एक अहम फैसले में, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने 15 दस्तावेज पेश किए थे, लेकिन उनमें से कोई भी यह साबित नहीं कर सका कि वह भारतीय नागरिक है. हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में वे 15 दस्तावेज याचिकाकर्ता को यह साबित करने में मदद नहीं करते कि उसने 'फॉरेनर्स एक्ट, 1964' की धारा 9 के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है. यानी यह साबित करना कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.
NDTV ने वह आदेश देखा है, जिसमें कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति के विदेशी होने पर सवाल उठता है, तो नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होती है. यह आदेश 30 जून को जस्टिस कल्याण राय सुराना और शमीमा जहान की बेंच ने दिया था.
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में पेश किए 15 दस्तावेज
आदेश में आगे कहा गया, 'हालांकि याचिकाकर्ता ने 15 दस्तावेज पेश किए, लेकिन वे उसे यह साबित करने में मदद नहीं करते कि उसने धारा 9 के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है.'
इस मामले में याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) की कॉपी जमा की थी, जिसमें उनके दादा-दादी और पिता के नाम दर्ज थे. साथ ही 1966 से 2017 तक की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, 1973 के जमीन खरीद के दस्तावेज, पैन कार्ड, वोटर ID और स्कूल का सर्टिफिकेट भी पेश किया था.
असम NRC का काम 2019 में पूरा हो गया था, लेकिन इसे अभी तक नोटिफाई नहीं किया गया है. यह तय करने के लिए यह मुख्य दस्तावेज़ होना था कि कौन असली भारतीय नागरिक है और कौन अवैध प्रवासी.
क्या है मामला?
यह मामला अमीनुल हक की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने गुवाहाटी के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के 28 फरवरी 2019 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें विदेशी घोषित किया गया था.
इस मामले में, पहले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और बाद में हाई कोर्ट में, हक ने दावा किया कि उनका परिवार पीढ़ियों से असम में रह रहा है. अपने दावे के समर्थन में, उन्होंने 1951 के NRC के हिस्से, 1966 और उसके बाद की वोटर लिस्ट, 1973 की जमीन की बिक्री का दस्तावेज, अपना पैन कार्ड, EPIC, स्कूल के सर्टिफिकेट और परिवार से जुड़े दस्तावेज पेश किए.
इसके अलावा, हक के पिता कोर्ट में पेश हुए और उन्हें अपना बेटा बताया. लेकिन कोर्ट ने कहा कि मान्य और प्रासंगिक दस्तावेजी सबूतों के बिना सिर्फ ज़ुबानी सबूत यह साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि दोनों के बीच कोई संबंध है.
इससे पहले फरवरी 2019 में, असम के कामरूप में एक फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने हक को विदेशी घोषित कर दिया था. उन्होंने हाई कोर्ट में अपील की. हक ने कहा कि गरीबी के कारण वह गुवाहाटी में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम कर रहे थे और अजारा पुलिस स्टेशन के तहत बोरबोरी गांव में किराए के मकान में रह रहे थे.
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