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भारत के शहरों में आफत बन रही बारिश, इन देशों ने कैसे एक-एक बूंद बचाकर बनाया समंदर

एक उदाहरण देते हुए प्रोफेसर बीडब्ल्यू पांडेय कहते हैं कि बारिश के पानी को उसके स्रोत पर ही नियंत्रित करने से संसाधनों की कमी और आपदा से निपटने में मदद मिलती है. उदाहरण के लिए, अगर ढलान वाले इलाके में बारिश के पानी को कंटूर (ढलान के साथ बनी रेखाओं) पर नियंत्रित किया जाए, तो अचानक आने वाली बाढ़ को रोका जा सकता है.

भारत के शहरों में आफत बन रही बारिश, इन देशों ने कैसे एक-एक बूंद बचाकर बनाया समंदर
भारत तेजी से वर्षा जल संचयन पर काम कर रहा है. (फोटो क्रेडिट-PTI)
  • भारत में वर्षा जल संचयन प्राचीन काल से चला आ रहा है और यह बाढ़ नियंत्रण में मदद करता रहा है
  • तेजी से हो रहा शहरीकरण पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों को खत्म कर रहा है जिससे जल संकट की समस्याएं बढ़ रही हैं
  • स्थानीय जल विज्ञान और भू-विज्ञान को ध्यान में रखकर वर्षा जल संचयन के आधुनिक मॉडल अपनाने की आवश्यकता है

भारत में अभी मॉनसून का मौसम चल रहा है. हर साल, बारिश के मौसम में सड़कों पर पानी भरने, बुनियादी ढांचे के डूबने और ट्रैफिक जाम की तस्वीरें देखने को मिलती हैं, और कुछ इलाकों में तो अचानक बाढ़ भी आ जाती है. जब देश भर के शहर पानी की समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो एक बड़ा सवाल यह उठता है: भारत अपने बारिश के पानी का क्या करता है?

बचपन में हम सभी ने किताबों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग (बारिश के पानी को इकट्ठा करने) के बारे में पढ़ा है. लेकिन, आज की आधुनिक और ज्यादा व्यावहारिक दुनिया में असल में ऐसा कितना हो रहा है, यह एक सवाल है. नीति आयोग के अनुसार, भारत में दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन वैश्विक मीठे पानी के संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा ही भारत के पास है. बढ़ती आबादी के साथ, 'जल शक्ति अभियान' जैसे प्रोजेक्ट बारिश के पानी को इकट्ठा करने की दिशा में काम तो कर रहे हैं, लेकिन हमेशा की तरह, अभी भी और बहुत कुछ करने की गुंजाइश है.

प्राचीन भारत में क्या होता था

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा जल संचयन न केवल एक वैज्ञानिक अवधारणा है, बल्कि इसका भारत से ऐतिहासिक संबंध भी रहा है. इस प्रक्रिया को अपना प्रचलित नाम और पहचान मिलने से बहुत पहले ही, प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक अभिलेखों में वर्षा जल संचयन का उल्लेख मिलता है. भारतीय इतिहास में गहराई से रचे-बसे वर्षा जल संचयन तंत्रों को न केवल पानी जमा करने के लिए, बल्कि हाइड्रोलिक बफर के रूप में काम करने और बाढ़ के असर को कम करने के लिए भी बनाया गया था.

  • IIT बॉम्बे के प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश इस विचार को समझाते हुए कहते हैं: "पानी के संसाधन जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी हैं. भारत में बारिश का पानी जमा करना (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) कोई नई बात नहीं है—यह हमारी सभ्यता जितनी ही पुरानी है. पारंपरिक तौर पर, बारिश का पानी जमा करने के तरीकों को न सिर्फ पानी इकट्ठा करने के लिए, बल्कि बाढ़ को कम करने के लिए भी एक टिकाऊ जल संसाधन के रूप में बनाया, लागू और बनाए रखा गया है. इसका एक बेहतरीन उदाहरण मंदिरों के पास बने पारंपरिक तालाबों का नेटवर्क है. अलग-अलग जलाशयों के बजाय, पुराने सिस्टम में तालाबों की एक आपस में जुड़ी हुई चेन का इस्तेमाल किया जाता था ताकि प्राकृतिक रूप से 'स्पंज सिटी' बनाई जा सकें."
  • एक उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, "मंदिर के तालाबों की वह श्रृंखला शहर को 'स्पंज सिटी' बनाती है. तमिलनाडु में चिदंबरम मंदिर के तालाब इसका एक अच्छा उदाहरण हैं; तमिलनाडु के कांचीपुरम में मंदिरों और उनसे जुड़े तालाबों की संख्या इसका एक और उदाहरण है. एक तालाब का अतिरिक्त पानी दूसरे तालाब में चला जाता है, जिससे बाढ़ के पानी की बर्बादी नहीं होती."
  • प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश आगे बताते हैं कि जीवन बचाने वाली ये संरचनाएं उस इलाके की स्थानीय संस्कृति में रची-बसी सामुदायिक भागीदारी से बनी हुई थीं: "ये संरचनाएं वैदिक जल-विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) की गहरी समझ, स्थानीय भू-विज्ञान की बेहतर जानकारी, बेहतरीन कारीगरी, वास्तुशिल्प और आध्यात्मिक 'फ्लोट फेस्टिवल' (पानी पर होने वाले उत्सव) के नाम पर सामूहिक प्रबंधन के जरिए रखरखाव के आधार पर बनाई गई थीं."

