बिहार की राजनीति में भाजपा के एक फैसले ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष और पंचायती राज मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने के लिए भाजपा के एमएलसी देवेश कुमार से इस्तीफा दिला दिया गया. अब खाली हुई सीट से दीपक प्रकाश को चुनाव लड़ाया जाएगा और इस तरह उनका मंत्री पद सेफ रहेगा. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की रणनीति और उसकी राजनीतिक योजना पर बहस शुरू कर दी है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर दीपक प्रकाश को ही विधान परिषद भेजना था, तो यह फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया?
कुछ महीने पहले ही विधान परिषद का नियमित चुनाव हुआ था. उस समय एनडीए के पास अपने उम्मीदवार तय करने का पूरा मौका था. यदि उसी समय दीपक प्रकाश को उम्मीदवार बना दिया जाता, तो आज भाजपा को अपने ही एमएलसी का इस्तीफा नहीं कराना पड़ता. यही वजह है कि विपक्ष भाजपा की राजनीतिक दूरदर्शिता पर सवाल उठा रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी बड़े दल की चुनावी और संगठनात्मक रणनीति कई महीने पहले तैयार होती है. कौन नेता किस सदन में जाएगा, किसे मंत्री बनाया जाएगा और किसे संगठन में जिम्मेदारी मिलेगी, इसकी योजना पहले से बनती है. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं दिखा.
इससे यह संदेश गया कि या तो भाजपा ने समय रहते स्थिति का सही आकलन नहीं किया या फिर बाद में ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां बन गईं, जिनके कारण उसे यह फैसला लेना पड़ा. इस फैसले के पीछे गठबंधन की राजनीति भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है. बिहार में भाजपा और आरएलएम साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं. उनके बेटे दीपक प्रकाश मंत्री हैं, लेकिन मंत्री बने रहने के लिए उनका किसी सदन का सदस्य होना जरूरी है. अगर समय सीमा के भीतर उन्हें विधान परिषद या विधानसभा का सदस्य नहीं बनाया जाता, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता था. इससे सहयोगी दल नाराज हो सकता था और सरकार के भीतर गलत संदेश जाता.
यही कारण है कि भाजपा ने अपने हिस्से की सीट का त्याग कर सहयोगी दल के नेता के बेटे के लिए रास्ता बनाया. राजनीतिक भाषा में इसे गठबंधन धर्म निभाना कहा जा सकता है. भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अपने सहयोगियों के सम्मान और राजनीतिक भविष्य की रक्षा के लिए त्याग करने को तैयार है. लेकिन राजनीति में हर फैसले की दूसरी तस्वीर भी होती है. विपक्ष अब यह सवाल उठा रहा है कि क्या भाजपा को अपने ही एमएलसी की कुर्बानी देनी पड़ी? देवेश कुमार का कार्यकाल अभी बाकी था. उन्होंने किसी विवाद या हार की वजह से नहीं, बल्कि राजनीतिक जरूरत के कारण इस्तीफा दिया. इससे यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भाजपा के अपने नेताओं का महत्व सहयोगी दलों से कम हो गया है.
भाजपा ने दिया संदेश, त्याग के लिए तैयार रहते हैं हमारे नेता
हालांकि भाजपा इस फैसले को संगठन की ताकत के रूप में पेश कर सकती है. पार्टी का तर्क होगा कि भाजपा में व्यक्ति से बड़ा संगठन और गठबंधन है. यदि सरकार और एनडीए को मजबूत रखने के लिए किसी नेता को त्याग करना पड़े, तो पार्टी के नेता इसके लिए तैयार रहते हैं. भाजपा पहले भी कई बार संगठन के हित में नेताओं की भूमिका बदलती रही है. पंचायत राज मंत्री दीपक प्रकाश के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी बिहार सरकार से कड़े सवाल पूछे. अदालत ने सरकार से पूछा कि जब कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक समय तक विधायक या विधान परिषद का सदस्य नहीं बना है, तो वह मंत्री पद पर कैसे बना हुआ है. लोग मानते है कि यह फैसला केवल दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने का नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए की एकजुटता बनाए रखने का प्रयास भी है.
क्या सहयोगी दल की नाराजगी से बचना चाहती है भाजपा?
भाजपा अच्छी तरह जानती है कि चुनाव के समय हर सहयोगी दल की नाराजगी महंगी पड़ सकती है। इसलिए उसने तत्काल राजनीतिक संकट टालने को प्राथमिकता दी. फिर भी एक सवाल बना रहेगा कि क्या यह संकट पहले से टाला नहीं जा सकता था? यदि नियमित विधान परिषद चुनाव में ही दीपक प्रकाश को उम्मीदवार बना दिया जाता, तो भाजपा को अपने एमएलसी से इस्तीफा नहीं दिलाना पड़ता और विपक्ष को भी हमला करने का मौका नहीं मिलता. यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की रणनीतिक चूक और गठबंधन की मजबूरी, दोनों नजरिए से देखा जा रहा है.
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