- मुंबई पुलिस के एक आदेश को रद्द करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा विरोध करना अपराध नहीं है.
- न्यायमूर्ति ने कहा कि पुलिस असहमति जताने वालों पर मुकदमे कर उन्हें सरकार का गुलाम नहीं बना सकती.
- HC ने मुंबई पुलिस के उस फैसले को रद्द किया, जिसमें SDPI नेता वहीद चौधरी को एक साल के लिए जिला बदर किया गया था.
'सरकार के किसी फैसले का विरोध करना या उसके खिलाफ नारे लगाना अपराध नहीं है. इसे किसी नागरिक को कहीं से बाहर निकालने का वैध आधार नहीं माना जा सकता.' बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस के एक फैसले को रद्द करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की है. हाई कोर्ट की यह टिप्पणी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी (49 वर्ष) के केस से जुड़ा है. पुलिस ने एक आदेश में अब्दुल वहीद चौधरी को एक साल तक मुंबई आने से प्रतिबंधित किया था. पुलिस के इस फैसले के खिलाफ वहीद हाई कोर्ट पहुंचे, जहां न्यायमूर्ति माधव जे. जामदार ने पुलिस के आदेश को रद्द करते यह तल्ख टिप्पणी की.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि केवल शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने और उसमें हिस्सा लेने के कारण किसी नागरिक को शहर से बाहर करना संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है.
क्या पुलिस केस कर सरकार का गुलाम बनाना चाहती हैः सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति माधव जे. जामदार ने पूछा कि क्या पुलिस असहमति जताने वाले नागरिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज कर उन्हें 'सरकार का गुलाम' बनाना चाहती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस जनता की सेवक है, किसी राजनीतिक सत्ता या वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की नहीं. साथ ही यह भी दोहराया कि सरकार और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ नारे लगाना तथा विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का संवैधानिक अधिकार है.
मुंबई पुलिस ने एक साल के लिए प्रतिबंधित किया था प्रवेश
SDPI के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी ने दिसंबर 2025 में मुंबई पुलिस ने एक साल के निर्वासन आदेश को चुनौती दी थी. पुलिस ने अपने आदेश के समर्थन में 2019 से 2024 के बीच चौधरी के खिलाफ दर्ज कई मामलों का हवाला दिया था. ये मामले नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) तथा बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बिना पुलिस अनुमति आयोजित किए गए प्रदर्शनों से जुड़े थे.
पीड़ित ने कहा था- राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई
चौधरी का तर्क था कि यह कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित थी और उन्हें महत्वपूर्ण स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान शहर से दूर रखकर लोकतांत्रिक विरोध को दबाने की कोशिश की गई. भारत में निर्वासन आदेश (Externment Order) एक असाधारण कानूनी उपाय है, जिसका उपयोग आमतौर पर ऐसे अपराधियों या गिरोहबाजों के खिलाफ किया जाता है जिनसे हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का खतरा हो.
चौधरी के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि उनके खिलाफ दर्ज सभी मामले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस आदेशों की अवहेलना से संबंधित मामूली अपराध थे, जिनमें अधिकतम एक महीने की सजा का प्रावधान है. ऐसे मामलों के आधार पर किसी नागरिक की आवाजाही की स्वतंत्रता छीनना कानून की भावना के विपरीत है.
अदालत ने माना- पुलिस की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण
राज्य सरकार ने पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि प्रदर्शन पुलिस की अनुमति न मिलने के बावजूद आयोजित किए गए थे, इसलिए कार्रवाई उचित थी. हालांकि, न्यायमूर्ति जामदार ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण से की गई प्रतीत होती है और उसके समर्थन में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है. अदालत ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो कि चौधरी सार्वजनिक शांति, सुरक्षा या संपत्ति के लिए खतरा थे.
मौलिक अधिकारों का हनन खतरनाक मिसाल बनेगा
अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बोलने का अधिकार और गरिमा के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं. सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण किसी व्यक्ति को देश में स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने के अधिकार से वंचित करना एक खतरनाक मिसाल स्थापित करेगा. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि शांतिपूर्ण असहमति और विरोध-प्रदर्शन एक स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियादी पहचान हैं और इन्हें दबाया नहीं जा सकता.
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