आधुनिकीकरण और शहरी समस्याएं

तेजी से हो रहे शहरीकरण ने इन प्राकृतिक नेटवर्क को खत्म कर दिया है. अक्सर पारंपरिक जल-संग्रहण क्षेत्रों के ऊपर कंक्रीट के निर्माण कर दिए जाते हैं, जिससे मौसमी बारिश बड़ी समस्या बन जाती है. प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश बताते हैं कि शहरीकरण के नाम पर जल-स्रोतों को नष्ट किया गया है. जब भारी बारिश होती है, तो पानी हमेशा सबसे निचले हिस्से की ओर बहता है. पहले अगर वहां कोई तालाब होता था, तो पानी जमा हो जाता था, जमीन के नीचे जाकर जल-स्तर को रिचार्ज करता था और बाढ़ के खतरे को कम करता था. लेकिन अब हमने वहां निर्माण कार्य कर दिए हैं, इसलिए हम बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं—यानी हम इंसानों द्वारा बनाई गई बाढ़ का सामना कर रहे हैं.

पारंपरिक प्रणालियों से हटकर हो रहे बदलाव पर टिप्पणी करते हुए प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश कहते हैं, "हम वैदिक जल-विज्ञान (hydrology) को भूल गए हैं और सिर्फ बारिश के पैटर्न के आधार पर डिजाइन बना रहे हैं. बड़े पैमाने पर बनने वाले बांधों और जलाशयों के लिए तो शायद ऐसे विश्लेषण जरूरी हों, लेकिन साधारण वर्षा-जल संचयन और 'स्पंज सिटी' के लिए हमें स्थानीय जल-विज्ञान, स्थानीय भू-विज्ञान (geology) और साथ ही स्थानीय जमीन के इस्तेमाल और जमीन पर मौजूद चीजों (land cover) को भी ध्यान में रखना चाहिए."

स्थानीय स्तर पर वर्षा-जल संचयन

  • भारत की भौगोलिक विविधता को देखते हुए, स्थानीय स्तर पर बारिश का पानी जमा करने (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) की जरूरत साफ दिखती है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज' के डायरेक्टर प्रोफेसर बीडब्ल्यू पांडेय एक अजीब स्थिति की ओर इशारा करते हैं. वो बताते हैं कि ज्यादा बारिश वाले इलाकों में भी पानी की कमी होती है क्योंकि वहां पानी जमा करने की जगहें (कैचमेंट) नहीं होतीं. वे कहते हैं, "भारत सरकार ने रेनवाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी कर दिया है क्योंकि हमारे पास पानी के संसाधन, खासकर साफ पानी, कम पड़ रहे हैं. चेरापूंजी में दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश होती है, लेकिन वहां भी पानी का संकट है क्योंकि पानी की हर बूंद तुरंत बह जाती है.
  • इससे निपटने के लिए, ढलान वाले इलाकों में पानी रोकने के स्थानीय प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं. प्रोफेसर पांडेय बताते हैं, "उत्तराखंड सरकार ने 'चाल-खाल' प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसमें वे पानी को उसके स्रोत पर ही रोकते हैं और साफ पानी का अपना भंडार बनाते हैं. हिमालय में ऐसी कई कामयाब कहानियां हैं जहां रेनवाटर हार्वेस्टिंग की वजह से सूखी घाटियों में फिर से हरियाली लौट रही है."
  • सूखे इलाकों में भी, सही ऐतिहासिक इंजीनियरिंग से पानी की कमी को रोका जा सकता है. प्रोफेसर पांडेय उदयपुर को एक मिसाल के तौर पर बताते हैं. बताते हैं कि सबसे अच्छा उदाहरण उदयपुर है. वहां झीलों को आपस में जोड़कर बारिश के पानी का मैनेजमेंट किया जाता है. राजस्थान जैसे सूखे राज्य और सूखे इलाके में होने के बावजूद, उदयपुर में कभी पानी का संकट नहीं होता. क्योंकि वहां सभी झीलें बहुत अच्छे तरीके से आपस में जुड़ी हुई हैं और पानी का मैनेजमेंट करती हैं. हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि भले ही भारत पानी की हर बूंद को बचाने और इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रहा हो, फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

