जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतों में लंबित मामलों के लिए केवल न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि देरी के कई कारण हैं, लेकिन आलोचना का सबसे अधिक सामना न्यायपालिका को करना पड़ता है.
असल में जस्टिस दत्ता संसद में हो रही चर्चा का हवाला दे रहे थे. यह टिप्पणी एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की ओर से दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान की गई. याचिका में गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति देने से इनकार किया गया था.
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने हाई कोर्ट द्वारा लगाए गए जुर्माने का मुद्दा उठाने की कोशिश की, लेकिन जस्टिस दत्ता ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. इसी दौरान जस्टिस दत्ता ने कहा कि न्यायपालिका अक्सर आलोचना का निशाना बनती है. उन्होंने कहा हम ही सबसे ज्यादा आलोचना झेलते हैं.
जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि आज के अखबार में भी देखा कि संसद में यह चर्चा हो रही है कि हम लोगों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं. इस पर वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने कहा कि मामलों के लंबित रहने और देरी के मुद्दे पर न्यायपालिका “सबसे आसान निशाना” बन गई है.
जस्टिस दत्ता ने इस दौरान श्री रामकृष्ण की पत्नी शारदा देवी की पंक्तियां पढ़ीं, “दूसरों की गलतियां मत देखिए, पहले अपनी गलतियां देखिए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.
अदालत में लंबित मामले
दरअसस केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में लिखित उत्तर में बताया है कि सुप्रीम कोर्ट में 10 साल से अधिक समय से 10,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं. देश के विभिन्न हाई कोर्टों में 30 साल से अधिक समय से लगभग 80,000 मामले लंबित हैं.
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