भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र में सरकार और उसके संस्थानों की आलोचना करना जरूरी है, ताकि सत्ता में बैठे लोगों पर नजर रखी जा सके. लेकिन उन्होंने लोगों को राय रखते समय, खासकर सोशल मीडिया पर, ऐसी बातों से बचने की सलाह दी जिससे भारत की छवि को नुकसान पहुंचे.
'दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ा'
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की ओर से आयोजित ए.के. सेन मेमोरियल लेक्चर और तस्वीर अनावरण समारोह में साल्वे ने कहा कि सार्वजनिक आलोचना जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत देश की प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए. उन्होंने लोगों से कहा कि वे याद रखें कि आज दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ा है.
साल्वे ने कहा, 'मैं भारत के बाहर रहने वाला व्यक्ति हूं और एक बात भरोसे से कह सकता हूं कि आज भारत को दुनिया में बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है. जैसा कि हम रोज देखते हैं, पश्चिमी दुनिया कई चुनौतियों से गुजर रही है. यूरोप खुद को अकेला महसूस कर रहा है. अमेरिका में भी लोग यह सोचने लगे हैं कि वहां संविधान की भावना कितनी मजबूत है. लेकिन जब भारत की प्रगति को रोकने की बात आती है, तो ये सभी एकजुट हो जाते हैं. उन्हें अब भी यह स्वीकार करना मुश्किल लगता है कि एक गैर-श्वेत आबादी वाला देश, जिसे वे कभी तीसरी दुनिया का देश कहते थे, आज दुनिया का नेतृत्व करने की आकांक्षा रखता है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है.'
'भारत की छवि खराब नहीं होनी चाहिए'
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है, लेकिन दुनिया के सामने भारत के बारे में बोलते समय सावधानी बरतनी चाहिए. साल्वे ने कहा, "भारत के भीतर सरकार और उसके संस्थानों की कड़ी आलोचना जरूरी है, ताकि वे जवाबदेह बने रहें. लेकिन हमें बहुत सावधान रहना चाहिए. सोशल मीडिया के इस दौर में हम जो कुछ भी कहते या करते हैं, उससे भारत की छवि खराब नहीं होनी चाहिए. हमेशा याद रखिए,'सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा.'"
स्वर्गीय ए.के. सेन की तस्वीर के अनावरण के मौके पर सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने उन्हें याद करते हुए कहा, "10 में से 6 बार ऐसा होता था कि वे किसी कानूनी पत्रिका से कोई कम चर्चित फैसला निकालकर लाते थे और कहते थे कि मैंने इसे फलां साल और फलां जर्नल में पढ़ा था. उनके पास ज्ञान का खजाना था, जो बताता था कि उन्हें अपनी पढ़ाई और विद्वता से कितना लगाव था. मुझे एक दोपहर कभी नहीं भूलती, जब मुझे उनके साथ मिलकर एक कानूनी राय तैयार करने का काम दिया गया था. उस समय वे मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे."
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