- विधानसभा चुनाव में भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाकर चुनावी माहौल बदलने की कोशिश कर रही है
- सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या दौरे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ने की चुनौती दी है
- राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने पिछड़ा, दलित और सवर्ण वर्ग के नेताओं को टिकट देकर सामाजिक समीकरण तैयार किए हैं
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक तरफ़ भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने में लगी है तो दूसरी तरफ़ विपक्ष पीडीए को आगे कर 2024 वाला माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. पिछले कुछ महीनों से जहां पीडीए का मुद्दा हावी दिख रहा था तो वहीं बीते एक हफ़्ते में काशी, अयोध्या, मथुरा और संभल का मुद्दा जैसे उठा या उठाया गया है. उससे ऐसा लगता है कि भाजपा माहौल को बदलने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है. पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक वाले अखिलेश यादव के फ़ॉर्मूले के बीच राज्यसभा चुनाव में सीएम योगी आदित्यनाथ का 80-20 से जोड़ना अहम है. फिर अखिलेश यादव का अयोध्या जाकर सीएम योगी को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती देने वाला बयान और उसके बाद सीएम का पलटवार, ऐसा लगता है जैसे इन सबने नैरेटिव बदलने में अहम भूमिका निभाई है.
इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी का अखिलेश को संभल से चुनाव लड़ने की चुनौती वाले बयान से हिंदुत्व के एजेंडे को कहीं ना कहीं मजबूती मिलती दिख रही है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने अयोध्या दौरे पर भागवत कथा में हिस्सा लिया लेकिन वो राम मंदिर दर्शन के लिए नहीं गए. उन्होंने अयोध्या में ही सीएम योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी. सीएम योगी ने बलरामपुर में चुनौती स्वीकार करते हुए अखिलेश यादव को उनके सामने आकर चुनाव लड़ने की बात कह दी. यूपी के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव के मथुरा ना जाने पर सवाल उठाया तो ओवैसी ने अखिलेश को संभल से किस्मत आजमाने की बात कही.
अखिलेश यादव ने इन चुनौतियों के सवाल पर बिना नाम लिए सीएम योगी के बारे में कहा कि जो टिकट तय नहीं करते हैं, वे कैसे तय कर सकते हैं कि कहां से उतरेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ये अच्छा लग रहा है कि उनके पास इतने सारे विकल्प आ गए हैं. लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अखिलेश यादव ने ये भी कहा था कि अगर बिना चुनाव लड़े सीएम की कुर्सी मिल जाये तो इससे अच्छा क्या होगा. यानी अखिलेश यादव ने इशारों में बताने की कोशिश की कि वो विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. हालांकि तब तक बीजेपी अखिलेश यादव पर हमलावर हो चुकी थी.
चुनाव आने तक कौन सा कार्ड चलेगा, जाति, धर्म या विकास?
दरअसल यूपी की राजनीति में जब बात वोटिंग पर आती है तो माना जाता है कि चुनाव या तो जाति के मुद्दे पर होगा या धर्म के. इन दोनों के बाद विकास के मुद्दे की बात होती है. भाजपा के पास सीएम योगी आदित्यनाथ का हिंदुत्ववादी चेहरा है तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पीडीए के रथ पर सवार हैं. ऐसे में पीडीए की चर्चाओं के बीच दोबारा 80-20 की चर्चा और धर्मस्थलों का नाम लेकर बीजेपी कहीं ना कहीं नैरेटिव को बदलने की कोशिश करती दिखाई दे रही है. जाति की बात करें तो ऐसा नहीं है कि भाजपा अपने 'पीडीए' को मज़बूत करने का काम नहीं कर रही है.
राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने बनाया अपना PDA समीकरण
राज्यसभा चुनाव में ही तीन पिछड़े, दो दलित, दो ब्राह्मण और एक राजपूत को संसद के ऊपरी सदन भेजकर बड़ा दांव चला है. पिछड़ों में पाल, कुर्मी और लोध शामिल हैं. वहीं एक सोनकर और एक रावत को मौका देकर गैर जाटव दलितों को साधने की कोशिश हुई है. दो ब्राह्मण और एक राजपूत को टिकट देकर सवर्णों को साधने का भी प्रयास हुआ है. बात करें सपा की तो अखिलेश यादव पीडीए के साथ-साथ सॉफ्ट हिंदुत्व को साथ लेकर चलते दिखाई देते हैं. इटावा में अखिलेश यादव केदारेश्वर मंदिर बनवा रहे हैं. अयोध्या ना जाने के सवाल पर वो केदारेश्वर मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तक इंतज़ार की बात कह रहे हैं.
अयोध्या में अलग ही रंग में नजर आए अखिलेश यादव
अयोध्या में भगवा अंगवस्त्रम और टीका लगाकर उन्होंने अपनी अलग छवि पेश करने की भी कोशिश की. इसके अलावा राम मंदिर के चढ़ावा चोरी के मुद्दे को उठाकर वो भी हिंदुओं को साधने की जुगत में लगे दिखाई दे रहे हैं. बीते एक सप्ताह में सपा प्रमुख मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाये जाने के विपक्ष के मुहिम में शामिल हैं. दिल्ली केन्द्रित विरोध प्रदर्शन में अखिलेश यादव की व्यस्तता के बीच सीएम योगी और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन काशी भी गए. अयोध्या का मामला भी उठाया और मथुरा की भी बात सामने आई. यानी काशी, मथुरा और अयोध्या के ज़िक्र के साथ बीजेपी पीडीए की चर्चाओं को कम करके अपनी हिंदुत्व वाली पिच को मज़बूत करने की क़वायद कर रही है. देखना होगा कि चुनाव आते-आते किसकी पिच पर चुनावी मैच होगा.
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