कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने जिस मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, वह मांग पूरी हो गई है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे ही दिया. और शाम होते-होते CJP ने प्रदर्शन वापस ले लिया. अब जंतर-मंतर खाली हो चुका है.
जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह प्रदर्शन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल चुका था. 14 साल में यह सबसे बड़ा प्रदर्शन था. आखिरी बार 2012 में निर्भया कांड के समय पूरे देश में इस तरह का विरोध प्रदर्शन देखने को मिला था.
CJP का यह प्रदर्शन इसलिए कामयाब रहा, क्योंकि उन्होंने जिन मांगों को लेकर प्रदर्शन शुरू किया था, वे सब मान ली गईं. लेकिन सवाल उठता है कि किसी कामयाब प्रदर्शन को कामयाब क्या बनाता है? क्या है वह फैक्टर जिससे कोई विरोध प्रदर्शन सफल होता है?
किसी भी प्रदर्शन के कामयाब होने में दो फैक्टर मायने रखते हैं. पहला- उसका शांतिपूर्ण होना. हिंसक प्रदर्शन की तुलना में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के सफल होने की संभावना दोगुनी होती है. और दूसरा- प्रदर्शन में 3.5% आबादी का शामिल होना. जिन आंदोलनों में आबादी का कम से कम 3.5% हिस्सा शामिल होता है, वे बदलाव लाने में कभी फेल नहीं हुए हैं.
क्या ऐसा होता है?
22 फरवरी 1986 को फिलीपींस के मनीला में लाखों लोग जुटे. शांतिपूर्ण तरीके से मार्च निकाला. ये विरोध प्रदर्शन तत्कालीन राष्ट्रपति फर्डिनांद मार्कोस को हटाने के लिए था. मार्कोट दो दशकों से फिलीपींस की सत्ता में थे. इस प्रदर्शन को तीसरे ही दिन 25 फरवरी को मार्कोस को इस्तीफा देना पड़ा.
फिलीपींस का ये प्रदर्शन सबसे शांतिपूर्ण तरीके से हुआ प्रदर्शन था, जिसने मात्र तीन दिन में ही सरकार को गिरा दिया.
2011 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एरिका चेनोवेथ और मारिया स्टीफन 1900 से 2006 तक दुनियाभर में हुए 323 आंदोलनों का एनालिसिस किया था. बाद में उन्होंने अपनी किताब 'Why Civil Resistance Works The Strategic Logic of Nonviolent Conflict' भी लिखी थी. आंदोलनों के एनालिसिस में इन्होंने पाया था कि जो 53% आंदोलन जो सफल हुए, वे अंहिसक और शांतिपूर्ण थे. जबकि सिर्फ 26% हिंसक आंदोलन ही सफल हो पाए थे. यानी जो आंदोलन अहिंसक और शांतिपूर्ण होते हैं, उनके कामयाब होने की संभावना हिंसक आंदोलनों की तुलना में दोगुनी होती है.
किताब में उन्होंने बताया था कि अहिंसक और शांतिपूर्ण आंदोलन इसलिए ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया का साथ मिलता है. अगर सरकार ऐसे आंदोलनों को कुचलने की कोशिश करती है तो ये उस पर ही बैकफायर कर सकता है. इसलिए शांतिपूर्ण आंदोलन ज्यादा सफल होते हैं.
इसके अलावा, अहिंसक और शांतिपूर्ण आंदोलनों से लोग ज्यादा जुड़ते हैं. एरिका और मारिया ने जिन आंदोलनों का एनालिसिस किया था, उनमें अहिंसक आंदोलनों में औसतन 2 लाख लोग शामिल हुए, जबकि हिंसक आंदोलनों में 50 हजार की भीड़ जुटी. उदाहरण के लिए, फिलीपींस में मार्कोस सरकार के खिलाफ 'पीपल पावर' आंदोलन में 20 लाख लोग शामिल हुए थे.
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'3.5% Rule' का सीक्रेट
एरिका और मारिया ने '3.5% Rule' दिया था. इसका मतलब हुआ कि अगर किसी आंदोलन में उस देश की कम से कम 3.5% आबादी शामिल हो जाती है, तो उसके सफल होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है.
2021 में एरिका ने कहा था. '3.5% Rule का मतलब है कि जब किसी आबादी का 3.5% हिस्सा किसी बड़ी घटना, जैसे-लड़ाई, आंदोलन या विरोध प्रदर्शन में शामिल हो जाता है तो कोई भी क्रांति नाकाम नहीं होती.'
'3.5% Rule' के बारे में उन्होंने कहा था, 'भले ही 3.5% एक छोटा सा हिस्सा है लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों का शामिल होने का मतलब शायद यह है कि और भी बहुत से लोग बिना कहे ही आंदोलन के मकसद से सहमत हैं.'
हालांकि, उनका यह भी कहना है कि '3.5% Rule' कोई सफलता की गारंटी नहीं है. उनका कहना था, '3.5% का नियम ज्यादातर मामलों में उपयोग साबित हो सकता है. हालांकि, किसी भी आंदोलन की कामयाबी के लिए मोमेंटम, संगठन और नेतृत्व जैसे फैक्टर भी जरूरी होती है और 3.5% आबादी का साथ पाने से पहले ये फैक्टर जरूरी हैं.'
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कैसे काम करता है '3.5% Rule'?
भले ही '3.5% Rule' किसी भी आंदोलन के सफल होने की गारंटी न हो, लेकिन यह किसी आंदोलन को सफल बनाने में सबसे उपयोगी फैक्टर है.
ऐसा इसलिए क्योंकि जिन आंदोलन में 3.5% आबादी शामिल हो जाती है, उनका असर 3.5% लोगों से कहीं ज्यादा लोगों पर पड़ता है. इन 3.5% लोगों को जनता की सहानुभूति और समर्थन मिल जाता है.
जब ज्यादा लोग बदलाव की मांग करते हैं तो सिस्टम के भीतर लोगों में भी बदलाव आने लगता है, क्योंकि उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है कि अब बदलाव होकर रहेगा. एरिका चेनोवेथ इसे 'वफादारी बदलना' कहती हैं.
3.5% का नियम असल में किसी झरने की तरह काम करता है और यह लहर तब तक बढ़ती जाती है, जब तक कि बदलाव नहीं हो जाता और मांगें पूरी नहीं हो जातीं.
इससे बदलाव क्यों आता है?
इसके तीन बड़े कारण हैं. पहला- इतने लोगों का समर्थन आने से व्यवधान यानी रुकावटें आनी शुरू हो जाती हैं. दूसरा- आंदोलनकारियों को जनता का समर्थन मिलने लगता है. और तीसरा- सत्ता और सिस्टम से जुड़े लोगों की वफादारी भी बदलने लगती है.
हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि जब किसी आंदोलन में 3.5% आबादी जुटे, तभी वह सफल होगा. एरिका चेनोवेथ और मारिया स्टीफन की रिसर्च यह भी बताती है कि सफल होने वाले 83% अहिंसक आंदोलनों में '3.5% Rule' लागू नहीं हुआ था. और '3.5% Rule' सफलता की 'गारंटी' भी नहीं है, क्योंकि 2011 से 2014 के बीच बहरीन के राजा हमद के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में 6% से ज्यादा आबादी शामिल थी लेकिन फिर भी यह आंदोलन फेल हो गया था.
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