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BJP में क्षत्रपों का उभार, मोदी के एजेंडे को आगे बढ़ाते उनके सिपहसलार

बात हो रही है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और हाल ही में बिहार की कुर्सी पर काबिज हुए सम्राट चौधरी की. अपने-अपने राज्यों में पार्टी की ताकत बढ़ाने में लगे यह नेता क्षत्रप के खांचे में फिट बैठते हैं. लेकिन किसी जमाने में कांग्रेस में दबदबा रखने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों से इनकी तुलना नहीं की जा सकती. क्षेत्रीय क्षत्रप उन्हें कहा जा सकता है जो राज्यों में अपनी जबर्दस्त ताकत रखते हैं.

BJP में क्षत्रपों का उभार, मोदी के एजेंडे को आगे बढ़ाते उनके सिपहसलार
बंगाल चुनाव ने कई बीजेपी नेताओं को और बढ़ाया कद
NDTV
नई दिल्ली:

पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत और असम में हेट्रिक के साथ ही राजनीतिक गलियारों में बीजेपी के कुछ चेहरों पर चर्चा तेज हो गई है. असम में हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने चुनावी कौशल और व्यापक जनाधार का एक बार फिर सबूत पेश कर दिया है. वहीं पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने लगातार दूसरी बार ममता बनर्जी को हरा कर मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर दी है. इसी के साथ चर्चा उन चेहरों की भी होने लगी है जो राज्यों में ताकतवर तो हैं ही, पार्टी आलाकमान के साथ कदमताल कर मिशन 2029 के लिए जुटे हुए हैं.
 

कौन होते हैं ये क्षत्रप

बात हो रही है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और हाल ही में बिहार की कुर्सी पर काबिज हुए सम्राट चौधरी की. अपने-अपने राज्यों में पार्टी की ताकत बढ़ाने में लगे यह नेता क्षत्रप के खांचे में फिट बैठते हैं. लेकिन किसी जमाने में कांग्रेस में दबदबा रखने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों से इनकी तुलना नहीं की जा सकती. क्षेत्रीय क्षत्रप उन्हें कहा जा सकता है जो राज्यों में अपनी जबर्दस्त ताकत रखते हैं. जो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के समानांतर अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी करते हैं. कांग्रेस में इसकी लंबी परंपरा रही है. 1960 से 1990 के दशक तक इनका दबदबा रहा है. हालांकि इंदिरा गांधी के शक्तिशाली होने के बाद कांग्रेस में हाईकमांड संस्कृति का उदय हुआ और धीरे-धीरे क्षेत्रीय क्षत्रप आभाहीन होते गए.
 

भारतीय जनता पार्टी में भी क्षेत्रीय क्षत्रपों की एक लंबी परंपरा रही है. लेकिन उनकी भूमिका और शक्ति का स्वरूप कांग्रेस की तुलना में काफी अलग रहा है. 1990 और 2000 के दशक में बीजेपी में ऐसे कई नेता उभरे जिनका अपने राज्यों में एकछत्र राज था और जिनकी अपनी विशिष्ट कार्यशैली थी. ये नेता केवल 'हाईकमांड' के प्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि खुद बड़े जनाधार वाले नेता थे.


जैसे राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत. वे स्वयं वाजपेयी और आडवाणी के समकक्ष थे. इस लिहाज से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में उनका बड़ा कद था. उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन के समय हिंदू ह्रदय सम्राट के रूप में उभरे कल्याण सिंह बीजेपी के मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उभरे. वे पार्टी का एक बड़ा ओबीसी चेहरा थे. उनके केंद्रीय नेतृत्व से मतभेद हुए जिनके कारण उन्हें कुर्सी और पार्टी भी छोड़नी पड़ी. इसी फेहरिस्त में मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं उमा भारती और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया का नाम भी शामिल है जो कई मौकों पर केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती देती रहीं. लेकिन 2014 के बाद बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में एक बड़ा बदलाव आया है.

ब्रांड मोदी सबसे ऊपर 

अब पार्टी में 'ब्रांड मोदी' सबसे ऊपर है. पार्टी ने उनके चेहरे पर न केवल तीन लोक सभा चुनाव लगातार जीते हैं बल्कि कई राज्यों में बड़ी जीत भी हासिल की है. हाल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया. बल्कि यह कहा कि सभी 294 सीटों पर मोदी ही उम्मीदवार हैं.इसके बावजूद बीजेपी में क्षेत्रीय क्षत्रपों की उपस्थिति अब भी महत्वपूर्ण है.  हालांकि उनकी कार्यशैली बदल गई है. पिछले ग्यारह वर्षों में ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिला जब बीजेपी के राज्य के किसी नेता ने केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती दी हो. ऐसा होने के पीछे प्रमुख कारण केंद्रीय नेतृत्व का अतिशक्तिशाली होना भी है.

