- स्काईरूट एयरोस्पेस ने भारत का पहला प्राइवेट तौर पर विकसित सबसे छोटा ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया है
- विक्रम-1 रॉकेट को 350 किलोग्राम तक के सैटेलाइट को लो अर्थ ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है
- मिशन आगमन का मुख्य उद्देश्य उड़ान के दौरान विक्रम-1 के सिस्टम का वास्तविक प्रदर्शन डेटा इकट्ठा करना है
भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न 'स्काईरूट एयरोस्पेस' ने 'विक्रम-1' से पर्दा उठा दिया है. यह भारत का सबसे छोटा ऑर्बिटल रॉकेट है. साथ ही यह देश का पहला प्राइवेट तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट है. सात मंजिला ऊंचाई वाला यह शानदार रॉकेट अब उड़ान के लिए तैयार है. इसके जरिए भारत अपने पहले प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च मिशन को देखने के करीब है. श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के रॉकेट असेंबली बिल्डिंग में स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपने पूरी तरह से तैयार 'विक्रम-1' लॉन्च व्हीकल को पेश किया है. स्काईरूट एयरोस्पेस की वैल्यू 1.1 बिलियन डॉलर से ज्यादा है.
स्काईरूट एयरोस्पेस किसका है?
भारत के स्पेस प्रोग्राम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखे गए 'विक्रम-1' रॉकेट में तकनीकी इनोवेशन और भारत के उभरते प्राइवेट स्पेस सेक्टर का बढ़ता भरोसा दिखता है. स्काईरूट एयरोस्पेस के अनुसार, इस लॉन्च व्हीकल को 12 जुलाई से 4 अगस्त के बीच किसी समय लॉन्च करने की योजना है. लॉन्च की टाइमिंग फाइनल टेस्ट, मौसम की स्थिति और रेगुलेटरी मंजूरी पर निर्भर करेगा. इस मिशन का नाम "आगमन" रखा गया है, जो एक संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ है "पहुंच, उपस्थिति, आना". यह नाम ग्लोबल स्टेज पर भारत की प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता के आने का प्रतीक है. स्काईरूट एयरोस्पेस के लिए, यह पल सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च से कहीं ज्यादा अहम है. ISRO के पूर्व वैज्ञानिक पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका द्वारा शुरू की गई हैदराबाद की यह कंपनी तेजी से दुनिया के प्रमुख प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स में से एक बन गई है. इसकी तरक्की भारत के स्पेस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों की ताकत को दिखाती है. आज, स्काईरूट देश का पहला स्पेस टेक्नोलॉजी यूनिकॉर्न और दुनिया भर में सबसे ज्यादा ध्यान खींचे जाने वाले प्राइवेट स्पेस वेंचर्स में से एक है.
विक्रम-1 की क्या है खूबियां?
- पूरी तरह से तैयार विक्रम-1 एडवांस्ड इंजीनियरिंग का एक शानदार उदाहरण है. भारत के कई बड़े लॉन्च व्हीकल्स की तुलना में यह आकार में छोटा है, लेकिन इसे 350 किलोग्राम तक वजन वाले सैटेलाइट्स को लो अर्थ ऑर्बिट (पृथ्वी की निचली कक्षा) में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है.
- इसके पहले मिशन का लक्ष्य पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊपर, 60 डिग्री के झुकाव वाली कक्षा में पहुंचना है. यह व्हीकल पूरी तरह से कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर से बना है, जिससे यह हल्का तो है ही, साथ ही इसमें लॉन्च के समय लगने वाले जबरदस्त दबाव को झेलने की मजबूती भी है.
- विक्रम-1 की सबसे अहम खूबियों में से एक है नई पीढ़ी की मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल. इस रॉकेट में एडवांस्ड कम्पोजिट मटीरियल और प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है, जिन्हें पूरी तरह से स्काईरूट ने खुद डेवलप किया है.
- इसके सबसे चर्चित इनोवेशन में 3D प्रिंटेड रॉकेट इंजन शामिल हैं, जिनसे तेजी से प्रोडक्शन, डिजाइन में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी और कम मैन्युफैक्चरिंग लागत मुमकिन हो पाती है.
- हाई थ्रस्ट वाले सॉलिड रॉकेट मोटर और मॉडर्न गाइडेंस सिस्टम के साथ मिलकर, ये टेक्नोलॉजी भविष्य में अंतरिक्ष तक बार-बार और सस्ती पहुंच बनाने में मदद करेंगी.
