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खुद को हिंदू साबित करने के लिए एक दीपक ही काफी,मंदिर जाने की जरूरत नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात

प्रधान न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की, 'यदि कोई व्यक्ति अपने घर में एक दीपक भी जलाता है, तो यह उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है.’’न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हो सकता है कि किसी को कर्मकांडी होने की जरूरत नहीं है.

खुद को हिंदू साबित करने के लिए एक दीपक ही काफी,मंदिर जाने की जरूरत नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कही ये बात
supreme court on hindu and hindutva
  • सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुत्व को धार्मिक नहीं बल्कि एक जीवनशैली बताया है, जिसमें मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है
  • CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने महिलाओं के मंदिर प्रवेश की याचिकाओं पर सुनवाई की
  • न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि केवल घर में दीपक जलाना भी धर्म में आस्था का पर्याप्त प्रमाण माना जाएगा
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हिंदुत्व जीवनशैली है और किसी हिंदू को हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है, यहां तक ​​कि घर के अंदर दीपक जलाना भी आस्था साबित करने के लिए पर्याप्त है. मुख्य न्यायाधीश(CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित कई धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की.

पंद्रहवें दिन सुनवाई शुरू होने पर हस्तक्षेपकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है. उन्होंने कहा, ‘‘हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था.उसके बाद 1966 में यह माना गया कि हिंदू वह है जो धर्म और दर्शन के सभी मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है.उन्होंने मुझसे कभी नहीं पूछा. हममें से किसी ने भी ऐसा कभी नहीं कहा.'' उन्होंने कहा, ‘‘मेरा वेदों के प्रति अत्यंत आदरभाव है, लेकिन क्या यह सच है कि आज हिंदू कहलाने वाला प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों को सर्वोच्च मानता है?''

'हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं...'

उनकी दलील का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘इसीलिए हिंदुत्व को जीवनशैली कहा जाता है.हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है.'' न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि हो सकता है कि किसी को कर्मकांडी होने की जरूरत नहीं है और आस्था रखने वाले लोगों के रास्ते में कोई बाधा नहीं बन सकता.

'धर्म को साबित करने के लिए एक दीपक ही काफी'

सीजेआई ने यह भी टिप्पणी की, 'यदि कोई व्यक्ति अपने घर में एक दीपक भी जलाता है, तो यह उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है.'' न्यायालय ने इससे पहले टिप्पणी की थी कि यदि व्यक्ति किसी संवैधानिक अदालत के समक्ष हर धार्मिक प्रथा या धर्म से संबंधित मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर दें, तो सैकड़ों याचिकाएं दायर की जाएंगी और इसके कारण हर धर्म 'टूट' जाएगा. सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए शबरिमला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था, और फैसला सुनाया था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है.

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