विज्ञापन

TMC में कैसे बुना गया बगावत का ताना-बाना? 4 मई की हार से 3 जून की फूट तक की पूरी इनसाइड स्टोरी

बंगाल के चुनाव में हार, बगावत और बिखराव: कब क्या हुआ कि केवल एक महीने में ममता की टीएमसी का हो गया पतन?

TMC में कैसे बुना गया बगावत का ताना-बाना? 4 मई की हार से 3 जून की फूट तक की पूरी इनसाइड स्टोरी
  • 4 मई को चुनावी हार के बाद TMC में अंदरूनी असंतोष और नेताओं के बीच मतभेद तेजी से बढ़ने लगे.
  • मई के मध्य से फर्जी हस्ताक्षर विवाद, CID जांच और बैठकों में टूट ने पार्टी संगठन को कमजोर कर दिया.
  • इस बीच विधायकों की बगावत और अलग गुट बनने की प्रक्रिया पूरी तरह सामने आ गई, जिससे पार्टी में फूट पड़ गई.

आज से ठीक एक महीने पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक तूफान आया. बीजेपी ने डेढ़ दशक तक सत्ता में रही टीएमसी को विधानसभा चुनावों में हरा दिया. लेकिन यह बवंडर थमा नहीं. जो खुद को बेहद मजबूत संगठन मानती थी, वो टीएमसी कुछ ही दिनों में अंदरूनी बगावत, आरोप-प्रत्यारोप और टूट के ऐसे दौर में पहुंच गई कि उसका अस्तित्व ही सवालों में आ गया. चुनाव नतीजों के बाद शुरू हुआ यह राजनीतिक भूचाल धीरे-धीरे पार्टी के भीतर ऐसी दरारें पैदा करता गया कि कुछ ही हफ्तों में नेतृत्व, विधायकों की वफादारी और संगठन की एकता सब बिखरने लगे.

चलिए, सिलसिलेवार तरीके से देखते हैं कि 4 मई को बंगाल के विधानसभा चुनाव के नतीजे में मिली हार के महज एक महीने के भीतर ममता बनर्जी की टीएमसी कैसे बिखर गई?

04 मईः टीएमसी को विधानसभा चुनाव में हार मिली. ममता की पार्टी को 80 सीटें मिलीं. BJP ने 207 सीटें जीतीं. बाद में BJP ने फाल्टा उपचुनाव भी जीत लिया. उसका कुल आंकड़ा 208 तक पहुंच गया. पार्टी 28 साल और 5 महीने पुरानी थी. ममता ने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. 3 जून 2026 को तृणमूल कांग्रेस टूट गई.

लेकन सिर्फ 13 दिनों में टीएमसी में बड़ा उथल-पुथल हो गया. सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ तीव्र आंदोलनों के बीच खुद सत्ता में आने और डेढ़ दशक तक शासन करने वाली ‘दीदी' की मजबूत पार्टी सिर्फ 13 दिनों में बिखर गई.

टीएमसी विधायक ऋतब्रत

टीएमसी विधायक ऋतब्रत
Photo Credit: ANI

22 मई: दिल्ली के बंग भवन में वह दिन था जब मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और टीएमसी विधायक ऋतब्रत की मुलाकात हुई. तब बताया गया कि यह राजधानी में एक ‘अनपेक्षित' मुलाकात थी. चुनाव नतीजे 4 मई को घोषित हो चुके थे, लेकिन 4 जून आने से पहले ही टीएमसी पूरी तरह अव्यवस्था में आ गई.

मई में चुनावी हार के बाद, 6 मई को ममता ने कालिघाट में अपने घर के पास दफ्तर में चुनाव जीतने वाले विधायकों को बैठक बुलाई. इसी बैठक में ममता ने सभी को खड़े होकर अभिषेक बनर्जी की भूमिका के सम्मान में तालियां बजाने का निर्देश दिया, यहीं से टीएमसी के खेमे में नाराजगी का गुबार देखने को मिला.

इसके बाद से ही टीएमसी विधायक दल के भीतर एकता टूटने लगी.

काकोली घोष दस्तीदार उन शुरुआती करीबी नेताओं में थीं, जिन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ आवाज उठाई. इसके बाद वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय और कई अन्य नेताओं ने भी विरोध किया.

ये भी पढ़ें: MLA से लेकर पार्षद तक ने छोड़ा साथ, TMC में दिख रही टूट क्या ममता बनर्जी के युग के अंत की शुरुआत है?

