- भारतीय वायुसेना ने 114 राफेल जेट विमानों की खरीद के लिए रक्षा अधिग्रहण परिषद की मंजूरी प्राप्त कर ली है.
- फ्रांस के राष्ट्रपति के भारत दौरे से पहले कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से अंतिम मंजूरी मिलने की संभावना है.
- डील के कई चरण जैसे जरूरी पहचान, तकनीकी मूल्यांकन और फील्ड ट्रायल पूरी हो चुकी हैं और अब अंतिम मंजूरी बाकी है.
आखिरकार लंबी कश्मकश के बाद इंडियन एयरफोर्स ने अपने लिए एक शानदार फाइटर जेट चुन लिया है. 114 राफेल विमानों की डील अब जल्द ही अपना अंतिम रूप ले लेगी. इन जेट्स के आने के बाद इंडियन एयरफोर्स के बेड़े में कुल 150 रफाल विमान जुड़ जाएंगे. DAC की मीटिंग के बाद इसकी आधिकारिक घोषणा हो चुकी है. अब इंतजार है सिर्फ कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी CCS की मंजूरी का.
बता दें कि 17 से 19 फरवरी को फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भारत दौरे पर होंगे. इस दौरे से पहले इस डील को CCS की मंजूरी मिलने की संभावना है, ताकि फ्रेंच प्रेसिडेंट के आने पर इसका फाइनल ऐलान किया जा सके. हम ये जानते हैं कि इस डील को DAC की मंजूरी मिल गई है. लेकिन एक रक्षा सौदा काफी बड़ा और पेचीदा मसला होता है. इसके कई चरण होते हैं. तो पहले उन्हें समझते हैं. साथ ही ये भी समझते चलेंगे कि राफेल की डील में कौन से चरण पूरे हो चुके हैं.
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1. आवश्यकता की पहचान (Acceptance of Necessity)
इसे शॉर्ट में AON कहते हैं. ये चरण पूरा हो चुका है. यानी एयरफोर्स को राफेल की जरूरत है, इसकी पहचान की जा चुकी है.
2. RFI (Request for Information)
संभावित कंपनियों से जानकारी मांगी जाती है कि वे क्या ऑफर कर सकती हैं. इस डील में Dassault Aviation कंपनी है. तो ये चरण भी पूरा हो चुका है.
3. RFP (Request for Proposal)
योग्य कंपनियों को औपचारिक निविदा जारी की जाती है. ये चरण भी पूरा किया जा चुका है.
4. तकनीकी मूल्यांकन
विमानों/उपकरणों की तकनीकी जांच और ट्रायल होते हैं. राफेल पहले से इंडियन एयरफोर्स में सेवाएं दे रहा है इसलिए उपकरणों को लेकर कोई शंका नहीं है.
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5. फील्ड ट्रायल
अलग-अलग परिस्थितियों में विमान का परफॉर्मेंस टेस्ट किया जाता है. चूंकि राफेल को भारत उड़ा रहा है, और ऑपरेशन सिंदूर में भी इस्तेमाल कर चुका है, इसलिए इस चरण को भी लगभग तय माना जा रहा है.
6. स्टाफ इवैल्यूएशन रिपोर्ट
ट्रायल के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार होती है. ट्रायल आमतौर पर इंडियन एयरफोर्स को ही करना है, ऐसे में ये चरण भी लगभग तय माना जा रहा है.
7. कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन कमेटी (CNC)
इस चरण में विमान की कीमत और शर्तों पर बातचीत होगी. जैसे कौन से हथियार या वर्जन आएंगे, कितनी कीमत होगी आदि.
8. CCS की मंजूरी
डील होने पर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) अंतिम मंजूरी देती है.
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9. कॉन्ट्रैक्ट साइन और डिलीवरी
समझौता साइन होता है और तय समयसीमा में डिलीवरी शुरू होती है. अगर सबकुछ समय पर रहा तो भारत को 2028-29 तक पहला विमान मिल जाएगा.
इस डील में चूंकि भारत और फ्रांस के बीच पहले से एक समझ बनी हुई है. इसलिए संभव है कि पहले डील साइन हो जाए, उसके बाद कीमत पर नेगोशिएशन होता रहेगा. इससे विमानों की डिलीवरी में लगने वाला समय घटने की उम्मीद है.
अब हमने ये तो समझ लिया कि एक डिफेंस डील कैसे होती है. अब ये जानते हैं कि भारत को मिलने वाले राफेल में क्या खास हो सकता है.
नए अवतार में होगा नया राफेल
भारतीय वायुसेना फिलहाल राफेल के F4 वेरिएंट का इस्तेमाल कर रही है. इस वेरिएंट में सबसे बड़ा बदलाव इसके नेटवर्किंग सिस्टम में किया गया है. जैसे इंडियन एयरफोर्स के सुखोई Su-30MKI के रडार, सेंसर्स में अपग्रेड कर उसे Super Sukhoi जैसा बनाया गया है, कुछ-कुछ वैसा ही काम दसॉ ने भी राफेल के साथ किया है. इस विमान के नेटवर्किंग सिस्टम पर दसॉ ने जबरदस्त काम किया है.
कुछ अपग्रेड्स तो ऐसे हैं जिससे ये विमान अमेरिकन F-35 Lightning के बराबर खड़ा दिखता है. वैसे तो राफेल और F-35 वैसे तो जेनरेशन के मामले में अलग हैं और जंग में इनका सामना कभी नहीं हुआ. लेकिन Trident Atlantic 25 नामक एक वॉर गेम में सबको हैरान करते हुए राफेल ने F-35 को अपनी मिसाइल से लॉक कर लिया.
डेटा फ्यूजन सिस्टम: भविष्य की कुंजी
F4 वेरिएंट 'Data Fusion' नाम के एक सिस्टम के साथ आता है और यही F4 वेरिएंट की सबसे बड़ी खासियत है. Data Fusion सिस्टम एक फुली ऑटोमैटिक सिस्टम होता है जो कई सेंसर्स और रडार्स से आने वाली जानकारी को एक साथ कैलकुलेट कर पायलट को जंग के मैदान, संभावित खतरे, खतरे का प्रकार जैसी चीजों की जानकारी एक साथ देता है.
इससे पायलट पर उड़ान के दौरान मानसिक दबाव कम होता है और जंग के दौरान वो बेहतर फैसले ले पाता है. राफेल के लिए इस सिस्टम को डिजाइन करने का काम Thales नाम की एक कंपनी करती है. इन सिस्टम्स को जेट का दिमाग कहा जाता है.
विमान खुद बता देगा, मुझे सर्विस चाहिए
आजकल की कारें बड़ी उन्नत हो गई हैं. सर्विसिंग से काफी पहले उनमें वार्निंग आने लगती है कि गाड़ी का ऑयल आदि चेंज करने की जरूरत है. इसी तरह फाइटर जेट्स के बेड़े को मेंटेन करने के लिए उनके प्रॉपर रखरखाव की जरूरत होती है. इंजन से लेकर हर सिस्टम का सही से काम करना जरूरी है. नहीं तो न सिर्फ पायलट बल्कि प्लेन को भी खतरा हो सकता है. नए राफेल में एक सिस्टम है जो किसी संभावित गड़बड़ी को पहले ही भांप लेता है. यानी अगर इंजन के किसी हिस्से में डैमेज हो रहा है तो ये विमान समय रहते उसका पता लगा कर वार्निंग दे देगा. लिहाजा विमान आगे किसी भी डैमेज से बच कर पहले ही रिपेयर कर दिया जाएगा.
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