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नगर निकाय चुनावों में झूठा हलफनामा देने पर RPA नहीं, IPC के तहत चलेगा मुकदमा: सुप्रीम कोर्ट

निकाय चुनाव में फर्जी हलफनामा देने पर कोर्ट ने कहा कि RPA की धारा 2(डी) के अनुसार यह कानून केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों पर लागू होता है. इसलिए नगर निकाय चुनाव में RPA की धारा 125A के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती. 

नगर निकाय चुनावों में झूठा हलफनामा देने पर RPA नहीं, IPC के तहत चलेगा मुकदमा: सुप्रीम कोर्ट
निकाय चुनाव में फर्जी हलफनामे पर कोर्ट का बड़ा फैसला
NDTV
नई दिल्ली:

नगर निकाय चुनावों में झूठा हलफनामा देने वालों की अब खैर नहीं. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने वालों के खिलाफ आईपीसी के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि जो लोग ऐसा करते पकड़ जाएं उनके खिलाफ आरपीए नहीं आईपीसी के तहत मुकदमा चलुना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की दंडात्मक धाराएं नगर निकाय (निगम) चुनावों पर लागू नहीं होती हैं. हालांकि, यदि कोई प्रत्याशी नगर निकाय चुनाव में झूठा हलफनामा दाखिल करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है, यदि संबंधित नगर निकाय कानून में इसके लिए अलग से दंड का प्रावधान नहीं है. 

2015 के निकाय चुनाव से जुड़ा है मामला

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला गुजरात की एक नगर पालिका चुनाव से जुड़े मामले में सुनाया. याचिकाकर्ता चंद्रिकाबेन किशोर दफदा पर वर्ष 2015 के नगर निकाय चुनाव के दौरान अपने पति की अचल संपत्तियों का विवरण हलफनामे में छिपाने का आरोप था. उनके खिलाफ मजिस्ट्रेट ने RPA की धारा 125A के तहत संज्ञान लिया था, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RPA की धारा 2(डी) के अनुसार यह कानून केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों पर लागू होता है. इसलिए नगर निकाय चुनाव में RPA की धारा 125A के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती. 

झूठा हलफनामा दिया तो होगी सजा

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि नगर निकाय चुनाव में झूठा हलफनामा देने वाला प्रत्याशी सजा से बच जाएगा. यदि संबंधित नगर निकाय कानून में दंड का प्रावधान नहीं है, तो ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता के उपयुक्त प्रावधान लागू होंगे.पीठ ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा गलत कानूनी धारा के तहत संज्ञान लेना एक सुधार योग्य त्रुटि है.यदि इससे न्याय में कोई विफलता नहीं हुई है, तो केवल इसी आधार पर पूरी कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती. संपत्ति के खुलासे के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनावी हलफनामे में प्रत्याशी को अपनी, अपने जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्तियों का पूरा विवरण देना अनिवार्य है. 

अदालत ने की खास टिप्पणी

अदालत ने कहा कि केवल संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति ही नहीं, बल्कि पति या पत्नी के नाम पर व्यक्तिगत रूप से दर्ज संपत्तियां भी घोषित करनी होंगी. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने RPA के तहत लिया गया संज्ञान रद्द करते हुए मामला मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया, ताकि वह कानून के उचित प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान लेकर आगे की कार्रवाई करे. साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. अदालत ने कहा कि यदि चुनावी प्रक्रिया के दौरान झूठा हलफनामा दाखिल किया गया है, तो यह समाज के खिलाफ अपराध है और इसकी कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई होनी चाहिए. 

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