दुनिया पानी का मैनेजमेंट कैसे करती है

जहां भारत अपने पानी के मैनेजमेंट पर काम कर रहा है, वहीं जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण जैसी समस्याओं का सामना कर रहे दूसरे देशों ने अपने सिस्टम को बहुत बेहतर बना लिया है और वे अपनी जमीन पर गिरने वाली पानी की हर बूंद का इस्तेमाल करते हैं. इजरायल पानी के मैनेजमेंट में दुनिया भर में एक लीडर के तौर पर उभरा है. वह पानी को सिर्फ एक जरूरत की चीज नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संपत्ति मानता है जिसकी हिफाजत की जानी चाहिए. इजरायल पानी को जमीन से बहकर बेकार जाने देने के बजाय उसे इकट्ठा करता है, साफ करता है और जमीन के नीचे खाली हो चुके जल-भंडारों में वापस भेज देता है. इससे पानी का स्तर तेजी से गिरने की समस्या हल हो जाती है, जिसका सामना भारत के कई शहरों, जिनमें बड़े शहर भी शामिल हैं, को करना पड़ता है. इसके अलावा, यह देश बड़े पैमाने पर समुदाय-आधारित वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) प्रोजेक्ट्स पर भी निर्भर है, जिनमें पानी इकट्ठा करने के लिए कम्युनिटी सेंटर्स और सार्वजनिक इमारतों का इस्तेमाल किया जाता है. इससे देश की पानी से जुड़ी अन्य जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है.

चीन में क्या होता है

चीन एक और ऐसा देश है, जिससे प्रेरणा ली जा सकती है. चीन ने भारी बाढ़ और पानी की कमी, दोनों से निपटने के लिए अपने कई बड़े शहरों में "स्पंज सिटी" के आधुनिक कॉन्सेप्ट को सफलतापूर्वक लागू किया है. बारिश के पानी को जल्द से जल्द हटाने के लिए सिर्फ पाइप, नालियों और कंक्रीट के चैनलों पर निर्भर रहने के बजाय, चीन ठोस सतहों की जगह प्रकृति-आधारित समाधान अपनाता है. शहरी योजनाकार पारगम्य डामर (permeable asphalt), बायोस्वेल्स, रेन गार्डन और बड़े शहरी वेटलैंड्स बनाने का सुझाव देते हैं. इसका मुख्य विचार पानी को नाली के आखिर में बड़ी कंक्रीट की दीवारों और जलाशयों से रोकने के बजाय, उसके स्रोत पर ही फैलाना, उसकी गति धीमी करना और उसे वहीं रोककर रखना है.

सिंगापुर कैसे करता है

सिंगापुर एक और देश है जो शहरी बारिश के पानी के मैनेजमेंट के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' (बेहतरीन उदाहरण) पेश करता है. यह देश "फोर नेशनल टैप्स" (चार राष्ट्रीय स्रोत) फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करता है, जिससे जमीन की कमी वाले इस द्वीप को पानी के मामले में आत्मनिर्भर मॉडल में बदल दिया गया है. इस शहर-देश ने अपना लेआउट इस तरह से बनाया है कि इसकी कुल जमीन का दो-तिहाई हिस्सा एक बड़े वॉटर कैचमेंट एरिया (पानी इकट्ठा करने वाले क्षेत्र) की तरह काम करता है. ऊंची इमारतों, सड़कों और रिहायशी इलाकों में गिरने वाली बारिश के पानी को नालियों और नहरों के एक सटीक नेटवर्क के जरिए इकट्ठा किया जाता है और शहर में तबाही मचाने के बजाय उसे शहरी जलाशयों तक पहुंचाया जाता है. सबसे अहम बात यह है कि सिंगापुर अपने स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज नेटवर्क (बारिश का पानी निकालने वाले सिस्टम) और इस्तेमाल हो चुके पानी के सीवेज नेटवर्क के बीच शहर-भर में सख्ती से अलगाव बनाए रखता है.