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: Lok Sabha TV

19 मई: कालिघाट में एक और बैठक हुई. इसी बैठक में ऋतब्रत और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने पहला बड़ा विवाद खड़ा किया. ऋतब्रत और संदीपन ने सवाल उठाया कि पार्टी फाल्टा के जहांगीर खान को क्यों नहीं निकाल रही है, जबकि उन्होंने चुनाव से खुद को अलग कर लिया था.

25 मई: इसी दिन से टीएमसी में हस्ताक्षर विवाद को लेकर विवाद शुरू हुआ. आरोप लगे कि विधानसभा में स्पीकर को भेजे गए दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें विपक्ष के नेता को लेकर प्रस्ताव थे.

27 मई: फर्जी हस्ताक्षर के आरोपों को लेकर ऋतब्रत और संदीपन ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा. इसके आधार पर विधानसभा सचिवालय ने हेयर स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद CID ने जांच शुरू कर दी. इसी समय से टीएमसी संसदीय दल में अलग गुट बनाने की तैयारी शुरू हो गई. लगातार फोन कॉल और गुप्त बैठकों का दौर शुरू हो गया.

ये भी पढ़ें: ममता से परहेज नहीं, अभिषेक तेरी खैर नहीं... समझिए बंगाल में कैसे टूट गई तृणमूल कांग्रेस

नयना बनर्जी

नयना बनर्जी
Photo Credit: Nayna Bandyopadhyay X @NaynaBandyopad1

28 मई: मुख्यमंत्री के निर्देश पर CID जांच का आदेश दिया गया. जांच एजेंसी ने चौरंगी की विधायक नयना बनर्जी, डोमजूर के विधायक तापस मैती और कैनिंग ईस्ट के विधायक बहारुल इस्लाम से पूछताछ शुरू की.

30 मई: सोनारपुर दौरे के दौरान अभिषेक बनर्जी पर ‘हमला' हुआ. स्थानीय लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई. उन पर अंडे और पत्थर फेंके गए. उनकी शर्ट और कलाई में पहना फिटनेस बैंड भी टूट गया.

31 मई: बगावत की लहर का असर इस दिन ममता के आवास पर साफ दिखा. ममता ने एक बार फिर विजयी विधायकों की बैठक बुलाई थी, लेकिन 80 में से सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे. पर्याप्त संख्या न होने के कारण बैठक रद्द करनी पड़ी.

उसी दिन कुछ टीएमसी विधायक रथिन घोष के घर पर मिले. सोमवार को कम से कम 50 विधायक कोलकाता के एक फाइव स्टार होटल में मिले.

रथिन घोष

रथिन घोष
Photo Credit: ANI

1 जून: नबान्ना से प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु ने कहा कि सीआईडी ने हस्ताक्षर फर्जीवाड़े की जांच शुरू कर दी है, जो ऋतब्रत और संदीपन की लिखित शिकायतों के आधार पर की गई है.

उनके द्वारा 27 तारीख को दिए गए पत्रों को पहले दबा दिया गया था. टीएमसी ने केवल तभी कार्रवाई की जब सुवेंदु ने सार्वजनिक रूप से दोनों नेताओं के नाम उजागर किए.

प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के 15 मिनट के भीतर ही टीएमसी ने दोनों नेताओं को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया.

ऋतब्रत और संदीपन

ऋतब्रत और संदीपन
Photo Credit: IANS

2 जून: टीएमसी के प्रतिनिधि के रूप में दो विधायक कुंतल और असिमा पात्रा विधानसभा पहुंचे और फिर से स्पीकर सचिवालय को पत्र सौंपा, जिस पर अभिषेक के हस्ताक्षर थे. जिसमें दोबारा शौभंदेब को विपक्ष का नेता बनाने, नयना और असिमा को उपनेता और फिरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाने की मांग दोहराई गई. लेकिन स्पीकर सचिवालय ने इस पत्र को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया.

3 जून: टीएमसी के विधायक सुबह 10 बजे विधानसभा पहुंचे. ऋतब्रत, संदीपन और उनके सहयोगियों ने स्पीकर को 58 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला पत्र सौंपा, जिसमें बाकी सदस्यों ने ऋतब्रत को विपक्ष का नेता स्वीकार किया. चार उपनेताओं में जावेद खान, सबीना यास्मीन, संदीपन और शिउली साहा शामिल थे. अखरुज्जमान को चीफ व्हिप बनाया गया. इसके तुरंत बाद ऋतब्रत, संदीपन और उनका गुट राज्य सचिवालय नबान्ना पहुंच गया.

ये भी पढ़ें: ममता के हाथ से गई TMC! ऋतब्रत बनर्जी बंगाल में बने विपक्ष के नेता, स्पीकर ने बागी गुट को दी मंजूरी

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com