उद्धव ठाकरे की शिवसेना टूट की कगार पर खड़ी है. ऐसी खबरें हैं कि उसके नौ में से छह सांसद टूटने वाले हैं. माना जा रहा है कि ये सांसद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो सकते हैं या संसद में अलग गुट बना सकते हैं. इसे 'ऑपरेशन टाइगर' नाम दिया गया है. इन खबरों को बल उस समय मिला जब बुधवार को नई दिल्ली में पार्टी की ओर से बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में केवल तीन सांसद ही पहुंचे. बाकी के छह सांसद इसमें शामिल नहीं हुए. शिंदे की सेना के नेताओं का दावा है कि सांसदों के साथ 15 से अधिक विधायक भी उनके संपर्क में हैं. उद्धव की शिवसेना के सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र लिखा है. उनके इस पत्र ने भी टूट की खबरों को मजबूत किया है. अगर उद्धव की शिवसेना में टूट होती है तो यह उसके लिए बड़ा झटका साबित होगी, जो पहले से ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.
ठाकरे परिवार के हाथ से निकली 'शिवसेना'
बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना पर उद्धव ठाकरे का पूरा नियंत्रण हो गया था. शिवसेना और बीजेपी मिलकर महाराष्ट्र की राजनीति कर रही थीं. लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों में मतभेद पैदा हो गए. इसके बाद उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया. इस कदम से शिवसेना के बहुत से नेता असहज थे. शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी की महाविकास अघाड़ी की सरकार में मंत्री रहे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के विधायकों ने जून-जुलाई 2022 में बगावत कर दी. ठाकरे इस बगावत को रोक पाने में नाकाम रहे. इसके बाद शिंदे ने बीजेपी के सहयोग से महाराष्ट्र में सरकार बना ली. शिंदे की बगावत का असर यह हुआ कि पार्टी का चुनाव चिन्ह और पार्टी का नाम भी ठाकरे के हाथ से चला गया. चुनाव आयोग ने शिंदे की शिव सेना को असली मानते हुए उसका चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' भी उन्हें सौंप दिया था. उद्धव की शिवसेना को मशाल चुनाव चिन्ह मिला था.

पार्टी में टूट की आशंका के बीच बुधवार को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते शिवसेना (यूबीटी) के सांसद.
अगर इस बार उद्धव की शिव सेना के सांसदों में टूट हो जाती है तो यह उनकी पार्टी में दूसरी टूट होगी. इससे पहले 2022 में हुई बगावत में भी उसके 18 में से 14 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे के साथ चले गए थे. जुलाई 2022 की टूट के बाद उद्धव की शिव सेना ने उबरने की कोशिशें की. इसका फायदा उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला. महा विकास अघाड़ी में रहते हुए ठाकरे की शिवसेना को लड़ने के लिए 21 सीटें दी गई थीं. इसमें से उसने नौ सीट पर जीत दर्ज की थी. लेकिन उसकी यह बढ़त बहुत दिन तक कायम नहीं रही.उसी साल कराए गए विधानसभा चुनाव में उद्धव की शिवसेना 126 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन वह केवल 20 सीटें ही जीत पाई. इसके उलट 81 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 57 सीटें जीत ली थी.
शिव सेना (यूबीटी) की हार दर हार
उद्धव की सेना को झटके लगने का सिलसिला स्थानीय निकाय चुनाव में भी नहीं थमा. शिव सेना का देश के सबसे अमीर नगर निगमों में से एक बीएमसी पर पिछले करीब तीन दशक से कब्जा था. लेकिन इस साल जनवरी में कराए गए चुनाव में बीएमसी उसके हाथ से निकल गई. वहां बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकार है. हालांकि बीएमसी में उद्धव की शिवसेना अभी भी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. मुंबई में उद्धव का यह हाल तब हुआ जब उन्होंने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से भी हाथ मिला लिया था. प्रदेश के दूसरे नगर निगमों या नगर पालिकाओं में भी उद्धव की शिव सेना अच्छा प्रदर्शन नहीं दोहरा पाई.
बीएमसी चुनाव के करीब पांच महीने बाद एक बाकर फिर उद्धव की शिवसेना में टूट की खबरें फिजा में तैर रही हैं.पार्टी की आधिकारिक बैठकों से पार्टी के सांसदों का गायब होना जारी है. विधानसभा और बीएमसी में मिली हार के बाद पार्टी में एक और टूट उसके लिए बहुत बड़ा झटका साबित होगी. उद्धव ठाकरे की पार्टी में हुई फूट को पहली बार बीजेपी ने हवा दी तो दूसरी बार 'ऑपरेशन टाइगर' के पीछे एकनाथ शिंदे की पार्टी का हाथ बताया जा रहा है.

बीएमसी चुनाव में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से भी हाथ मिला लिया था. दोनों भाई करीब 20 साल बाद साथ आए थे.
क्या शिवसेना (यूबीटी) में टूट का फायदा कांग्रेस को मिलेगा
अगर शिवसेना यूबीटी के सांसद टूट जाते हैं तो यह उसके लिए बड़ा झटका साबित होगा. देश के दूसरे राज्यों के उलट महाराष्ट्र की राजनीति में अलग है, वहां कई राजनीतिक दल और गठबंधन चुनाव लड़ते हैं. इसलिए किसी एक दल का कमजोर होना उस गठबंधन के प्रदर्शन को प्रभावित करेगा. फिलहाल ठाकरे की शिवसेना महा विकास अघाड़ी में शामिल है. शिवसेना जैसा ही हाल इस गठबंधन के दूसरे दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का भी है. एनसीपी में भी एक बार बंटवारा हो चुका है. वहीं कांग्रेस नेताओं की कमी का सामना कर रही है. यह सब तब हो रहा है, जब बाकी की पार्टियों ने 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.
विधानसभा चुनाव में महा विकास अघाड़ी में हुए समझौते के तहत कांग्रेस को 101, एनसीपी को 86 और उद्धव की शिवसेना को 95 सीटें मिली थीं. इससे पहले 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने 44, एनसीपी ने 54 और शिवसेना ने 56 सीटें जीती थीं. शिवसेना से कम सीटें जीतने के बाद भी कांग्रेस ने 2024 के चुनाव के सीट बंटवारे में उससे अधिक सीटें हथिया ली थीं. यह चुनाव उस समय कराया गया था, जब शिवसेना में एकनाथ शिंदे की और एनसीपी में अजित पवार की बगावत हो चुकी थी. इससे लगता है कि कांग्रेस ने शिवसेना और एनसीपी की कमजोरी का फायदा उठाया. अब जब कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, तमिलनाडु में डीएमके और केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन की हार के बाद कांग्रेस के हौंसले बुलंद है. उसे लग रहा है कि विपक्ष के इन दलों की हार से वह और मजबूत होगी और उसकी सौदेबाजी की क्षमता भी बढ़ेगी. ऐसे में ठाकरे की शिवसेना में एक और बगावत से कांग्रेस की सौदेबाजी बढ़ जाएगी और वह सीट बंटवारे में अधिक सीटें हथिया सकती है. वहीं अगर सांसद शिव सेना से टूटकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में जाते हैं तो उनकी शिवसेना मजबूत होगी. इसका खमियाजा उद्धव ठाकरे की शिवसेना को ही उठाना पड़ सकता है, जो पहले से ही झटके खा रही है.
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