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शादी के बाद बेटी का मायके से संबंध खत्म नहीं होता, हक देने से इनकार नहीं कर सकती सरकार: सुप्रीम कोर्ट

SC ने कहा कि जहां एक शादीशुदा बेटा विवाह के बाद भी परिवार का सदस्य माना जाता है, वहीं, बेटी को केवल विवाह के कारण परिवार से बाहर मान लेना भेदभावपूर्ण है.

शादी के बाद बेटी का मायके से संबंध खत्म नहीं होता, हक देने से इनकार नहीं कर सकती सरकार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटी को केवल विवाह के आधार पर कल्याणकारी योजना से बाहर नहीं रखा जा सकता.
  • अदालत ने विवाह के बाद बेटी और उसके मायके के संबंध को समाप्त मानना संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य बताया.
  • कुलसुम निशा के मामले में कोर्ट ने कहा कि पात्रता आर्थिक निर्भरता और अन्य योग्यताओं पर आधारित होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी शादीशुदा बेटी को केवल उसके विवाहित होने के आधार पर किसी कल्याणकारी योजना का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता. जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलौक अराधे की पीठ ने कहा कि शादीशुदा बेटियों को योजनाओं से बाहर रखना लैंगिक पूर्वाग्रह  पर आधारित है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार  और अनुच्छेद 15 के तहत भेदभाव निषेध का उल्लंघन है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी योजना में पात्रता तय करने का आधार निर्भरता आर्थिक जरूरत और अन्य निर्धारित योग्यताएं होनी चाहिए, न कि यह कि महिला विवाहित है या नहीं. पीठ ने कहा कि यह मान लेना कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके की सदस्य या उस पर निर्भर नहीं रहती, संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है. विवाह से बेटी और उसके मायके के बीच का संबंध समाप्त नहीं होता और न ही इससे यह मान लिया जा सकता है कि वह अब अपने परिवार पर निर्भर नहीं है.

यह मामला कुलसुम निशा द्वारा दायर अपील से जुड़ा था . निशा की मां का  का मार्च 2024 में निधन हो गया, वो जो यूपी  में  राशन दुकान चलाती थीं. इसके बाद निशा ने आश्रित  कोटे के तहत दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया. निशा ने बताया कि शादी के बाद भी वह अपनी मां और बहनों के साथ रहती थीं. दुकान के संचालन में मां की मदद करती थीं. मां की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्होंने संभाली. उनकी एक बहन दृष्टिबाधित  है, जिसकी देखभाल भी वह करती हैं.

इसके बावजूद SDM ने उनका आवेदन केवल इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा बेटी हैं और सरकारी आदेश के अनुसार “परिवार” की परिभाषा में नहीं आतीं. बाद में डिप्टी कमिश्नर और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी राहत देने से इनकार कर दिया.  राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी  कि शादीशुदा बेटियां आमतौर पर ससुराल में रहती हैं, इसलिए स्थानीय निवास  की शर्त पूरी नहीं कर पाती. 

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी शादीशुदा बेटियों को यह मानकर बाहर नहीं किया जा सकता कि वे कहीं और रहती हैं. संवैधानिक निर्णय व्यापक और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित होने चाहिए, न कि रूढ़िगत धारणाओं पर.  अदालत ने कहा कि अनुकंपा  आधार पर दुकान का आवंटन उत्तराधिकार का अधिकार नहीं है, बल्कि मृतक के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को जारी रखने के लिए किया जाता है . यदि निर्भरता ही मुख्य कसौटी है, तो केवल शादीशुदा होने के कारण बेटी को बाहर रखना पूरी तरह तर्कहीन है .

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट, डिप्टी कमिश्नर और SDM के आदेश रद्द कर दिए और कहा कहा कि विवाहित बेटियां भी 'परिवार' का हिस्सा मानी जाएंगी, यदि वे निर्भरता और अन्य पात्रता शर्तें साबित कर सकें. संबंधित प्राधिकारी को चार सप्ताह के भीतर निशा के पक्ष में राशन दुकान का आवंटन आदेश जारी करने का निर्देश दिया.

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