केंद्र सरकार तीन राज्यों में पश्चिमी घाट के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसए) को अधिसूतित करने की तैयारी में है. ये राज्य हैं- गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात. इन राज्यों में ईएसए की सीमा को लेकर आमतौर पर सहमति बन चुकी है. इन राज्यों में पश्चिमी घाट में ईएसए नोटिफाई होने के बाद उन इलाकों में नई खनन और पत्थर खदान परियोजनाएं, थर्मल पॉवर प्लांट खोलने, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग चलाने और 20 हजार वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले कारखानों के निर्माण या विस्तार पर पूरी तरह से पाबंदी लग जाएगी. सरकार केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में इस तरह की आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है. अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद पश्चिमी घाट को 1986 के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी. इससे वहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकेगी.
यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल
पश्चिमी घाट दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण जैव-विविधता (बायोडायवर्सिटी) क्षेत्रों में से एक है. यहां सैकड़ों दुर्लभ पौधे और जीव पाए जाते हैं. इसी कारण यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है. पश्चिमी घाट का वन क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र मानसून को प्रभावित करता है. यहां से कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, मांडवी, पेरियार और शरावती जैसी कई महत्वपूर्ण नदियां निकलती हैं.
गाडगिल समिति और कंस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशें क्या थीं
सरकार ने 2010 में पारिस्थितिकी वैज्ञानिक माधव गाडगिल की अध्यक्षता में 'पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल' का गठन किया गया था. इसका उद्देश्य छह राज्यों में फैले पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र का आकलन कर उसके संरक्षण और सतत विकास के लिए उपाय सुझाना था. इस समिति ने 31 अगस्त 2011 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. समिति ने पूरे पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखला के एक लाख 29 हजार 37 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित (ईएसए) करने की सिफारिश की थी. सरकार ने गाडगिल समिति की सिफारिशों को बहुत कठोर माना था. राज्यों के विरोध के बाद सरकार ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना था. कस्तूरीरंगन समिति ने 2013 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि पश्चिमी घाट के कुल 37 फीसदी हिस्से को पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (Eco Sensitive Area) के रूप में अधिसूचित कर वहां खनन और बड़े उद्योगों पर पाबंदी लगाई जाए. इस समिति ने छह राज्यों में फैले पश्चिमी घाट के 60 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाके को ईएसए घोषित करने की सिफारिश की थी.
कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों पर अमल करते हुए केंद्र सरकार ने पहली मसविदा अधिसूचना 2014 में जारी की. उसके बाद से 2024 तक उसमें पांच बार बदलाव किए गए. 31 जुलाई 2024 को जारी सबसे नए मसविदा अधिसूचना में कुल 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसए घोषित करने का प्रस्ताव था. यह समिति द्वारा सुझाए गए करीब 60 हजार वर्ग किलोमीटर से कम है. सबसे अधिक कटौती केरल के इलाके में की गई, क्योंकि केरल सरकार लगातार क्षेत्र कम करने की मांग करती रही है. इसके बाद भी राज्यों के साथ ईएसए की सीमाओं को लेकर आम सहमति नहीं बन पाई. केरल और कर्नाटक आज भी इस मुद्दे पर सहमत नहीं हैं. केरल अपने हिस्से के ईएसए में कमी लाने की मांग कर रहा है तो कर्नाटक पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल उठा रहा है.
किन किन राज्यों में बन चुकी है सहमति
खबरों के मुताबिक गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र में ईएसए की सीमाओं पर सहमति करीब-करीब बन चुकी है. इससे प्रभावित होने वाला छठा राज्य तमिलनाडु है. उसके 6,914 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसए घोषित किया जाना है. यह केरल और कर्नाटक की तुलना में कम है. सरकार अभी केरल और कर्नाटक के साथ बातचीत कर रही है. सरकार उन राज्यों में ईएसए की अधिसूचना जारी करने की तैयारी में है जिनमें सहमति बन चुकी है या अंतिम चरण में है. यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतिम मसविदा अधिसूचना की वैधता 27 जुलाई 2026 तक ही है. वहीं राज्यों के साथ बातचीत कर रही विशेषज्ञ समिति का कार्यकाल भी इस साल जुलाई में खत्म होने वाला है.
केंद्र सरकार ने नवंबर 2013 में कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट के आधार पर सभी तरह के खनन, थर्मल बिजली घर, बड़े निर्माण कार्य, टाउनशिप और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर रोक लगा दी थी. सरकार की ओर से अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद पश्चिमी घाट को 1986 के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी.
गुजरात के 64 गांवों के करीब 470 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ईएसए घोषित किया जा सकता है. लेकिन उसकी मांग है कि ईएसए के गैर-वन क्षेत्र में छोटे खनिजों के खनन पर रोक न लगाई जाए और पहले से चल रहे निर्माण कार्य भी प्रभावित न होने पाएं. वहीं महाराष्ट्र के करीब 17 हजार 340 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसए घोषित करने का प्रस्ताव है. यह दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र होगा. हालांकि महाराष्ट्र सरकार इससे प्रभावित 2,515 गांवों में से 378 गांवों को ईएसए से बाहर रखने की मांग की है. वहीं गोवा सरकार की मांग है कि सत्तारी तालुका के 21 गांवों को ईएसए की सूची से बाहर रखा जाए.
कौन सा राज्य सबसे अधिक प्रभावित होगा
इससे सबसे अधिक प्रभावित कर्नाटक होगा. उसका करीब 20,668 वर्ग किलोमीटर इलाका ईएसए में आएगा. यह कुल ईएसए का करीब 36.3 फीसदी है. लेकिन वह इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है. इस पर केंद्र सरकार ने कहा है कि वह कोई वैकल्पिक प्रस्ताव दे. वहीं केरल 2024 के मसविदे में प्रस्तावित नौ हजार 993.7 वर्ग किलोमीटर की जगह केवल आठ हजार 805 वर्ग किलोमीटर इलाके को ही ईएसए घोषित करना चाहता है. उसने इडुक्की और वायनाड जिले के 31 गांवों को इससे बाहर रखने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन विशेषज्ञ समिति उसकी दलीलों से सहमत नहीं है. वहीं ईएसए में आने वाले छठे राज्य तमिलनाडु का छह हजार 914 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसए घोषित किया जाना है.
इन छह राज्यों में से महाराष्ट्र, गोवा और गुजरात ईएसए को लेकर आमतौर पर सहमत हैं. ये वो राज्य हैं, जिनमें बीजेपी की सरकार है. वहीं ईएसए पर आपत्तियां जताने वाले राज्य कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में गैर बीजेपी दलों की सरकार थी. ऐसे में राजनीतिक कारणों और विकास परियोजनाओं पर संभावित प्रतिबंधों के चलते ईएसए की सीमा तय करना कठिन साबित हुआ. यह कारण है कि केंद्र सरकार को छह बार मसविदे की अधिसूचना जारी करनी पड़ी.
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