- PM मोदी ने पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को एक भावुक पत्र लिखा, जिसमें मां काली और रामलला का उल्लेख किया गया.
- पत्र में मोदी ने चुनाव प्रचार को तीर्थ यात्रा बताया और मां काली से मिलने वाली ऊर्जा का अनुभव साझा किया.
- मोदी ने युवाओं, महिलाओं, किसानों और श्रमिकों को विकसित बंगाल के स्वप्न से जोड़ा और सुरक्षा का आश्वासन दिया.
पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के मतदान के लिए प्रचार समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के मतदाताओं के नाम एक भावुक पत्र लिखा है. बांग्ला और हिन्दी- दोनों भाषाओं में लिखे गए इस पत्र का ऑडियो संदेश भी PM मोदी की आवाज में जारी किया गया है. अपने पत्र में पीएम मोदी ने लिखा है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें थकान नहीं, बल्कि निरंतर ऊर्जा का अनुभव हुआ और संभवतः मां काली उन्हें नई शक्ति प्रदान कर रही थीं. उन्होंने अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा और उससे पहले किए गए 11 दिनों के अनुष्ठान का भी उल्लेख किया. PM ने लिखा कि इस चुनाव के दौरान उन्हें वही अनुभूति हुई, जैसी किसी देवी मंदिर में दर्शन करते समय होती है.
PM मोदी के इस पत्र में मां काली और रामलला का उल्लेख अनायास नहीं है. दरअसल, तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से BJP पर यह सवाल उठाती रही है कि वह पश्चिम बंगाल में 'जय श्री राम' का नारा क्यों लगाती है, जबकि यह राज्य परंपरागत रूप से मां काली की उपासना से जुड़ा हुआ है. पिछले चुनावों के दौरान जय श्री राम के नारे को लेकर CM ममता बनर्जी कई बार नाराजगी भी जता चुकी हैं, जिसे बीजेपी ने बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की थी.

राम मंदिर का मुद्दा पश्चिम बंगाल में उस तरह प्रभावी नहीं
तृणमूल कांग्रेस और उसके समर्थकों की ओर से यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि बीजेपी राज्य की सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों से कटी हुई पार्टी है, क्योंकि अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा पश्चिम बंगाल में उस तरह प्रभावी नहीं माना जाता, जैसा उत्तर भारत के राज्यों में. भाजपा के जय श्री राम के नारों और राम नवमी के जुलूसों के जवाब में तृणमूल कांग्रेस ने 'जय मां काली' के नारे और दुर्गा पूजा जैसे सांस्कृतिक उत्सवों पर जोर देना शुरू किया. बाद के चरण में भाजपा ने भी मां काली का जयकारा लगाना शुरू किया और इसे महिला सशक्तिकरण से जोड़ कर प्रस्तुत किया.
इसी पृष्ठभूमि में PM मोदी द्वारा पश्चिम बंगाल की जनता को लिखा गया यह पत्र केवल एक चुनावी संदेश नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श में 'आध्यात्मिक राष्ट्रवाद' और 'सांस्कृतिक जुड़ाव' के एक नए अध्याय की तरह देखा जा रहा है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में दिया गया उनका चर्चित कथन- 'मां गंगा ने मुझे बुलाया है.'- उत्तर भारत में भावनात्मक असर छोड़ गया था. अब वही भाव बंगाल में मां काली मुझे ऊर्जा दे रही हैं के रूप में दिखाई दे रहा है.
পশ্চিমবঙ্গের পুরো নির্বাচনী প্রচার চলাকালীন আমি আমার পরিবারবর্গের কাছ থেকে যে অগাধ স্নেহ ও আশীর্বাদ পেয়েছি, তা আমাকে এক নতুন শক্তিতে ভরিয়ে দিয়েছে। এখানকার যুবশক্তি হোক বা নারীশক্তি, আমাদের কৃষক ভাই-বোন হোক, শ্রমিক বা ব্যবসায়ী, সকলেই ‘বিকশিত বাংলা' গড়ার জন্য সংকল্পবদ্ধ। এই… pic.twitter.com/Gki1Ochc2D
— Narendra Modi (@narendramodi) April 27, 2026
पिछले वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की बड़ी जीत के बाद BJP मुख्यालय में प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना- 'गंगा बिहार से बंगाल जाती है.', भी इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संकेत की ओर इशारा करता है. ऐसे में ‘मां गंगा' और ‘मां काली' के उल्लेख को केवल संयोग के रूप में नहीं देखा जा सकता.