भारत को कैसे आगे बढ़ना चाहिए

  • जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए भारत में बारिश के पानी को इकट्ठा करना (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) सिर्फ एक सुझाव नहीं, बल्कि एक सक्रिय प्रोजेक्ट होना चाहिए. एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता और आम लोगों की आदत बनाया जाए. प्रोफेसर बीडब्ल्यू पांडेय जरूरी कार्रवाई के पैमाने पर डोर देते हुए कहते हैं कि बारिश के पानी को इकट्ठा करना राष्ट्रीय एजेंडा, हर गली का एजेंडा और देश के आम लोगों का साझा एजेंडा होना चाहिए.
  • एक उदाहरण देते हुए प्रोफेसर बीडब्ल्यू पांडेय कहते हैं कि बारिश के पानी को उसके स्रोत पर ही नियंत्रित करने से संसाधनों की कमी और आपदा से निपटने में मदद मिलती है. उदाहरण के लिए, अगर ढलान वाले इलाके में बारिश के पानी को कंटूर (ढलान के साथ बनी रेखाओं) पर नियंत्रित किया जाए, तो अचानक आने वाली बाढ़ को रोका जा सकता है. इससे निचले इलाकों में बाढ़ को भी रोका जा सकता है. इसलिए, यह न केवल बारिश के पानी को बचाने का तरीका है, बल्कि आपदा प्रबंधन में भी राहत देता है. आधुनिक जल बुनियादी ढांचे में एक बड़ी समस्या न केवल ऐसे सिस्टम को अपनाने की है, बल्कि उनके लंबे समय तक रखरखाव की कमी की भी है. 
  • प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश समुदाय से आगे बढ़कर काम करने और प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी लेने का आह्वान करते हैं. बताते हैं कि सरकार तालाब बनाती है और चली जाती है. लेकिन उसका रखरखाव कौन करेगा? भागीदारी वाले प्रबंधन पर एक नीति होनी चाहिए... समुदाय की भागीदारी RWH (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) में सबसे जरूरी तत्व है.

जमीनी स्तर पर लागू करने का तरीका

इसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए, प्रोफेसर ज्योतिप्रकाश ने एक ऐसा तरीका बताया है जिसमें स्थानीय संस्थाएं, कॉलेज और कंपनियां पहले से मौजूद पारंपरिक जल संरचनाओं को अपना सकती हैं. वो बताते कि इलाके का हर कॉलेज, हर शिक्षण संस्थान, हर कंपनी और हर उद्योग पहले से मौजूद पारंपरिक जल संचयन संरचनाओं और अन्य जल स्रोतों की पहचान कर सकता है और उनके रखरखाव की जिम्मेदारी ले सकता है. वे इनकी सफाई कर सकते हैं और बारिश के पानी को मंदिर के तालाबों, बावड़ियों, गांव के तालाबों जैसे पारंपरिक जल स्रोतों की ओर मोड़ सकते हैं, ताकि RWH (वर्षा जल संचयन) का टिकाऊ प्रबंधन हो सके.

दूसरे देशों के उदाहरणों को देखें तो भारत के लिए साफ संदेश है. आधुनिक जल सुरक्षा के लिए पानी के साथ मिलकर काम करना जरूरी है, न कि उससे लड़ना. इसलिए, किसी भी समाधान में पानी की हर बूंद को सिस्टम में शामिल करने पर जोर होना चाहिए, न कि उसे ऐसे स्रोतों में बहा देने पर जहां से वह वापस जल चक्र में न आ सके. चाहे इजरायल की तरह सटीक माइक्रो-मैनेजमेंट हो या चीन की तरह बड़े पैमाने पर स्पंज इंफ्रास्ट्रक्चर, भारत के लिए आगे बढ़ने का रास्ता एक ऐसे सिस्टम पर निर्भर करता है जो आधुनिक इंजीनियरिंग और सामुदायिक प्रयासों को प्राचीन भारतीय जल विज्ञान के साथ मिलाता हो.

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