यही कारण है कि राज्यों के संबंध में बड़े फैसले करने में भी बीजेपी को कोई दिक्कत नहीं आई. जैसे मध्य प्रदेश में दो दशक तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को चुनाव जीतने के बावजूद केंद्र में लाकर मंत्री बना दिया गया. गुजरात में मुख्यमंत्री समेत सारी कैबिनेट बदल दी गई. उत्तराखंड में हार के बावजूद पुष्कर सिंह धामी को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरों को मुख्यमंत्री बना दिया गया.
 

दरअसल, बीजेपी का वैचारिक आधार और कैडर आधारित ढांचा किसी भी नेता को पार्टी से बड़ा होने से रोकता है. यहाँ नेता 'हाशिए' पर जाने के बजाय अक्सर 'संगठन' की नई भूमिकाओं में भेज दिए जाते हैं. साथ ही, ब्रांड मोदी की ताकत के कारण भी राज्यों के नेता उन पर निर्भर हैं. वर्तमान में राज्य स्तर के चुनाव भी प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़े जाते हैं, जिससे क्षेत्रीय नेताओं की 'स्वतंत्र शक्ति' थोड़ी कम हुई है. वे 'किंग' के बजाय 'वजीर' की भूमिका में अधिक नज़र आते हैं. पिछले एक दशक में राज्य में बीजेपी के कई ताकतवर नेता तैयार हुए हैं.

 सबसे सशक्त क्षेत्रीय क्षत्रप योगी हैं

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वर्तमान में सबसे सशक्त क्षेत्रीय क्षत्रप माने जाते हैं. उनका अपना संगठन (हिंदू युवा वाहिनी) रहा है और उनकी एक स्वतंत्र हिंदूवादी छवि है. यह छवि उन्हें अन्य मुख्यमंत्रियों से अलग और शक्तिशाली बनाती है. अगले साल फरवरी में वे हेट्रिक बनाने के लिए चुनाव मैदान में उतरेंगे. अगर वे इसमें कामयाब होते हैं तो पार्टी में उनकी ताकत और बढ़ जाएगी.दूसरे ताकतवर नेता महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस हैं. वे युवा हैं. पार्टी ने जातीय समीकरणों को दरकिनार कर उन्हें कमान सौंपी. महाराष्ट्र जैसे जटिल राजनीति वाले राज्य में दशकों से जमा दिग्गज नेताओं के बीच उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है.

विकसित राज्य की कमान संभाल कर उन्होंने संगठन के साथ ही प्रशासन के मोर्चे पर भी कई झंडे गाड़े हैं. 2029 लोक सभा चुनाव में राज्य में पार्टी की जीत सुनिश्चित करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रहेगी.असम में लगातार तीसरी बार चुनाव जीत कर हिमंत बिस्वा सरमा ने स्वयं को उत्तर-पूर्व में बीजेपी के सबसे बड़े रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया है. वे कांग्रेस से आए हैं और उन्होंने पूरे क्षेत्र में अपना दबदबा बनाया है. हिंदुत्व के मुद्दे पर वे बेहद आक्रामक हैं और इस कारण अक्सर सुर्खियों में भी रहते हैं.  

सम्राट चौधरी बड़े क्षत्रप के तौर पर उभरे

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी बीजेपी के एक बड़े क्षत्रप के रूप में उभरे हैं. वे इस महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी के पहले मुख्यमंत्री हैं. हालांकि अभी उन्हें खुद को साबित करना बाकी है क्योंकि उन्हें यह कुर्सी संभाले अधिक वक्त नहीं हुआ है. सरमा की ही तरह वे भी दूसरी पार्टी से बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री बने हैं. इसलिए संगठन के साथ तालमेल और अधिक बेहतर करने की चुनौती उनके सामने है.बीजेपी के क्षत्रपों की सूची में नया नाम शुभेंदु अधिकारी का जुडा है. पश्चिम बंगाल में उनकी तेजतर्रार नेता की छवि है. ममता बनर्जी को दो बार पटकनी देने के बाद उनका कद बहुत बड़ा हो गया है. वे विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के सूत्रधारों में से एक माने जा रहे हैं. राज्य में बीजेपी को एक ऐतिहासिक स्थिति में पहुँचाने के बाद वे एक नए और ताकतवर क्षेत्रीय चेहरे के रूप में उभरे हैं.

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