अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस' के पहले चार्टर की औपचारिक रूप से घोषणा कर दी है. इस बोर्ड ऑफ पीस में अमेरिका के अलावा करीब 35 देशों ने शामिल होने की इच्छा जताई है या शामिल हुए हैं. इसमें पाकिस्तान का भी नाम है. इस बोर्ड में शामिल होने के लिए अमेरिका ने भारत को भी न्योता दिया था. लेकिन भारत ने इससे दूरी बना ली है. यह उसकी अपनी स्वतंत्र विदेशी नीति का प्रदर्शन है. ट्रंप ने स्वीट्जरलैंड के दावोस में 'बोर्ड ऑफ पीस'की घोषणा की. इस दौरान उन्होंने उन आशंकाओं को भी दूर करने की कोशिश की जो 'बोर्ड ऑफ पीस' को लेकर जताई जा रही हैं. उन्होंने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम अन्य संगठनों के साथ मिलकर काम करेगा. कई राजनीतिक विश्लेषक इस बात को लेकर आशंका जता रहे हैं कि ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस दरअसल संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने की कोशिश है.
ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस और भारत
दरअसल शुरू से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि भारत इस 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल नहीं होगा. विशेषज्ञ आशंका जता रहे थे कि इस 'बोर्ड ऑफ पीस' का गठन संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने या कमजोर करने के लिए किया गया है. पिछले काफी समय से संयुक्त राष्ट्र या तो निष्क्रिय नजर आ रहा है या उसकी कोई परवाह नहीं करता है. यह धारणा उस समय और भी मजबूत हुई जब अमेरिका ने तीन जनवरी को वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अगवा कर लिया था. उस समय संयुक्त राष्ट्र असहाय नजर आया या उसने वैसी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की जिसकी उम्मीद की जा रही थी. दुनिया का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के इस अवस्था में पहुंच जाने के बाद भी समस्याओं का समाधान उसके जरिए किया जा सकता है.इसलिए संयुक्त राष्ट्र अभी भी प्रासंगिक है.
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भारत संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण साझीदारों में एक है. भारत संयुक्त राष्ट्र के हर अभियान में शामिल रहता है, चाहे वह क्लाइमेट चेंज का मामला हो या स्वास्थ्य का या किसी दूसरे अंतरराष्ट्रीय संकट का. संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर भारत ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर बोलता है और दुनिया उसकी बात सुनती भी है. इसे इस तरह समझाते हैं कि क्लाइमेट चेंज के मामले में भारत क्लाइमेट न्याय की बात करता है. इसका मतलब यह हुआ कि विकासशील और विकसित देशों को एक ही पलड़े पर नहीं तौला जा सकता है. भारत संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा मिशन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. साल 1948 से संयुक्त राष्ट्र के 72 मिशनों में से 49 में भारत के दो लाख 53 हजार कर्मियों ने अपनी सेवाएं दी हैं.संयुक्त राष्ट्र के मिशन में काम करते हुए भारतीय सेना के 160 से अधिक जवानों ने शाहदत दी है.
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत ने अपनी बड़ी भूमिका उस समय भी निभाई जब कोरोना काल में दुनिया के विकसित देशों ने छोटे और गरीब देशों को वैक्सीन देने से मना कर दिया था. उस समय भारत ने 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को आगे बढ़ाते हुए करीब 100 देशों को वैक्सीन और चिकित्सा उपरकरणों की आपूर्ति की थी. भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और सार्क, जी-20, क्वाड, अफ्रीकी संघ (एयू), आसियान, यूरोपीय संघ आदि के साथ मिलकर काम किया. वहीं जब दुनिया कोरोना के संकट का सामना कर रही थी तो अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से हटने और एन-95 मास्क के निर्यात पर रोक लगा दी थी. यहां तक की भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन तक को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की गोलियां भी भेजी थीं.
वहीं इसके उलट ट्रंप प्रशासन के अधिकांश नेता ऐसा अमेरिका चाहते हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अपनी भागीदारी और अपना महत्व बनाए रखने के लिए कम संसाधन खर्च करना पड़े. इसी भावना के तहत अमेरिका के सरकारी दक्षता विभाग ने यूएसएड को खत्म करने में तेजी दिखाई. ऐसे में इस बात की संभावना अधिक है कि भारत शायद ही राष्ट्रपति ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल हो,क्योंकि वह संयुक्त राष्ट्र के जरिए अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अपनी भूमिका और प्रभावी तरीके से उठा सकता है. वैसे भी भारत की छवि रणनीतिक रूप से पश्चिम और पूरब, दोनों से गुटनिरपेक्षता की है. भारत ने आजादी के बाद बहुत लंबे समय तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया है. वहीं संयुक्त राष्ट्र करीब पूरी दुनिया का मंच है, उसमें 191 सदस्य हैं. वहीं ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के बारे में अभी कुछ भी साफ नहीं है.

माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में करीब 35 देश शामिल हो सकते हैं. ट्रंप ने करीब 50 देशों को न्योता भेजा था.
बोर्ड ऑफ पीस में कौन शामिल है
राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक बोर्ड ऑफ पीस में अमेरिका के अलावा बहरीन,मोरक्को, अर्जेंटीना, अर्मेनिया, अजरबैजान, बेल्जियम, बुल्गारिया, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाखिस्तान, कोसोवो, मंगोलिया, पाकिस्तान, पराग्वे, कतर, सउदी अरब, तुर्किये, यूएई और उजबेकिस्तान. अमेरिका ने इस 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का न्योता भारत को भी भेजा था. लेकिन 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने या न होने को लेकर अभी भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. इसके अलावा चीन, रूस, फ्रांस और नार्वे जैसे देशों ने भी राष्ट्रपति ट्रंप की इस महत्वाकांक्षी योजना से दूरी बना ली है.
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