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This Article is From Aug 21, 2017

तीन तलाक वैध या अवैध? सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आज

सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक पर मंगलवार को अपना फैसला सुना सकता है. कोर्ट ये तय करेगा कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं?

तीन तलाक वैध या अवैध? सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आज
तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 11 से 18 मई तक सुनवाई चली थी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ तीन तलाक पर मंगलवार को अपना फैसला सुना सकती है. कोर्ट ये तय करेगा कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं, यह कानूनी वैध है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? कोर्ट का फैसला सुबह 10:30 बजे आ सकता है.

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इस खंड पीठ में सभी धर्मों के जस्टिस शामिल हैं जिनमें चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चिएन), जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यूयू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल हैं.

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इस मामले पर शीर्ष अदालत में 11 से 18 मई तक सुनवाई चली थी और फैसले को सुरक्षित रख लिया गया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि ऐसे भी संगठन हैं, जो कहते हैं कि तीन तलाक वैध है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में शादी तोड़ने के लिए यह सबसे खराब तरीका है और यह अनवांटेड है. कोर्ट ने सवाल किया कि क्या जो धर्म के मुताबिक ही घिनौना है वो कानून के तहत वैध ठहराया जा सकता है? जो ईश्वर की नजर में पाप है, क्या उसे शरियत में लिया जा सकता है. सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि कैसे कोई पापी प्रथा आस्था का विषय हो सकती है, पवित्र कुरान में पहले से ही तलाक की प्रक्रिया बताई गई है तो फिर तीन तलाक की क्या जरूरत,

दरअसल, शायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की थी. इस पर शायरा का तर्क था कि तीन तलाक ना तो इस्लाम का हिस्सा है और ना ही आस्था. उन्होंने कहा कि उनकी आस्था ये है कि तीन तलाक मेरे और ईश्वर के बीच में पाप है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी कहता है कि ये बुरा है, पाप है और अवांछनीय है

VIDEO: तीन तलाक - शाह बानो से शायरा बानो तक
क्या है मामला
मार्च, 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी. बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है. कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है.
 

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