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नासा के कंप्यूटर को हराने वाला बिहार का वो लाल, आखिरी वक्त में एक एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हुई

Vashishtha Narayan Singh Success Story: बिहार के लाल वशिष्ठ नारायण सिंह की कहानी, किसी फिल्म से कम नहीं है. जब नासा के चांद पर जाने वाले मिशन अपोलो के दौरान 31 कंप्यूटर ठप पड़ गए थे. तब बिहार के लाल ने अपना दिमाग चलाकर सही वैल्यू निकाली और मिशन को सक्सेसफुल बनाया.

नासा के कंप्यूटर को हराने वाला बिहार का वो लाल, आखिरी वक्त में एक एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हुई
Vashishtha Narayan Singh Success Story

आज कहानी बिहार के उस लाल की, जिसने नासा तक में अपना लोहा मनवाया. लेकिन जब पटना के एक अस्पताल में उसने अपनी आखिरी सांस ली, तो उनके पार्थिव शरीर को घर ले जाने के लिए डेढ़ घंटे तक एक एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हुई. भारत के महान गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह का जब निधन हुआ, तो वे गुमनामी की उस अंधेरी कोठरी में थे, जहां कोई उन्हें पूछने वाला नहीं था.

2 अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपुर जिले के बसंतपुर गांव के एक बेहद साधारण परिवार में वशिष्ठ बाबू का जन्म हुआ. ये वही बिहार है जिसने चाणक्य और चंद्रगुप्त दिए. उनकी शुरुआती पढ़ाई नेतरहाट आवासीय विद्यालय में हुई, जो अपनी कड़े अनुशासन और गुरुकुल पद्धति के लिए जाना जाता था. वहां राजा का बेटा हो या रंक का, सबको खुद अपने बर्तन मांजने होते थे, खुद खाना बनाना होता था. उनके सहपाठी बताते हैं कि जब वे लोग नौवीं क्लास के गणित में सिर खुजला रहे होते थे, तब वशिष्ठ बाबू चुपचाप कॉलेज लेवल की नंबर थ्योरी और कैलकुलस के पन्ने पलट रहे होते थे. उनका दिमाग बिजली से भी तेज चलता था. पढ़ाई के साथ-साथ नाटकों में उनकी एक्टिंग इतनी लाजवाब थी कि लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे. 

The Genius Who Beat NASA Computers But Died in Poverty: The Tragedy of Dr. Vashishtha Narayan Singh

जब यूनिवर्सिटी को बदलने पड़े अपने नियम

इसके बाद वे पटना यूनिवर्सिटी पहुंचे. यहां का एक किस्सा सुनिए. क्लास चल रही थी, प्रोफेसर साहब ब्लैकबोर्ड पर गणित का एक मुश्किल सवाल लगा रहे थे. तभी वशिष्ठ खड़े हुए और बोले- गुरु जी, क्या इसे किसी दूसरे और आसान तरीके से भी हल किया जा सकता है?

प्रोफेसर साहब का ईगो हर्ट हो गया. वे उन्हें सीधे प्रिंसिपल नागेंद्र नाथ के केबिन में ले गए. नागेंद्र नाथ खुद बहुत बड़े वैज्ञानिक थे और रमन इफेक्ट पर काम कर चुके थे. उन्होंने वशिष्ठ की परीक्षा लेने के लिए गणित का सबसे कठिन सवाल उनके सामने रख दिया. वशिष्ठ ने बिना डरे, महज कुछ ही मिनटों में उस सवाल को न सिर्फ हल किया, बल्कि उसके कई और तरीके भी निकाल दिए!

प्रिंसिपल साहब हक्के-बक्के रह गए. उन्होंने वशिष्ठ की पीठ थपथपाई और यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार नियम बदल दिए. उन्हें बीएससी फर्स्ट ईयर से सीधे फाइनल ईयर की परीक्षा देने की अनुमति मिली. महज 21 साल की उम्र में उन्होंने बीएससी और एमएससी दोनों डिग्रियां हासिल कर लीं.

