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सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत नहीं... तमिलनाडु में जो हो रहा उसकी क्रोनोलॉजी समझिए

तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर सियासी और संवैधानिक बहस तेज है. राज्यपाल ने टीवीके प्रमुख विजय से बहुमत पर सवाल किए, क्योंकि वे 118 विधायकों का समर्थन नहीं दिखा सके. अब नजर अतिरिक्त समर्थन पर है, जबकि अंतिम फैसला फ्लोर टेस्ट से ही तय होगा.

सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन बहुमत नहीं... तमिलनाडु में जो हो रहा उसकी क्रोनोलॉजी समझिए
  • तमिलनाडु में TVK प्रमुख विजय को राज्यपाल ने बहुमत और सरकार गठन की योजना पर सवाल पूछने के लिए राजभवन बुलाया.
  • राज्यपाल ने विजय से 113 विधायकों के साथ सरकार बनाने, समर्थन पार्टियों और स्थिर सरकार पर संवैधानिक सवाल किए.
  • सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई फैसले के अनुसार सरकार का बहुमत विधानसभा के फ्लोर टेस्ट से साबित होना जरूरी है.
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नई दिल्ली:

तमिलनाडु की राजनीति में सरकार गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है. टीवीके प्रमुख विजय को राज्यपाल आर.वी. अर्लेकर ने राजभवन बुलाया. खास बात यह है कि यह मुलाकात विजय की ओर से नहीं मांगी गई थी, बल्कि खुद राज्यपाल ने उन्हें चर्चा के लिए आमंत्रित किया. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में राज्यपाल ने विजय से सीधा सवाल किया कि 113 विधायकों के साथ वे सरकार कैसे बनाएंगे और क्या उनके पास बहुमत जुटाने की ठोस योजना है.

बताया जा रहा है कि एक दिन पहले विजय ने राज्यपाल से मुलाकात के दौरान सरकार बनाने का दावा तो पेश किया था, लेकिन वे 118 विधायकों के समर्थन पत्र नहीं दिखा सके थे, जो बहुमत के लिए जरूरी माने जा रहे हैं. इसी के बाद राज्यपाल ने दोबारा बुलाकर यह स्पष्ट करना चाहा कि क्या टीवीके अब अतिरिक्त समर्थन जुटाने में सफल हुई है.

राज्यपाल ने विजय से क्या-क्या पूछा?

सूत्रों के मुताबिक, राजभवन में हुई बातचीत में राज्यपाल ने कई संवैधानिक सवाल उठाए. उन्होंने पूछा:

  • 113 विधायकों के साथ सरकार कैसे बनाई जाएगी?
  • कौन-सी दूसरी पार्टी टीवीके सरकार को समर्थन देगी?
  • क्या इतनी संख्या में स्थिर सरकार संभव है?
  • क्या सिर्फ इस उम्मीद पर शपथ दिलाई जा सकती है कि बाद में बहुमत मिल जाएगा?
  • अगर शपथ के बाद बहुमत साबित नहीं हुआ तो स्थिति क्या होगी?

इन सवालों ने तमिलनाडु में सरकार गठन की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस छेड़ दी है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी होने के आधार पर सरकार बनाने का न्योता मिल सकता है, या फिर पहले स्पष्ट बहुमत दिखाना जरूरी होता है.

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भारतीय राजनीति में पहले भी उठ चुका है ऐसा सवाल

यह पहली बार नहीं है जब किसी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बहुमत से दूर रही हो और राज्यपाल की भूमिका चर्चा में आई हो. भारत की राजनीति में कई ऐसे उदाहरण हैं, जब सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने का मौका नहीं मिला, जबकि कुछ मामलों में राज्यपाल ने बहुमत साबित करने का अवसर दे दिया.

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एस.आर. बोम्मई केस: जिसने बदल दिए सरकार गठन के नियम

ऐसे हर विवाद में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक एस. आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार मामला सबसे ज्यादा चर्चा में आता है. 1994 में आए इस फैसले में अदालत ने साफ कहा था कि किसी भी सरकार के बहुमत का असली परीक्षण विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए, न कि राजभवन में.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल अपनी व्यक्तिगत राय के आधार पर यह तय नहीं कर सकते कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं. अगर किसी सरकार पर संदेह हो, तो उसका फैसला सदन में वोटिंग के जरिए होना चाहिए. इसी फैसले के बाद 'फ्लोर टेस्ट' भारतीय राजनीति में संवैधानिक परंपरा बन गया.

