- दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026 में दीपांशु शौकीन निर्दलीय उपाध्यक्ष पद पर पहली बार विजयी बने हैं
- उन्होंने 20 हजार से अधिक मतों के अंतर से रिकॉर्ड जीत हासिल कर इतिहास रच दिया.
- दीपांशु ने सत्य निकेतन छात्रावास हादसे के बाद न्याय दिलाने के संकल्प के साथ नंगे पांव चुनाव प्रचार किया
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026 में दीपांशु शौकीन ने एक नया इतिहास रच दिया है. नंगे पैर चुनाव प्रचार करते हुए दीपांशु ने इस बार दो बड़े रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं. पहला ये कि DUSU के इतिहास में पहली बार कोई निर्दलीय उम्मीदवार उपाध्यक्ष पद पर विजयी हुआ है, और दूसरा ये कि उन्होंने रिकॉर्ड मतों के भारी अंतर से जीत हासिल की है. DUSU में इससे पहले कभी भी कोई निर्दलीय प्रत्याशी वाइस प्रेसिडेंट के पद तक नहीं पहुंच पाया था.
दीपांशु शौकीन का इंटरव्यू
19 सितंबर 2026 को छात्रसंघ चुनाव परिणाम के बाद एनडीटीवी से खास बातचीत में दीपांशु शौकीन ने बताया कि उन्हें इस बड़ी जीत की पूरी उम्मीद थी. जिस तरह से उन्होंने लगातार छात्रों के हितों के लिए आवाज उठाई और उनका विश्वास जीता, उसी का परिणाम है कि छात्रों का उन्हें भरपूर समर्थन और वोट मिला. इसी के बल पर वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026 में 20 हजार से अधिक मतों के बड़े अंतर से विजयी हो पाए हैं.
सत्य निकेतन छात्रावास हादसा: इंसाफ की लड़ाई लड़ूंगा-दीपांशु
एनडीटीवी से बातचीत के दौरान दीपांशु ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सत्य निकेतन छात्रावास हादसा सीधे तौर पर प्रशासन की घोर लापरवाही का नतीजा है. इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए; सिर्फ निलंबन कर देने से काम नहीं चलेगा. जब तक पीड़ित छात्रों और उनके परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिल जाता, तब तक न्याय अधूरा ही माना जाएगा. वे छात्रों के इंसाफ की यह लड़ाई हर हाल में लड़ेंगे.
कौन हैं दीपांशु शौकीन?
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2026 में उपाध्यक्ष पद पर चुने गए दीपांशु शौकीन दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके के रहने वाले हैं. उनके पिता बस कंडक्टर हैं और मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत हैं. शहीद भगत सिंह कॉलेज से स्नातक करने वाले दीपांशु शुरू से ही छात्र राजनीति में कदम रखना चाहते थे, जबकि उनके पिता की इच्छा थी कि बेटा यूपीएससी की तैयारी करके IAS या IPS अफसर बने.
DUSU चुनाव में दीपांशु ने सबसे पहले कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से टिकट मांगा था. उन्होंने NSUI उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया था, लेकिन बाद में संगठन ने उनसे नामांकन वापस लेने को कह दिया. ऐसी परिस्थिति में दीपांशु पीछे हटने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में डटे रहे और अंततः एक ऐतिहासिक जीत हासिल की.
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