बर्कले गए और नासा के कंप्यूटरों को मात दी

उनकी इस प्रतिभा को देखकर अमेरिका के मशहूर प्रोफेसर जॉन एल. केली उन्हें अपने साथ यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले ले गए. साल 1969 में उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की, जिसका विषय था- 'साइकिल वेक्टर स्पेस थ्योरी' (जो एडवांस गणित का बेहद जटिल हिस्सा है).

नासा के कंप्यूटर ठप, वशिष्ठ ने सुलझाई पहेली

वशिष्ठ नारायण के बारे में यहां तक कहा जाता है कि उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को भी चुनौती दी थी. पीएचडी पूरी करते ही उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी नासा में नौकरी मिल गई. और यहां आता है उनके जीवन का वो ऐतिहासिक पल जिसके किस्से आज भी सुनाए जाते हैं. नासा का मशहूर अपोलो मिशन लॉन्च होने वाला था, तभी अचानक नासा के 31 कंप्यूटर एक साथ ठप पड़ गए. वैज्ञानिक परेशान थे कि अब लॉन्चिंग कैसे होगी? ऐसे में वशिष्ठ नारायण सिंह आगे आए. उन्होंने कागज-कलम उठाई, अपने दिमाग से उंगलियों पर ऐसी कैलकुलेशन की और एक सटीक वैल्यू निकाल दी. जब कंप्यूटर दोबारा चालू हुए, तो कंप्यूटर का रिजल्ट और वशिष्ठ बाबू की निकाली वैल्यू बिल्कुल एक थी. उन्होंने अकेले अपने दम पर नासा के उस मिशन को फेल होने से बचा लिया था.  

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अमेरिका में नहीं लगा मन, भारत आ गए वशिष्ठ

लेकिन वशिष्ठ बाबू का दिल तो हिंदुस्तान के लिए धड़कता था. अमेरिका के ऐशो-आराम को ठोकर मारकर वह भारत लौट आए. उन्होंने आईआईटी कानपुर, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और आईएसआई कोलकाता जैसे बड़े संस्थानों में पढ़ाया.

साल 1974 में उनकी शादी हुई, लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था. इसी दौरान उनके व्यवहार में बदलाव आने लगा. जांच हुई तो पता चला कि उन्हें सिजोफ्रेनिया (Schizophrenia) नाम की गंभीर मानसिक बीमारी हो गई है. इस बीमारी में इंसान अजीब बातें करने लगता है, भ्रम की स्थिति में रहता है और अपनों को भी नहीं पहचान पाता. आम तौर पर यह बीमारी बुढ़ापे में होती है, लेकिन माना जाता है कि जो दिमाग असाधारण रूप से सक्रिय होता है, वे उतना ही संवेदनशील भी होता है. इस बीमारी ने उनके हंसते-खेलते जीवन को उजाड़ दिया. उनकी पत्नी से तलाक हो गया. नौकरी छूट गई और वह पूरी तरह अकेले हो गए.  

vashisht narayan singh

अंतिम संदेश और एक गंभीर सवाल

इसके बाद के दशक उन्होंने बिहार में अपने गांव में गुमनामी और तंगहाली में बिताए. कभी-कभी वे भूपेंद्र नारायण मंडल यूनिवर्सिटी में गेस्ट लेक्चर देने जाते थे, लेकिन वो सिर्फ एक औपचारिक सम्मान था. उनके हाथ कांपते थे, आंखें शून्य में ताकती थीं, लेकिन जब भी उनके हाथ में चाक और ब्लैकबोर्ड आता था, वे गणित के सूत्र लिखने लगते थे. 14 नवंबर 2019 को गणित के इस जादूगर ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. 

गरीब परिवार अस्पताल के बाहर उनके शव को रखकर रोता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन संवेदनहीन सिस्टम को तरस नहीं आया. जैसे ही यह खबर बिहार CM नीतीश कुमार तक पहुंची, अचानक पूरा सरकारी अमला हरकत में आ गया. अस्पताल में रातों-रात रेड कार्पेट बिछा दी गई. जो प्रशासन एक एम्बुलेंस नहीं दे सका, वो मंत्रियों की अगवानी के लिए पलकें बिछाए खड़ा था.
 

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