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100-101 का झंझट खत्म, पूरे देश में अब एक ही इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर होगा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

पूरे देश में एक इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है. ट्रॉमा केयर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपात स्थिति में मदद जीवन रक्षक दवा की है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीने के अधिकार के तहत आता है.

100-101 का झंझट खत्म, पूरे देश में अब एक ही इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर होगा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर को मर्ज करने का आदेश दिया है.
नई दिल्ली:

Emergency Helpline Number: किसी भी आपातकालीन स्थिति में लोग तुरंत इमरजेंसी नंबर पर फोन घुमाते हैं. लेकिन भारत में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग इमरजेंसी नंबर है. इससे कई बार समय पर सही सहायता मिलने में देरी हो जाती है. लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा नहीं होगा. क्योंकि अब पूरे देश में एक ही इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर होगा. यह इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर 112 होगा. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है. अभी देश में 100, 101,102, 108, 1033, 1091 जैसे हेल्पलाइन नंबर हैं. इन सभी को मर्ज कर 112 को इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर बनाया जाएगा. 

सेव लाइफ फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी कोर्ट

‘सेव लाइफ फाउंडेशन' द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट कहा कि नागरिकों का ट्रॉमा (आघात) उपचार का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे तीन महीने के भीतर आपातकालीन सेवाओं के लिए एक हेल्पलाइन नंबर ‘112' को पूरी तरह संचालित करें. एक प्रभावी ‘गुड समैरिटन' शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करें.

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकारें नियमित अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें, इसके लिए मासिक बैठकें आयोजित करें और उनकी कार्यवाही संबंधित पोर्टलों पर अपलोड करें.

आपात स्थिति में तत्काल मदद जीवनरक्षक दवा की तरह

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति दुर्घटना या ऐसी ही किसी घटना का शिकार होता है, जिसमें तत्काल ट्रॉमा देखभाल की जरूरत होती है, तो वह अक्सर सदमे और भ्रम की स्थिति में होता है और दूसरों से मदद की उम्मीद करता है. कोर्ट ने कहा, “ऐसी स्थिति में बिना चिकित्सा हस्तक्षेप या आपात देखभाल के बिताया गया हर मिनट जीवित रहने की संभावना को कम करता है. तेजी, वास्तव में, जीवनरक्षक दवा की तरह है.”

ऐसी व्यवस्था हो कि आपात स्थिति में लोग मदद से नहीं हिचके

सुनवाई के दौरान जजों की पीठ ने कहा कि ट्रॉमा देखभाल के लिए एक मजबूत तंत्र ‘नीचे से ऊपर' वाले दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए, जिसमें सभी हितधारकों को शामिल किया जाए. अदालत ने कहा कि अक्सर, भले ही किसी राहगीर में मदद करने की इच्छा हो, लेकिन वह कानूनी प्रक्रियाओं के डर, पुलिस थाने में गवाही के लिए बुलाए जाने की आशंका और मानसिक दबाव के कारण हिचकिचाता है.

ट्रॉमा देखभाल जीवन के अधिकार का हिस्सा

पीठ ने कहा कि इन बाधाओं को दूर करने के लिए एक व्यवस्थित हस्तक्षेप, ट्रॉमा देखभाल के लिए एक समान ढांचा, जन-जागरूकता, प्राथमिक उपचार कौशल का मानकीकरण और उचित ‘गुड समैरिटन' कानून आवश्यक हैं, क्योंकि नागरिकों का ट्रॉमा देखभाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है.

GPS और लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस से लैस होगा 112 नंबर

अदालत ने केंद्र को तीन महीने के भीतर ट्रॉमा मामलों के लिए एक मेडिकल रेस्क्यू प्रोटोकॉल जारी करने की अनुमति दी और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को इसे लागू करने के लिए अतिरिक्त तीन महीने का समय दिया. साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी सभी एंबुलेंस (सरकारी और निजी) को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री मानक-125 (AIS-125) के अनुरूप बनाना होगा. जीपीएस/वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगाना होगा और उसे हेल्पलाइन 112 से रीयल-टाइम में जोड़ना होगा. इसके अलावा, प्रतिक्रिया समय, देखभाल की गुणवत्ता, उपकरण और परिणामों की समय-समय पर ऑडिट कर रिपोर्ट एक केंद्रीय प्राधिकरण को भेजनी होगी.
 

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