चुनावी अभियान की तुलना एक ‘तीर्थ यात्रा'
प्रधानमंत्री के इस पत्र का मूल भाव ‘ऊर्जा' और ‘आस्था' का संगम है. उन्होंने चुनावी अभियान की तुलना एक ‘तीर्थ यात्रा' से की है. शक्ति उपासना और मां काली की भक्ति के लिए विश्वविख्यात बंगाल से आत्मिक जुड़ाव स्थापित करने के लिए प्रधानमंत्री ने इसी सांस्कृतिक सूत्र को आधार बनाया है. उन्होंने साफ लिखा है कि रैलियों और लगातार कार्यक्रमों की थकान के बावजूद जो ऊर्जा उन्हें महसूस हो रही है, वह मां काली का आशीर्वाद है. यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा कही जाने वाली ‘शाक्त परंपरा' से संवाद स्थापित करने का प्रयास भी है.
‘चुनाव तीर्थ यात्रा जैसे…मां काली निरंतर ऊर्जा भरती रहीं' बंगाल की जनता को पीएम मोदी की चिट्ठी
रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का उल्लेख
पत्र में जनवरी 2024 में अयोध्या में हुई रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का उल्लेख भी एक सोची-समझी राजनीतिक और आध्यात्मिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री ने 11 दिनों के उस कठिन अनुष्ठान को बंगाल में मिली अनुभूति से जोड़ते हुए यह संदेश दिया है कि उनके लिए सत्ता का मार्ग भक्ति और तपस्या से होकर गुजरता है. जब वे कहते हैं कि बंगाल में उन्हें वही अनुभूति हुई जो किसी देवी मंदिर में दर्शन के समय होती है, तो वे सीधे तौर पर बंगाल के मतदाताओं के भावनात्मक संसार में प्रवेश करते हैं.
पत्र का एक बड़ा हिस्सा वर्तमान बंगाल और उसके भविष्य के ‘संकल्प' पर केंद्रित है. प्रधानमंत्री ने युवाओं, महिलाओं, किसानों और श्रमिकों का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘विकसित बंगाल' के स्वप्न से जोड़ने की कोशिश की है. उन्होंने बंगाल की बेटियों के लिए ‘सुरक्षा' और ‘खुला आसमान' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. “भय बहुत हुआ, अब भरोसा चाहिए” जैसा वाक्य प्रदेश की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा की पृष्ठभूमि पर सीधा प्रहार करता है.
मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह का उल्लेख
रैलियों के दौरान मिले पत्रों, चित्रों और संदेशों को रात में तसल्ली से देखने और जवाब देने की बात कहकर प्रधानमंत्री ने स्वयं को एक ‘अभिभावक' के रूप में प्रस्तुत किया है, न कि केवल एक राजनेता के तौर पर. उन्होंने साफ कहा है कि बंगाल की सुरक्षा और सेवा करना उनका दायित्व है. पत्र में भाजपा के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह का उल्लेख भी किया गया है और लिखा गया है कि यह उत्सव सभी मिलकर मनाएंगे, जो राज्य में जीत को लेकर उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है.
2014 में “मां गंगा” से शुरू हुई यह यात्रा अब 2026 में “मां काली” के चरणों तक पहुंचती दिख रही है. यह यात्रा इस बात का संकेत है कि प्रधानमंत्री भारत के विभिन्न क्षेत्रों को उनकी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान के माध्यम से एक साझा राष्ट्रीय चेतना से जोड़ना चाहते हैं.

राजनीतिक अपील के साथ-साथ भावनात्मक संवाद भी
यह पत्र बंगाल के लोगों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि दिल्ली में बैठा नेतृत्व न केवल उनकी समस्याओं को समझता है, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपराओं और आराध्य देवों के प्रति उतनी ही श्रद्धा रखता है, जितनी एक सामान्य बंगाली रखता है. अंत में “वंदे मातरम्” और हस्ताक्षर के साथ समाप्त होने वाला यह पत्र एक राजनीतिक अपील के साथ-साथ भावनात्मक संवाद भी है, जिसका उद्देश्य बंगाल के मानस-पटल पर ‘परिवर्तन' की स्थायी छाप छोड़ना है. वंदे मातरम् की रचना के 150वें वर्ष में इसका उल्लेख करना भी एक प्रतीकात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है.
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