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फर्स्ट फेज: सबसे कम मतदान वाले 10 सीटों पर 10 साल से NDA का था कब्जा, वोट में गिरावट का किसे होगा फायदा?

बिहार के नवादा में सबसे कम 43.8 प्रतिशत वोट पड़े. जो पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत कम हैं.  कम मतदान वाले 10 सीटों में से 4 सुरक्षित सीट है.

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फर्स्ट फेज: सबसे कम मतदान वाले 10 सीटों पर 10 साल से NDA का था कब्जा, वोट में गिरावट का किसे होगा फायदा?
नई दिल्ली:

लोकसभा चुनाव 2024 (Lok sabha election 2024) के पहले चरण के लिए शुक्रवार को देश के 102 सीटों पर वोट डाले गए. पहले फेज के चुनाव में लगभग 63 प्रतिशत वोट पड़े हैं. पिछले 2 लोकसभा चुनावों की तुलना में इन सीटों पर वोट परसेंट कम रहे हैं.  देश में कई ऐसी सीट थी जहां वोटिंग परसेंट 50 परसेंट से भी कम रहे हैं. बिहार के नवादा में सबसे कम 43.8 प्रतिशत वोट पड़े. जो पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत कम थे. ऐसी ही गिरावट देश के विभिन्न राज्यों में स्थित अल्मोड़ा, करौली धौलपुर, गया, गढ़वाल, जमुई, औरंगाबाद , झुंझुनू , टिहरी गढ़वाल,भरतपुर में भी देखने को मिला. इन तमाम सीटों पर 4 से 10 प्रतिशत तक मतों की गिरावट देखने को मिली. 

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2 चुनाव से मत प्रतिशत में हो रही थी बढ़ोतरी

पहले चरण में जिन 10 सीटों पर मतों में गिरावट देखने को मिले हैं. इन सीटों पर पिछले चुनाव में मत प्रतिशत में बढ़ोतरी देखने को मिले थे. और अधिकतर जगहों पर बीजेपी को 2014 की तुलना में 2019 बड़ी जीत मिली थी. 
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नवादा   - नवादा सीट पर 22014 के चुनाव में बीजेपी के गिरिराज सिंह चुनाव जीत कर आए थे. 2019 में गठबंधन के तहत यह सीट एलजेपी के खाते में चला गया और एलजेपी के नेता चंदन सिंह चुनाव जीतने में सफल रहे थे. इस चुनाव में बीजेपी के विवेक ठाकुर मैदान में हालांकि वोट प्रतिशत में गिरावट उनकी परेशानी को बढ़ा सकता है. 

गया-  गया सीट पर 2014 में बीजेपी को जीत मिली थी. इस सीट पर 2019 में जदयू के उम्मीदवार जीतने में सफल रहे थे. गठबंधन के तहत 2014 में जदयू के हिस्से यह सीट मिली थी. दोनों ही चुनाव में जीतन राम मांझी दूसरे नंबर पर रहे थे. इस बार के चुनाव में जीतन राम मांझी एनडीए में शामिल हो गए हैं. 

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जमुई - बिहार की जमुई सीट पर 2014 और 2019 के चुनावों में एलजेपी नेता चिराग पासवान को जीत मिली थी. 2014 की तुलना में चिराग पासवान को 2019 में बड़ी जीत मिली थी. पिछले चुनाव में मतदान प्रतिशत में भी लगभग  5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी थी. हालांकि इस बार मत प्रतिशत में लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है. इस बार चिराग पासवान की जगह उनके बहनोई चुनाव मैदान में हैं. 

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औरंगाबाद - औरंगाबाद सीट बीजेपी के लिए बेहद मजबूत सीट के तौर पर देखा जाता रहा है. इस पिछले 2 चुनावों से यहां मत प्रतिशत में बढ़ोतरी देखने को मिली थी लेकिन इस बार के चुनाव में मत प्रतिशत में 2 प्रतिशत की गिरावट हुई है. बीजेपी के सुशील सिंह यहां से उम्मीदवार हैं. 

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अल्मोड़ा -  उत्तराखंड की अल्मोड़ा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार अजय टम्‍टा को जीत मिली थी.  2014 के चुनाव में भी उन्हें जीत मिली थी. पिछले 2 चुनावों में लगभग 52 प्रतिशत मतदान हुए थे लेकिन इस बार यहां मतदान प्रतिशत में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है. 

