प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे गए सवाल से तय हो गई थी भारत की आजादी की तारीख, जापान से क्या था कनेक्शन?
माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख 15 अगस्त इसलिए चुनी क्योंकि यह जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी, जो उनके सैन्य करियर की बड़ी उपलब्धि थी.
26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने पहली बार 'स्वतंत्रता दिवस' मनाया था. दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पारित हुआ था और उसके बाद से 1947 तक हर साल 26 जनवरी को यही दिन दोहराया जाता रहा. जब सचमुच सत्ता हस्तांतरण की बारी आई, तो कई भारतीय नेता यही चाहते थे कि आजादी की तारीख भी 26 जनवरी हो. लेकिन फैसला किसी भारतीय नेता के हाथ में नहीं था. यह फैसला भी लॉर्ड माउंटबेटन ने लिया और उन्होंने बिल्कुल अलग तारीख चुनी.

जून में माउंटबेटन, नेहरू और जिन्ना के बीच बंटबारे को लेकर चल रही बैठक के दौरान
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फरवरी 1947 में जब माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय बनाकर भेजा गया, तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने उन्हें सत्ता हस्तांतरण के लिए 30 जून 1948 तक का वक्त दिया था. लेकिन तब तक जिन्ना के 'डायरेक्ट एक्शन डे' की कॉल के बाद देश के कई हिस्सों में दंगे भड़क चुके थे.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया ऑफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि माउंटबेटन को जल्दी ही यह अंदाजा हो गया था कि जून 1948 तक इंतजार करने का मतलब होगा प्रशासनिक ढांचे का पूरी तरह बिखर जाना. यही वजह थी कि सत्ता हस्तांतरण की तारीख लगभग दस महीने पहले तय की गई.
लेकिन आखिर सवाल उठता है कि 15 अगस्त ही क्यों हमारी आजादी का दिन तय हुआ? ये किसने किया और क्यों किया?
लैरी कॉलिंस और डॉमिनिक लापियरे अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखते हैं कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब माउंटबेटन से पूछा गया कि क्या कोई तारीख तय हुई है, तो वो इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे.

लैरी कॉलिंस और डॉमिनिक लापियरे अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट'
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लेकिन वो यह भी नहीं दिखाना चाहते थे कि फैसले में कोई अनिश्चितता है. माउंटबेटन ने बाद में खुद इस पल को याद करते हुए कहा था, "तारीख जो मैंने चुनी, वो अचानक निकली. मुझे पता था कि यह जल्द होनी चाहिए. मुझे लग रहा था कि अगस्त या सितंबर के आसपास होगा और फिर मैंने 15 अगस्त कह दिया."
यह तारीख उनके जेहन में क्यों आई, इसका जवाब भी उन्होंने खुद दिया. 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण की घोषणा की थी, यानी 1947 की यह तारीख उस दिन की दूसरी बरसी थी. माउंटबेटन उस वक्त दक्षिण-पूर्व एशिया कमान के सुप्रीम एलाइड कमांडर थे और जापानी सेना की हार उनके सैन्य करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी. अपनी उसी जीत की याद में उन्होंने बिना किसी पूर्व योजना के प्रेस कॉफ्रेंस में ही 15 अगस्त 1947 का ऐलान कर दिया.
यह तारीख सामने आते ही देश में एक नया विवाद खड़ा हो गया. ज्योतिषियों ने पंचांग के आधार पर 15 अगस्त को अशुभ बताया था. तब माउंटबेटन तारीख बदलने को तैयार नहीं थे, तो बीच का रास्ता निकाला गया. फिर 14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि को समारोह रखा गया. अंग्रेज़ी कैलेंडर में रात 12 बजे नया दिन शुरू होता है, जबकि हिंदू पंचांग में सूर्योदय के साथ. मध्यरात्रि का समय दोनों गणनाओं में फिट बैठ गया. यही वजह है कि संविधान सभा का सत्र 14 अगस्त की रात 11 बजे शुरू हुआ और ठीक आधी रात नेहरू ने अपना 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण दिया.

रामचंद्र गुहा की किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी'
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इस ऐलान को कानूनी शक्ल देने के लिए ब्रिटिश संसद ने 'इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947' पास किया, जिसे 18 जुलाई 1947 को मंजूरी मिली. इसी एक्ट के तहत भारत और पाकिस्तान नाम के दो डोमिनियन अस्तित्व में आने तय हुए.
15 अगस्त 1947 को भारत को जो आजादी मिली, वह कानूनन 'डोमिनियन स्टेटस' थी. अंदरूनी तौर पर पूरी तरह स्वतंत्र, लेकिन ब्रितानी ताज को प्रतीकात्मक रूप से राष्ट्र-प्रमुख मानते हुए. माउंटबेटन उसी दिन से भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने. यह दर्जा भारत में 26 जनवरी 1950 तक चला, जिस दिन संविधान लागू हुआ और इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट की शर्तें खत्म हो गईं.
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