज करने की मांग की है. सचिवालय ने कहा कि यह याचिका “गलत तथ्यों पर आधारित” है और स्पीकर द्वारा जांच समिति के गठन के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट सवाल नहीं उठा सकता क्योंकि यह “संसद के भीतर की कार्यवाही के दायरे में आता है.” जवाब में कहा गया कि जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट, 1968 की धारा 3 केवल उसी स्थिति में लागू होती है, जब महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार किया जाए. 

सचिवालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी सांसद ने 11 अगस्त 2025 के उस आदेश को चुनौती नहीं दी है, जिसमें राज्यसभा के उपसभापति ने महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार करने से इनकार किया था. इसलिए वह निर्णय अंतिम है. 62 सांसदों द्वारा लाया गया राज्यसभा का प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं किया गया.

 उपसभापति ने 11 अगस्त 2025 को लिखित आदेश के जरिए उसे खारिज कर दिया था, जिससे केवल लोकसभा का प्रस्ताव ही वैध बचता है. जस्टिस वर्मा के इस आरोप को भी खारिज किया गया कि स्पीकर ने CJI की इन-हाउस कमेटी रिपोर्ट पर भरोसा किया. सचिवालय के अनुसार, सांसदों ने स्वतंत्र रूप से राय बनाई, जबकि स्पीकर ने केवल प्रस्ताव की सामग्री को रिकॉर्ड किया.

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने क्या कहा?

जस्टिस दत्ता ने कहा कि नियमों के मुताबिक प्रोविज़ो को सेक्शन के हिस्से के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए. इसमें कहा गया है कि कोई जॉइंट कमेटी नहीं बन सकती जब तक कि दोनों सदनों में प्रस्ताव मंज़ूर न हो जाए. अगर मंज़ूर नहीं होता, तो इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है. इसलिए इसे विधायिका के इरादे के हिसाब से पढ़ना होगा.

जस्टिस वर्मा के लिए मुकुल रोहतगी ने क्या दलील दी

रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के चेयरमैन इस्तीफा दे चुके थे, ऐसे में डिप्टी चेयरमैन सिर्फ सदन को नियंत्रित करने के लिए थे. वे इस प्रस्ताव को खारिज नहीं कर सकते थे. जस्टिस दत्ता ने कहा कि चेयरमैन मौजूद नहीं थे, इसलिए डिप्टी चेयरमैन ने यह काम संभाला और प्रस्ताव को खारिज कर दिया. 

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