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गढ़वाल -  गढ़वाल सीट बीजेपी ने कांग्रेस से 2014 में छिन लिया था. यहां से 2009 में भुवन चंद्र खंडूरी और 2019 में तीर्थ सिंह रावत चुनाव जीते थे. हालांकि पिछले 2 चुनावों की तुलना में वोट प्रतिशत में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट इस बार दर्ज की गयी है. 

टिहरी गढ़वाल - उत्तराखंड की इस सीट से बीजेपी की माला राज्य लक्ष्मी शाह चुनाव मैदान में हैं.  वो पिछले 2 चुनावों में जीत चुकी हैं. हालांकि इस बार के चुनाव में मत प्रतिशत में भारी गिरावट हुई है. लगभग 7 प्रतिशत कम वोट पड़े हैं. 

भरतपुर - राजस्थान के भरत पुर में बीजेपी की रंजीता कोली सांसद हैं. इस सीट पर पिछले 2 चुनाव से मत प्रतिशत बढ़ रहे थे इस बार लगभग 7 प्रतिशत कम वोट पड़े हैं. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव परिणाम पर इसका क्या असर पड़ेगा.

झुंझुनू -  राजस्थान की इस सीट से बीजेपी के नरेंद कुमार को जीत मिली थी. इस बार के चुनाव में पार्टी की तरफ से शुभकरण चौधरी को उतारा गया है. इस सीट पर पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत कम वोट पड़े हैं. 

करौली धौलपुर - इस सीट पर भी बीजेपी का कब्जा रहा है. मनोज राजोरिया बीजेपी के सांसद हैं. इस सीट पर पिछले 2 चुनावों में लगभग 52 प्रतिशत वोट पड़े थे लेकिन इस बार 3 प्रतिशत कम वोट पड़े हैं. 

जहां हुए कम मतदान 10 में से 4 सुरक्षित सीटे
जिन सीटों पर कम मतदान प्रतिशत देखने को मिले हैं उनमें कई सीटें सुरक्षित सीटें है. बिहार की जमुई और गया सीट, राजस्थान की करौली धौलपुर और भरतपुर सीट सुरक्षित सीट रही है. ये सीटें अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित सीटें हैं

मतदान प्रतिशत में गिरावट से बदलती रही हैं सरकारे
पिछले 12 में से 5 चुनावों में मतदान प्रतिशत में गिरावट देखने को मिले है. जब-जब मतदान प्रतिशत में कमी हुई है 4 बार सरकार बदल गयी है. वहीं एक बार सत्ताधारी दल की वापसी हुई है. 1980 के चुनाव में मतदान प्रतिशत में गिरावट हुई और जनता पार्टी की सरकार सत्ता से हट गयी. जनता पार्टी की जगह कांग्रेस की सरकार बन गयी. वहीं 1989 में एक बार फिर मत प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गयी और कांग्रेस की सरकार चली गयी. विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी. 1991 में एक बार फिर मतदान में गिरावट हुई और केंद्र में कांग्रेस की वापसी हो गयी.  1999 में मतदान में गिरावट हुई लेकिन सत्ता में परिवर्तन नहीं हुआ. वहीं 2004 में एक बार फिर मतदान में गिरावट का फायदा विपक्षी दलों को मिला. 

वोट प्रतिशत में गिरावट के क्या कारण हो सकते हैं? 
वोट प्रतिशत में गिरावट न सिर्फ उत्तर भारत के राज्यों में दर्ज किए गए हैं बल्कि यह गिरावट दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी देखने को मिले हैं. उत्तर भारत में जहां भीषण गर्मी को भी इसका एक अहम कारण माना जा सकता है लेकिन पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में भी मत प्रतिशत में गिरावट देखने को मिली है. पूरे देश में एक ट्रेंड देखा गया है कि लगभग सभी राज्यों में 7 से 10 प्रतिशत तक मतों में गिरावट दर्ज की गयी है. हालांकि कुछ जगहों पर उम्मीदवारों के प्रति लोगों की उदासी भी देखने को मिली है. 

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