- संसदीय समिति ने सोशल मीडिया, डेटिंग और गेमिंग प्लेटफॉर्म के अनिवार्य KYC वेरिफिकेशन की सिफारिश की है
- एनसीआरबी का डेटा बताता है कि 2017 से 2022 के बीच महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम 239% बढ़ गए है
- 2019 से अप्रैल 2025 के बीच नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर महिलाओं, बच्चों से संबंधित 2.48 लाख शिकायतें मिलीं
भारत में फेसबुक-इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है. एक संसदीय समिति की सिफारिशें अगर मान ली गईं तो सोशल मीडिया यूज करने, डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल करने और यहां तक कि ऑनलाइन गेम खेलने के लिए भी KYC का वेरिफिकेशन कराना पड़ सकता है. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ऐसी नौबत आई क्यों? इसका जवाब उन खौफनाक आंकड़ों में छिपा है, जो बताते हैं कि भारत में डिजिटल स्पेस महिलाओं और बच्चों के लिए कितना अनसेफ हो गया है.
बिना KYC नहीं चलेगा सोशल मीडिया
पहले जानिए कि मामला क्या है. दरअसल, महिलाओं के सशक्तिकरण पर संसद की एक स्थायी समिति की चौथी रिपोर्ट (2025-26) हाल ही में संसद में पेश की गई है. डी. पुरुंदेश्वरी की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि सभी तरह के सोशल मीडिया, डेटिंग और गेमिंग प्लेटफॉर्म के लिए केवाईसी आधारित अनिवार्य वेरिफिकेशन शुरू किया जाना चाहिए.
आखिर ये नौबत आई क्यों?
संसदीय समिति ने KYC की अपनी सिफारिश के पीछे नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के चौंकाने वाले आंकड़ों को आधार बनाया है. समिति का तर्क है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील कंटेंट और उत्पीड़न की बेतहाशा शिकायतें मिल रही हैं. महिलाओं और नाबालिग बच्चों का फर्जी प्रोफाइल बनाकर और गुमनाम तरीके से उत्पीड़न की घटनाएं काफी बढ़ चुकी हैं. साइबर स्टॉकिंग, ऑनलाइन परेशान करना और बिना इजाजत के निजी तस्वीरों को शेयर करने की शिकायतें भी बड़े पैमाने पर आ रही हैं. ऐसे में लोगों को शोषण और धोखाधड़ी से बचाने के लिए सख्त प्रावधान जरूरी हैं.

साइबर अपराधों की सुनामी
- एनसीआरबी का डेटा बताता है कि 2017 से 2022 के बीच महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम 239 पर्सेंट तक बढ़ गए है.
- बच्चों के खिलाफ साइबर क्राइम के मामले 5 साल की इस अवधि में 20 गुना तक बढ़ गए हैं.
- 2019 से अप्रैल 2025 के बीच नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर महिलाओं, बच्चों से संबंधित 2.48 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं.
- समिति का मानना है कि असल आंकड़े कहीं ज्यादा हो सकते हैं क्योंकि लाखों महिलाएं बदनामी और जानकारी के अभाव में रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पातीं.
फेसबुक-इंस्टा के खौफनाक आंकड़े (मार्च 2025)
| कैटिगरी | फेसबुक | इंस्टाग्राम |
| सेक्सुअल कंटेंट संबंधित | 20 लाख | 9.36 लाख |
| बुलीइंग-हैरेसमेंट संबंधित | 51.8 हजार | 4.39 लाख |
| बच्चों की नग्नता, दुरुपयोग | 1.32 लाख | 1.66 लाख |
| बच्चों का यौन शोषण | 88.4 हजार | 1.66 लाख |
| *आंकड़े सोशल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई के | (संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक) |
स्नैपचैट पर भी शिकायतों का अंबार
स्नैपचैट पर अकेले मार्च 2025 में ही सेक्सुअल कंटेंट की 70,340 शिकायतें मिली थीं, जो फरवरी 2025 के 60,965 से लगभग 10 हजार ज्यादा हैं. इसी तरह मार्च में बच्चों के यौन उत्पीड़न की 25,610 (फरवरी में 21,466), बुलीइंग-उत्पीड़न की 77,715 (फरवरी में 67,571) और नकली पहचान की 21,118 (फरवरी में 17,410) शिकायतें आई थीं.
फेक प्रोफाइल, AI बड़ा खतरा
समिति ने पाया कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बहुत के लोग अपनी असली पहचान छिपाकर, फेक अकाउंट बनाकर अपराध करते हैं. फर्जी प्रोफाइल बनाकर महिलाओं की स्टॉकिंग करना, अश्लील संदेश भेजना और उनके नाम पर गलत जानकारी फैलाना अब आम हो गया है. जेनरेटिव एआई और डीपफेक टेक्नोलोजी के आने से महिलाओं की तस्वीरों को अश्लील वीडियो में बदलना आसान हो गया है. बिना KYC के इन अपराधियों को पकड़ना लगभग नामुमकिन होता है क्योंकि ये लोग अपनी असल पहचान छिपाने के लिए VPN, वर्चुअल नंबर या डार्क वेब की मदद लेते हैं.
निपटने के लिए स्पष्ट कानून नहीं
भारत में फिलहाल साइबर क्राइम से निपटने के लिए कोई स्पेसिफिक कानून नहीं है. इसकी वजह से ऑनलाइन अपराधों पर कार्रवाई के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (2000), भारतीय न्याय संहिता (2023), पॉक्सो (POCSO) एक्ट और महिला अश्लील प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम (1986) जैसे अलग-अलग कानूनों के अलग-अलग प्रावधानों का सहारा लेना पड़ता है. समिति का मानना है कि एआई और डीपफेक जैसी तकनीकों से हो रहे अपराधों से निपटने में मौजूदा प्रावधान नाकाफी साबित हो रहे हैं. ऐसे में केवाईसी वेरिफिकेशन से काफी हद तक समस्या को सुलझाया जा सकता है.
देखें- फेसबुक, इंस्टा चलाना है तो कराना होगा KYC, संसदीय समिति ने कर दी सिफारिश
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