बाद के कई मामलों- कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई फैसले का हवाला देते हुए तुरंत फ्लोर टेस्ट कराने के आदेश दिए.

महाराष्ट्र 2019: सुबह-सुबह शपथ और फिर सरकार गिर गई

महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन शिवसेना के अलग होने से बहुमत का गणित बिगड़ गया था. इसी बीच अचानक सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने शपथ ले ली. दावा किया गया कि एनसीपी का समर्थन हासिल है, लेकिन विपक्ष ने इसे चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया और बहुमत साबित होने से पहले ही सरकार गिर गई. बाद में शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने सरकार बनाई.

कर्नाटक 2018: सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी, लेकिन बहुमत नहीं

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. येदियुरप्पा को राज्यपाल ने सरकार बनाने का न्योता भी दे दिया, जबकि बहुमत के लिए 112 सीटों की जरूरत थी. दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर बहुमत का दावा पेश किया था. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने तत्काल फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया. बहुमत साबित न कर पाने पर येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा.

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गोवा 2017: कांग्रेस सबसे बड़ी, फिर भी बीजेपी की सरकार

गोवा में कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि बीजेपी के पास सिर्फ 13 सीटें थीं. लेकिन बीजेपी ने तेजी से क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों का समर्थन जुटा लिया. राज्यपाल ने कांग्रेस के बजाय बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया और मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बने. कांग्रेस ने इसका विरोध किया, लेकिन अदालत ने भी कहा कि बहुमत साबित करने का मंच विधानसभा ही है.

मणिपुर 2017: संख्या कम, समर्थन ज्यादा

मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन बीजेपी ने छोटे दलों का समर्थन जुटाकर बहुमत का दावा पेश कर दिया. इसके बाद राज्यपाल ने एन. बिरेन सिंह को सरकार बनाने का न्योता दिया.

झारखंड 2005: राज्यपाल के फैसले पर बड़ा विवाद

झारखंड में एनडीए गठबंधन बहुमत का दावा कर रहा था, लेकिन राज्यपाल ने पहले शिबू सोरेन को सरकार बनाने का मौका दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अंततः फ्लोर टेस्ट के जरिए स्थिति साफ हुई.

दिल्ली 2013: बीजेपी सबसे बड़ी, लेकिन सरकार नहीं बनाई

दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन बहुमत से दूर थी. पार्टी ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया क्योंकि पर्याप्त समर्थन नहीं था. इसके बाद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई.

सरकार गठन को लेकर क्या कहती हैं संवैधानिक परंपराएं?

संविधान में यह साफ नहीं लिखा गया कि राज्यपाल किसे पहले बुलाएंगे, लेकिन सरकारिया आयोग और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में कुछ प्राथमिकताएं तय की गई हैं. आमतौर पर प्राथमिकता इस प्रकार मानी जाती है:

1. स्पष्ट बहुमत वाला पूर्व-चुनावी गठबंधन

2. सबसे बड़ी पार्टी, अगर वह समर्थन जुटाने का भरोसा दे

3. चुनाव के बाद बना गठबंधन, जिसके पास बहुमत हो

4. अल्पमत सरकार, जिसे बाहर से समर्थन मिला हो

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तमिलनाडु में आगे क्या?

तमिलनाडु में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से अभी दूर बताई जा रही है. ऐसे में राज्यपाल की ओर से विजय को बुलाकर पूछे गए सवाल यह संकेत देते हैं कि राजभवन सिर्फ 'सबसे बड़ी पार्टी' के दावे से संतुष्ट नहीं है, बल्कि स्थिर सरकार की संभावना भी परखना चाहता है.

अब नजर इस बात पर है कि क्या विजय अगले कुछ घंटों में अतिरिक्त समर्थन पत्र जुटा पाते हैं या फिर कोई दूसरा गठबंधन बहुमत का दावा पेश करता है. लेकिन अगर सरकार गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो अंतिम परीक्षा वही होगी जो एस.आर. बोम्मई केस ने तय की थी. बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं, विधानसभा के फ्लोर पर होगा.

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