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आदिवासी समुदाय ने विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत की आत्मा को बचाए रखा, उनका विकास जरूरी: मोहन भागवत

मोहन भागवत ने कहा कि आज आदिवासियों को सामान्य तौर पर देश के लोगों को जो सुविधाएं मिलती हैं, वो उन्हें नहीं मिलती. हमारी संस्कृति जंगलों में है, वहीं वेदों की रचना हुई, अस्मिता वहीं है और बिना इसके देश का अस्तित्व नहीं टिकता.

आदिवासी समुदाय ने विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत की आत्मा को बचाए रखा, उनका विकास जरूरी: मोहन भागवत
  • RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद आदिवासी और अनुसूचित जातियों ने देश की आत्मा बचाई है
  • उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाना आवश्यक है, ताकि समाज का समग्र विकास संभव हो सके
  • भागवत ने सेवा को कर्तव्य बताया और आदिवासी समाज में शिक्षा के प्रसार को मेहनत और संवेदना से जोड़कर देखा
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मुंबई:

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को महाराष्ट्र के एक कार्यक्रम में कहा कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद, आदिवासी समुदायों और अनुसूचित जातियों ने देश की पहचान और आत्मा को बचाए रखा है. आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाना जरूरी है. उन्होंने साथ ही कहा कि जिस तरह से दुनिया इस समय डांवाडोल हो रही है, वैश्विक उथल-पुथल मची है, ऐसे में सुदृढ और संबल भारत ही विश्व का आधार बन सकता है.

आदिवासी समुदायों को लेकर भागवत ने कहा कि उन्हें देश की मुख्य धारा में लाए बिना समाज का विकास नहीं हो सकता और उसके लिए हमें उनसे सीखना होगा. उन्होंने कहा कि इसके लिए भारत को सभी समाजों को साथ लेकर चलना होगा.

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आरएसएस चीफ ने कहा कि सेवा उपकार नहीं, यह हमारा कर्तव्य है, यह खुद के विकास करने का काम है, इसी से हम इंसान बनते हैं. आदिवासी समाज में शिक्षा का ये प्रसार संवेदना से किया जाने वाला काम है, वह दया से नहीं, जी-तोड़ मेहनत से संभव है. सालों से आदिवासी समाज ने हमारी संस्कृति को संभाल कर रखा है और आदिवासी समाज हमें बहुत कुछ देता रहा है.

मोहन भागवत ने कहा कि दूसरों की सेवा के लिए कष्ट करना हमारी भारत भूमि का स्वभाव है. आज आदिवासियों को सामान्य तौर पर देश के लोगों को जो सुविधाएं मिलती हैं, वो उन्हें नहीं मिलती. हमारी संस्कृति जंगलों में है, वहीं वेदों की रचना हुई, अस्मिता वहीं है और बिना इसके देश का अस्तित्व नहीं टिकता. यह स्वभाव हिंदू समाज का सनातन काल से है.

उन्होंने कहा, ‘‘यह समाज का वह चिरस्थायी लोकाचार है, जो हजारों वर्षों से कायम है. विभिन्न कारणों से, आंशिक रूप से हमारी उदासीनता के कारण और आंशिक रूप से विदेशी आक्रमण के कारण, इस लोकाचार को संरक्षित करने वालों को भारी कीमत चुकानी पड़ी.''

भागवत ने कहा कि तथाकथित शिक्षित और विकसित वर्ग समय के साथ इन समुदायों से दूर हो गए. उन्होंने इस खाई को पाटने की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने कहा कि इन समुदायों द्वारा संरक्षित पहचान भारतीय समाज की सच्ची पहचान का प्रतिनिधित्व करती है और इस बात पर जोर दिया कि पहचान के बिना अस्तित्व ही खतरे में होता है.

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वहीं वैश्विक घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा, ‘‘जिस तरह से दुनिया इस समय डांवाडोल हो रही है, वैश्विक उथल-पुथल मची है, ऐसे में सुदृढ़ और संबल भारत ही विश्व का आधार बन सकता है.''

भागवत ने कहा कि देश को न केवल अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए, बल्कि विश्व को भी समर्थन देना चाहिए. उन्होंने कहा, “विश्व को यह दिखना चाहिए कि देश न केवल अपनी समस्याओं का समाधान कर रहा है, बल्कि विश्व को भी इसी तरह की समस्याओं से निपटने में मदद कर रहा है.''

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि समाज सेवा कोई उपकार नहीं बल्कि एक कर्तव्य है जो स्वयं के विकास में योगदान देता है. उन्होंने कहा कि दूसरों के विकास में मदद करने से व्यक्ति का उत्थान होता है और समाज का ताना-बाना मजबूत होता है.
 

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