'मिशन आगमन' का मुख्य मकसद
स्काईरूट एयरोस्पेस के को-फाउंडर और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर पवन कुमार चंदाना का कहना है कि 'मिशन आगमन' का मुख्य मकसद जरूरी फ्लाइट डेटा इकट्ठा करना है, जो सिर्फ असल फ्लाइट की स्थितियों में ही मिल सकता है. उन्होंने बताया, "मिशन आगमन का सबसे अहम मकसद विक्रम-1 के हर सिस्टम से उड़ान के दौरान असल परफॉर्मेंस का डेटा इकट्ठा करना है. हम यह समझना चाहते हैं कि लिफ्ट-ऑफ से लेकर ऊपर जाने के हर चरण में यह व्हीकल कैसा काम करता है. जमीन पर टेस्टिंग करके इस डेटा को पूरी तरह से दोबारा हासिल नहीं किया जा सकता. यह डेटा हमें अपने डिजाइन को सही साबित करने और आगे के व्हीकल डेवलपमेंट में मदद करेगा, ताकि हम एक भरोसेमंद और तेजी से लॉन्च होने वाला कमर्शियल लॉन्च प्रोग्राम बना सकें."
उनका मानना है कि यह लॉन्च भारत के पूरे प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री के लिए एक अहम मोड़ साबित होगा. जिस पल विक्रम-1 उड़ान भरेगा, भारत का प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री एक ऐसी सीमा पार कर लेगा, जिसे उसने पहले कभी पार नहीं किया है. हालांकि, जानकारों का कहना है कि असली परीक्षा तब होगी जब यह सैटेलाइट और पेलोड को उनकी तय कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचा देगा. स्पेस टेक्नोलॉजी में गलती की गुंजाइश बहुत कम होती है - या तो आप सफल होते हैं या फिर असफल.
यह आने वाला मिशन स्काईरूट की विक्रम-S के साथ मिली पिछली सफलता को आगे बढ़ाएगा. विक्रम-S ने 18 नवंबर, 2022 को इतिहास रचा था और भारतीय धरती से अंतरिक्ष तक पहुंचने वाला पहला प्राइवेट तौर पर बनाया गया रॉकेट बना था. उस सब-ऑर्बिटल उड़ान ने कंपनी की बुनियादी टेक्नोलॉजी को साबित किया और अब लॉन्च होने वाले कहीं ज्यादा बड़े ऑर्बिटल मिशन के लिए भरोसा जगाया.
प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण
को-फाउंडर और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर नागा भरत डाका के लिए, विक्रम-1 एक शानदार सफर में अगला स्वाभाविक कदम है. उनके अनुसार, "भारत में एक प्राइवेट लॉन्च व्हीकल बनाने के सपने से लेकर अब ऑर्बिटल फ्लाइट की कोशिश करने तक का सफर बिल्कुल अनोखा रहा है. 2022 में विक्रम-S के साथ, हमने अपनी टेक्नोलॉजी स्टैक की नींव को परखा. विक्रम-1 के साथ, हम भारत में, भारत और दुनिया के लिए बनाए गए भरोसेमंद और तेजी से लॉन्च होने वाले प्रोग्राम की दिशा में अपना सबसे बड़ा कदम उठा रहे हैं."
डाका ने इस प्रोग्राम के पीछे की सामूहिक कोशिशों पर भी जोर दिया. उन्होंने भारत सरकार, स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe, ISRO, निवेशकों, ग्राहकों और स्काईरूट की इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की बढ़ती टीम से मिले सहयोग को भी माना.
स्काईरूट का कहना है कि इस उड़ान में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के पेलोड का मिश्रण ले जाने की उम्मीद है, जिससे यह आंशिक रूप से एक कमर्शियल मिशन बन जाता है. साथ ही, यह मूल रूप से एक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन और सीखने की प्रक्रिया भी है. इंजीनियर पूरे मिशन के दौरान प्रोपल्शन सिस्टम, स्टेज सेपरेशन, गाइडेंस, नेविगेशन, कंट्रोल और पूरे व्हीकल के व्यवहार से जुड़े परफॉर्मेंस डेटा का बारीकी से अध्ययन करेंगे. इससे मिली जानकारी भविष्य के ऑपरेशनल लॉन्च को बेहतर बनाने में मदद करेगी. विक्रम-1 का महत्व स्काईरूट से कहीं आगे तक जाता है. यह मिशन भारत के तेजी से बढ़ते प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है. दशकों तक, ऑर्बिट तक पहुंच मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्पेस एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में थी. स्काईरूट और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी कंपनियों का सामने आना यह दिखाता है कि भारत का प्राइवेट सेक्टर अब लॉन्च सेवाओं, सैटेलाइट डिप्लॉयमेंट और कमर्शियल स्पेस गतिविधियों में एक प्रमुख भागीदार बन रहा है.
श्रीहरिकोटा में पूरी तरह तैयार विक्रम-1 रॉकेट अपनी ऐतिहासिक उड़ान के लिए तैयार खड़ा है; यह सिर्फ एक रॉकेट से कहीं ज्यादा है. यह भारत की उद्यमिता की महत्वाकांक्षा, इंजीनियरिंग क्षमता और ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में बढ़ती मौजूदगी का प्रतीक है. कुछ हफ्तों में, जब 'मिशन आगमन' भारतीय धरती से उड़ान भरेगा, तो यह एक नए युग की शुरुआत हो सकती है, जिसमें भारत की प्राइवेट कंपनियां नियमित रूप से पृथ्वी से परे मिशन बनाएंगी, लॉन्च करेंगी और उनका संचालन करेंगी.
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