- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला होगा.
- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हार्ड हिंदुत्व के एजेंडे को जोर देकर चुनावी माहौल गरम कर रहे हैं.
- सपा प्रमुख अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति अपनाकर विवादित हिंदुत्व मुद्दों से दूरी बनाए हुए हैं.
उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा जंग के लिए बिसात बिछ चुकी है और राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीतिक पिच को धार देना शुरू कर दिया है. सूबे का यह महामुकाबला मुख्य रूप से भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और 'इंडिया' गठबंधन के मजबूत स्तंभ सपा-कांग्रेस के बीच सिमटता नजर आ रहा है. हालिया सियासी घटनाक्रमों और बयानों की कड़ियों को जोड़ें तो एक बेहद दिलचस्प ट्रेंड उभर कर सामने आ रहा है, जहां BJP एक बार फिर अपने चिर-परिचित 'हार्ड हिंदुत्व' के एजेंडे को हवा देकर चुनावी माहौल को गरमाने में जुटी है. इसके उलट समाजवादी पार्टी भी इस बार बेहद सतर्क है. अखिलेश यादव की पार्टी सपा हवा का रुख भांपकर सीधे टकराव से बचते हुए 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर कदम आगे बढ़ा रही है. ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि यूपी फतह करने की इस 'महाजंग' में इस बार राष्ट्रवाद, विकास और सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ 'हिंदुत्व के दो अलग रंग' आमने-सामने होंगे.
दरअसल, CM योगी आदित्यनाथ बीजेपी के हिंदुत्व वाली विचारधारा के वर्तमान में सबसे बड़े चेहरे हैं. सीएम योगी आदित्यनाथ को पता है कि उनकी हार्ड लाइन लोगों को प्रभावित करती रही है. ऐसे में चुनाव नजदीक आते-आते सीएम योगी के हार्ड हिंदुत्व की छवि उनके शब्दों में झलक रही है. मच्छर-माफिया से लेकर मदरसा-मौलाना और राम से लेकर यमराज तक के बयान हाल के दिनों में अधिक आए हैं. इन बयानों की खूब चर्चा भी है.
सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पर अखिलेश
अब बात करें समाजवादी पार्टी की तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस बार को ठीक से जानते हैं कि बीजेपी चाहती है कि सपा वो गलतियां करे, जिससे बीजेपी की हिंदुत्व की पिच मजबूत हो सके. शायद इसीलिए अखिलेश यादव उन विवादित मुद्दों से दूरी बनाए हुए हैं, जो हिंदुत्व के खिलाफ हैं. यानी एक सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन लेकर अखिलेश यादव चलते हुए दिखाई दे रहे हैं. हाल ही में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट पर चंदे में घपले का आरोप लगाकर ट्रस्ट पर सीधा हमला किया है.

हिंदुत्व की 'पिच' पर क्यों नहीं जा रहा अखिलेश?
बीते कुछ महीनों में ध्यान से देखा जाए तो अखिलेश यादव मस्जिदों मदरसों पर हो रही कार्रवाई पर सीधी लाइन नहीं ले रहे. लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मामले से लेकर ब्राह्मण राजनीति और इटावा में बने केदारेश्वर मंदिर से लेकर राम मंदिर तक के मामलों को उठाकर अखिलेश यादव अपनी छवि सॉफ्ट कर रहे. सपा प्रमुख पर बीजेपी अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने का लंबे समय से आरोप लगाती रही है. इसलिए अखिलेश यादव इस लड़ाई को हिंदुत्व की पिच पर लेकर नहीं जाना चाहते.
क्या हिट होगा अखिलेश का PDA फॉमूला?
यूपी की इस बड़ी लड़ाई में फायदे नुकसान की बात करें तो बीजेपी 80-20 यानी हिंदू मुस्लिम के फार्मूले पर जाकर चुनाव में अपना फ़ायदा देखती है. उसके हिसाब से लोग हिंदू होकर सोचेंगे तो बीजेपी को सत्ता में वापसी की संभावनाएं ज़्यादा रहेंगी. वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव इसे पीडीए की तरफ लेकर जाना चाहते हैं. यानी हिंदू में पिछड़ों और दलितों के वोटों का एक बड़ा हिस्सा अगर वो अपनी तरफ खींच लें तो 10 साल बाद वो सत्ता में वापसी संभव कर सकते हैं.
आंकड़ों की बात करें तो साल 2022 में अकेले बीजेपी को 42.2% और सपा को 32.7% वोट मिले थे. यानी लगभग दोनों में 10% का अंतर था. हालांकि कुछ वोट गठबंधन साथियों के भी थे, जो अब बदल चुके हैं. यानी अगर सपा के लगभग 6 फीसदी वोट बढ़ जायें और बीजेपी के 5 प्रतिशत वोट कम हो जायें तो समीकरण पूरी तरह से बदल सकता है. ये तभी संभव है जब मुस्लिम और यादव के अलावा सपा को बाक़ी जातियों का भी ठीक-ठाक समर्थन मिले.

लोकसभा में बदल गया था गणित
माना जाता है कि यूपी में बीते लोकसभा चुनाव में संविधान को मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी इंडिया अलायन्स को पिछड़ो, दलितों और मुस्लिमों का बड़ा समर्थन मिला था. प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 37 पर सपा और 6 पर कांग्रेस को जीत मिली. वहीं, बीजेपी को 33 से संतोष करना पड़ा. उसकी सहयोगी आरएलडी के दो और अपना दल (एस) को एक सीट हासिल हुई थी. एक सीट पर आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आज़ाद चुनाव जीते थे. हालांकि लोकसभा के नतीजों से विधानसभा का आंकलन करना ठीक नहीं हो सकता.
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लगातार मुखर दिखाई दिए हैं. लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए सरकार पर हमला कर रहे हैं. उनके बयानों में सीधा निशाना योगी सरकार पर रहता है लेकिन ध्यान से देखा जाये तो वो मुसलमानों के मुद्दों पर लाइन लेते हैं लेकिन थोड़ा संभलकर. यही संभलना सॉफ्ट हिंदुत्व है. जिसमें वो हर उस मुद्दे को छूने की कोशिश कर रहे हैं, जो हिंदुओं तक जाये लेकिन उसे छोड़कर धीरे से साइड हो जाते हैं, जिससे उन पर तुष्टिकरण के आरोप लगें.
फिलहाल यूपी में लोग कौन सा हिंदुत्व पसंद करेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा. क्या सीएम योगी आदित्यनाथ की हार्ड लाइन के हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के पक्ष में वोट पड़ेंगे या फिर अखिलेश यादव के सॉफ्ट हिंदुत्व और विकास के एजेंडे की लोग पसंद करेंगे, ये बड़ा सवाल है. धर्म, जाति और विकास, ये तीन वो मुद्दे हैं, जिनके आधार पर यूपी में वोट पड़ता है. ऐसे में विकास सत्ता और विपक्ष के बीच कॉमन मुद्दा है लेकिन जाति धर्म के मामले में दोनों के अपने अलग राग है. जनता तय करेगी कि किसका राग उसे ज़्यादा अच्छा लगता है.
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